१०.१
अथ परिमलजामवाप्य लक्ष्मी-
मवयवदीपितमण्डनश्रियस्ताः ।
वसतिमभिविहाय रम्यहावाः
सुरपतिसूनुविलोभनाय जग्मुः ॥
मवयवदीपितमण्डनश्रियस्ताः ।
वसतिमभिविहाय रम्यहावाः
सुरपतिसूनुविलोभनाय जग्मुः ॥
सारांश
AI
अंग-कांति और सौंदर्य से संपन्न वे अप्सराएँ इंद्रपुत्र अर्जुन को लुभाने के लिए अपने निवास छोड़कर चल पड़ीं।
१०.२
द्रुतपदमभियातुमिच्छतीनां
गमनपरिक्रमलाघवेन तासाम् ।
अवनिषु चरणैः पृथुस्तनीना-
मलघुनितम्बतया चिरं निषेदे ॥
गमनपरिक्रमलाघवेन तासाम् ।
अवनिषु चरणैः पृथुस्तनीना-
मलघुनितम्बतया चिरं निषेदे ॥
सारांश
AI
शीघ्र चलने की इच्छुक उन भारी स्तनों और नितम्बों वाली सुंदरियों के पैर भारीपन के कारण पृथ्वी पर मंद गति से पड़ रहे थे।
१०.३
निहितसरसयावकैर्बभासे
चरणतलैः कृतपद्धतिर्वधूनाम् ।
अविरलविततेव शक्रगोपै-
ररुणितनीलतृणोलपा धरित्री ॥
चरणतलैः कृतपद्धतिर्वधूनाम् ।
अविरलविततेव शक्रगोपै-
ररुणितनीलतृणोलपा धरित्री ॥
सारांश
AI
उनके चरणों के ताजे लाक्षारस से पृथ्वी ऐसी सुशोभित हुई मानो नीली हरी घास पर लाल इंद्रगोप (बीरबहूटियाँ) छाई हों।
१०.४
ध्वनिरगविवरेषु नूपुराणां
पृथुरशनागुणशिञ्जितानुयातः ।
प्रतिरवविततो वनानि चक्रे
मुखरसमुत्सुकहंससारसानि ॥
पृथुरशनागुणशिञ्जितानुयातः ।
प्रतिरवविततो वनानि चक्रे
मुखरसमुत्सुकहंससारसानि ॥
सारांश
AI
पर्वत की गुफाओं में गूँजते नूपुरों और करधनी के स्वर ने हंसों और सारसों को चहकने के लिए व्याकुल कर दिया।
१०.५
अवचयपरिभोगवन्ति हिंस्रैः
सहचरितान्यमृगाणि काननानि ।
अभिदधुरभितो मुनिं वधूभ्यः
समुदितसाध्वसविक्लवं च चेतः ॥
सहचरितान्यमृगाणि काननानि ।
अभिदधुरभितो मुनिं वधूभ्यः
समुदितसाध्वसविक्लवं च चेतः ॥
सारांश
AI
हिंसक पशुओं से भरे किंतु मृगहीन वन को देखकर अप्सराओं का मन मुनि अर्जुन की उपस्थिति के कारण भय और विस्मय से भर गया।
१०.६
नृपतिमुनिपरिग्रहेण सा भूः
सुरसचिवाप्सरसां जहार चेतः ।
उपहितपरमप्रभावधाम्नां
न हि जयिनां तपसामलङ्घ्यमस्ति ॥
सुरसचिवाप्सरसां जहार चेतः ।
उपहितपरमप्रभावधाम्नां
न हि जयिनां तपसामलङ्घ्यमस्ति ॥
सारांश
AI
उस राजा और मुनि के संपर्क वाली भूमि ने अप्सराओं का मन मोह लिया; तेजस्वी तपस्वियों के लिए कुछ भी असंभव नहीं है।
१०.७
सचकितमिव विस्मयाकुलाभिः
शुचिसिकतास्वतिमानुषाणि ताभिः ।
क्षितिषु ददृशिरे पदानि जिष्णो-
रुपहितकेतुरथाङ्गलाञ्छनानि ॥
शुचिसिकतास्वतिमानुषाणि ताभिः ।
क्षितिषु ददृशिरे पदानि जिष्णो-
रुपहितकेतुरथाङ्गलाञ्छनानि ॥
सारांश
AI
उन्होंने निर्मल रेत पर ध्वज और चक्र के चिह्नों वाले अर्जुन के अलौकिक पदचिह्नों को आश्चर्य के साथ देखा।
१०.८
अतिशयितवनान्तरद्युतीनां
फलकुसुमावचयेऽपि तद्विधानाम् ।
ऋतुरिव तरुवीरुधां समृद्ध्या
युवतिजनैर्जगृहे मुनिप्रभावः ॥
फलकुसुमावचयेऽपि तद्विधानाम् ।
ऋतुरिव तरुवीरुधां समृद्ध्या
युवतिजनैर्जगृहे मुनिप्रभावः ॥
सारांश
AI
वृक्षों और लताओं में असमय आए फल-फूलों की समृद्धि को देखकर युवतियों ने मुनि के तप के प्रभाव को ऋतु के समान माना।
१०.९
मृदितकिसलयः सुराङ्गनानां
ससलिलवल्कलभारभुग्नशाखः ।
बहुमतिमधिकां ययावशोकः
परिजनतापि गुणाय सद्गुणानाम् ॥
ससलिलवल्कलभारभुग्नशाखः ।
बहुमतिमधिकां ययावशोकः
परिजनतापि गुणाय सद्गुणानाम् ॥
सारांश
AI
गीले वल्कल वस्त्रों के भार से झुकी डालियों वाले अशोक वृक्ष ने अप्सराओं का सम्मान पाया, क्योंकि सज्जनों की सेवा गुणकारी होती है।
१०.१०
यमनियमकृशीकृतस्थिराङ्गः
परिददृशे विधृतायुधः स ताभिः ।
अनुपमशमदीप्ततागरीया-
न्कृतपदपङ्क्तिरथर्वणेव वेदः ॥
परिददृशे विधृतायुधः स ताभिः ।
अनुपमशमदीप्ततागरीया-
न्कृतपदपङ्क्तिरथर्वणेव वेदः ॥
सारांश
AI
संयम से कृश किंतु शस्त्रधारी अर्जुन उन स्त्रियों को साक्षात् अथर्ववेद के समान तेजस्वी, शांत और महान दिखाई दिए।
१०.११
शशधर इव लोचनाभिरामै-
र्गगनविसारिभिरंशुभिः परीतः ।
शिखरनिचयमेकसानुसद्मा
सकलमिवापि दधन्महीधरस्य ॥
र्गगनविसारिभिरंशुभिः परीतः ।
शिखरनिचयमेकसानुसद्मा
सकलमिवापि दधन्महीधरस्य ॥
सारांश
AI
चंद्रमा की किरणों के समान कांति वाले अर्जुन एक ही शिखर पर स्थित होकर भी संपूर्ण पर्वत को प्रकाशित कर रहे थे।
१०.१२
सुरसरिति परं तपोऽधिगच्छ-
न्विधृतपिशङ्गबृहज्जटाकलापः ।
हविरिव विततः शिखासमूहैः
समभिलषन्नुपवेदि जातवेदाः ॥
न्विधृतपिशङ्गबृहज्जटाकलापः ।
हविरिव विततः शिखासमूहैः
समभिलषन्नुपवेदि जातवेदाः ॥
सारांश
AI
गंगा के तट पर तपस्यारत, पीली जटाओं वाले वे मुनि वेदी पर प्रज्वलित अग्नि की शिखाओं के समान प्रतीत हो रहे थे।
१०.१३
सदृशमतनुमाकृतेः प्रयत्नं
तदनुगुणामपरैः क्रियामलङ्घ्याम् ।
दधदलघु तपः क्रियानुरूपं
विजयवतीं च तपःसमां समृद्धिम् ॥
तदनुगुणामपरैः क्रियामलङ्घ्याम् ।
दधदलघु तपः क्रियानुरूपं
विजयवतीं च तपःसमां समृद्धिम् ॥
सारांश
AI
अपनी आकृति के अनुरूप ही महान प्रयत्न और तपस्या करते हुए अर्जुन विजयदायिनी सिद्धि को प्राप्त कर रहे थे।
१०.१४
चिरनियमकृशोऽपि शैलसारः
शमनिरतोऽपि दुरासदः प्रकृत्या ।
ससचिव इव निर्जनेऽपि तिष्ठ-
न्मुनिरपि तुल्यरुचिस्त्रिलोकभर्तुः ॥
शमनिरतोऽपि दुरासदः प्रकृत्या ।
ससचिव इव निर्जनेऽपि तिष्ठ-
न्मुनिरपि तुल्यरुचिस्त्रिलोकभर्तुः ॥
सारांश
AI
नियमों से कृश होने पर भी वे पर्वत के समान दृढ़, शांत होकर भी दुर्जेय और अकेले भी इंद्र के समान तेजस्वी थे।
१०.१५
तनुमवजितलोकसारधाम्नीं
त्रिभुवनगुप्तिसहां विलोकयन्त्यः ।
अवययुरमरस्त्रियोऽस्य यत्नं
विजयफले विफलं तपोधिकारे ॥
त्रिभुवनगुप्तिसहां विलोकयन्त्यः ।
अवययुरमरस्त्रियोऽस्य यत्नं
विजयफले विफलं तपोधिकारे ॥
सारांश
AI
जगत के सारभूत तेज और त्रिलोक की रक्षा में समर्थ उनके शरीर को देखकर अप्सराओं को अपनी लुभाने की शक्ति व्यर्थ लगी।
१०.१६
मुनिदनुतनयान्विलोभ्य सद्यः
प्रतनुबलान्यधितिष्ठतस्तपांसि ।
अलघुनि बहु मेनिरे च ताः स्वं
कुलिशभृता विहितं पदे नियोगम् ॥
प्रतनुबलान्यधितिष्ठतस्तपांसि ।
अलघुनि बहु मेनिरे च ताः स्वं
कुलिशभृता विहितं पदे नियोगम् ॥
सारांश
AI
पूर्व में मुनियों को विचलित करने वाली उन अप्सराओं ने अब अर्जुन के महान तप के समक्ष इंद्र के आदेश को अत्यंत कठिन माना।
१०.१७
अथ कृतकविलोभनं विधित्सौ
युवतिजने हरिसूनुदर्शनेन ।
प्रसभमवततार चित्तजन्मा
हरति मनो मधुरा हि यौवनश्रीः ॥
युवतिजने हरिसूनुदर्शनेन ।
प्रसभमवततार चित्तजन्मा
हरति मनो मधुरा हि यौवनश्रीः ॥
सारांश
AI
जब वे सुंदरियाँ अर्जुन को लुभाने का विचार कर रही थीं, तब कामदेव ने उनके मन में प्रवेश किया क्योंकि यौवन स्वयं आकर्षक होता है।
१०.१८
सपदि हरिसखैर्वधूनिदेशा-
द्ध्वनितमनोरमवल्लकीमृदङ्गैः ।
युगपद् ऋतुगणस्य संनिधानं
वियति वने च यथायथं वितेने ॥
द्ध्वनितमनोरमवल्लकीमृदङ्गैः ।
युगपद् ऋतुगणस्य संनिधानं
वियति वने च यथायथं वितेने ॥
सारांश
AI
इंद्र के मित्रों के निर्देश पर संगीत की ध्वनि के साथ आकाश और वन में सभी ऋतुएँ एक साथ उपस्थित हो गईं।
१०.१९
सजलजलधरं नभो विरेजे
विवृतिमियाय रुचिस्तडिल्लतानाम् ।
व्यवहितरतिविग्रहैर्वितेने
जलगुरुभिः स्तनितैर्दिगन्तरेषु ॥
विवृतिमियाय रुचिस्तडिल्लतानाम् ।
व्यवहितरतिविग्रहैर्वितेने
जलगुरुभिः स्तनितैर्दिगन्तरेषु ॥
सारांश
AI
मेघों से भरे आकाश, चमकती बिजली और बादलों के गंभीर गर्जन ने दसों दिशाओं में प्रेम और रति के अनुकूल वातावरण बना दिया।
१०.२०
परिसुरपतिसूनुधाम सद्यः
समुपदधन्मुकुलानि मालतीनाम् ।
विरलमपजहार बद्धबिन्दुः
सरजसतामवनेरपां निपातः ॥
समुपदधन्मुकुलानि मालतीनाम् ।
विरलमपजहार बद्धबिन्दुः
सरजसतामवनेरपां निपातः ॥
सारांश
AI
अर्जुन के आश्रम के समीप वर्षा की बूंदों ने मालती की कलियाँ खिला दीं और पृथ्वी की धूल को शांत कर निर्मलता भर दी।
१०.२१
प्रतिदिशमभिगच्छताभिमृष्टः
ककुभविकाससुगन्धिनानिलेन ।
नव इव विबभौ सचित्तजन्मा
गतधृतिराकुलितश्च जीवलोकः ॥
ककुभविकाससुगन्धिनानिलेन ।
नव इव विबभौ सचित्तजन्मा
गतधृतिराकुलितश्च जीवलोकः ॥
सारांश
AI
चारों दिशाओं में अर्जुन वृक्षों के विकास की सुगंध लेकर बहने वाले पवन ने विचलित प्राणियों में कामदेव के नवीन प्रादुर्भाव जैसा संचार कर दिया।
१०.२२
व्यथितमपि भृशं मनो हरन्ती
परिणतजम्बुफलोपभोगहृष्टा ।
परभृतयुवतिः स्वनं वितेने
नवनवयोजितकण्ठरागरम्यम् ॥
परिणतजम्बुफलोपभोगहृष्टा ।
परभृतयुवतिः स्वनं वितेने
नवनवयोजितकण्ठरागरम्यम् ॥
सारांश
AI
पके हुए जामुन के फलों का रसास्वादन कर प्रसन्न हुई कोयल ने अपने मधुर स्वर से विचलित मनों को भी आकर्षित करना प्रारम्भ कर दिया।
१०.२३
अभिभवति मनः कदम्बवायौ
मदमधुरे च शिखण्डिनां निनादे ।
जन इव न धृतेश्चचाल जिष्णु-
र्न हि महतां सुकरः समाधिभङ्गः ॥
मदमधुरे च शिखण्डिनां निनादे ।
जन इव न धृतेश्चचाल जिष्णु-
र्न हि महतां सुकरः समाधिभङ्गः ॥
सारांश
AI
कदम्ब की सुगन्धित वायु और मोरों की मधुर ध्वनि के मन को जीतने वाले प्रभाव के बावजूद अर्जुन विचलित नहीं हुए; महापुरुषों की एकाग्रता भंग करना सरल नहीं है।
१०.२४
धृतबिसवलयावलिर्वहन्ती
कुमुदवनैकदुकूलमात्तबाणा ।
शरदमलतले सरोजपाणौ
घनसमयेन वधूरिवाललम्बे ॥
कुमुदवनैकदुकूलमात्तबाणा ।
शरदमलतले सरोजपाणौ
घनसमयेन वधूरिवाललम्बे ॥
सारांश
AI
शरद ऋतु रूपी वधू ने, जिसने कुमुद के श्वेत वस्त्र धारण किए थे और हाथ में कमल रूपी बाण लिए थे, वर्षा ऋतु का आलिंगन किया।
१०.२५
समदशिखिरुतानि हंसनादैः
कुमुदवनानि कदम्बपुष्पवृष्ट्या ।
श्रियमतिशयिनीं समेत्य जग्मु-
र्गुणमहतां महते गुणाय योगः ॥
कुमुदवनानि कदम्बपुष्पवृष्ट्या ।
श्रियमतिशयिनीं समेत्य जग्मु-
र्गुणमहतां महते गुणाय योगः ॥
सारांश
AI
मयूरों और हंसों की ध्वनियों तथा कुमुदों और कदम्बों के मिलन ने अपूर्व शोभा प्राप्त की; महान गुणों का मेल गुणों की वृद्धि का कारण होता है।
१०.२६
सरजसमपहाय केतकीनां
प्रसवमुपान्तिकनीपरेणुकीर्णम् ।
प्रियमधुरसनानि षट्पदाली
मलिनयति स्म विनीलबन्धनानि ॥
प्रसवमुपान्तिकनीपरेणुकीर्णम् ।
प्रियमधुरसनानि षट्पदाली
मलिनयति स्म विनीलबन्धनानि ॥
सारांश
AI
भौरों के समूह ने केतकी के परागयुक्त पुष्पों को त्यागकर पास के नीले डंठल वाले कदम्ब (नीप) के पुष्पों के मधुर रस का पान किया।
१०.२७
मुकुलितमतिशय्य बन्धुजीवं
धृतजलबिन्दुषु शाद्वलस्थलीषु ।
अविरलवपुषः सुरेन्द्रगोपा
विकचपलाशचयश्रियं समीयुः ॥
धृतजलबिन्दुषु शाद्वलस्थलीषु ।
अविरलवपुषः सुरेन्द्रगोपा
विकचपलाशचयश्रियं समीयुः ॥
सारांश
AI
हरी घास पर ओस की बूंदों के बीच फैले हुए सघन इन्द्रगोप (बीरबहूटियाँ) खिलते हुए पलाश के पुष्पों जैसी अनुपम कान्ति बिखेरने लगे।
१०.२८
अविरलफलिनीवनप्रसूनः कुसुमितकुन्दसुगन्धिगन्धवाहः ।
गुणमसमयजं चिराय लेभे विरलतुषारकण् ।
अस्तुषारकालः ॥
गुणमसमयजं चिराय लेभे विरलतुषारकण् ।
अस्तुषारकालः ॥
सारांश
AI
शिशिर काल ने फलते हुए वनों और कुन्द के पुष्पों की सुगन्धित वायु के माध्यम से असमय ही अद्भुत प्राकृतिक सौन्दर्य प्राप्त कर लिया।
१०.२९
निचयिनि लवलीलताविकासे
जनयति लोध्रसमीरणे च हर्षम् ।
विकृतिमुपययौ न पाण्डुसूनु-
श्चलति नयान्न जिगीषतां हि चेतः ॥
जनयति लोध्रसमीरणे च हर्षम् ।
विकृतिमुपययौ न पाण्डुसूनु-
श्चलति नयान्न जिगीषतां हि चेतः ॥
सारांश
AI
लवली लताओं के विकास और लोध्र पुष्पों की सुगन्धित वायु के हर्षदायक होने पर भी अर्जुन विचलित नहीं हुए; विजय की इच्छा रखने वाले मर्यादा से नहीं हटते।
१०.३०
कतिपयसहकारपुष्परम्य-
स्तनुतुहिनोऽल्पविनिद्रसिन्दुवारः ।
सुरभिमुखहिमागमान्तशंसी
समुपययौ शिशिरः स्मरैकबन्धुः ॥
स्तनुतुहिनोऽल्पविनिद्रसिन्दुवारः ।
सुरभिमुखहिमागमान्तशंसी
समुपययौ शिशिरः स्मरैकबन्धुः ॥
सारांश
AI
आम के मौर, हल्की ओस और सिन्दुवार पुष्पों से युक्त शिशिर ऋतु का आगमन हुआ, जो कामदेव का परम मित्र और वसन्त के आने की सूचना देता है।
१०.३१
कुसुमनगवनान्युपैतुकामा
किसलयिनीमवलम्ब्य चूतयष्टिम् ।
क्वणदलिकुलनूपुरा निरासे
नलिनवनेषु पदं वसन्तलक्ष्मीः ॥
किसलयिनीमवलम्ब्य चूतयष्टिम् ।
क्वणदलिकुलनूपुरा निरासे
नलिनवनेषु पदं वसन्तलक्ष्मीः ॥
सारांश
AI
आम की शाखा का सहारा लेकर और भौंरों की गुंजार रूपी नूपुरों को बजाती हुई वसन्त लक्ष्मी ने कमलवनों में अपने चरण रखे।
१०.३२
विकसितकुसुमाधरं हसन्तीं
कुरबकराजिवधूं विलोकयन्तम् ।
ददृशुरिव सुराङ्गना निषण्णं
सशरमनङ्गमशोकपल्लवेषु ॥
कुरबकराजिवधूं विलोकयन्तम् ।
ददृशुरिव सुराङ्गना निषण्णं
सशरमनङ्गमशोकपल्लवेषु ॥
सारांश
AI
देवांगनाओं ने अशोक के पत्तों के बीच छिपे हुए कामदेव को देखा, जो खिले हुए कुरबक पुष्पों की मुस्कान को अपलक निहार रहा था।
१०.३३
मुहुरनुपतता विधूयमानं
विरचितसंहति दक्षिणानिलेन ।
अलिकुलमलकाकृतिं प्रपेदे
नलिनमुखान्तविसर्पि पङ्कजिन्याः ॥
विरचितसंहति दक्षिणानिलेन ।
अलिकुलमलकाकृतिं प्रपेदे
नलिनमुखान्तविसर्पि पङ्कजिन्याः ॥
सारांश
AI
मलय पवन द्वारा हिलाए जाते हुए कमलों के ऊपर मंडराते भौरों का समूह पङ्कजिनी के कमल रूपी मुख पर लटकती अलकों (बालों) के समान प्रतीत हो रहा था।
१०.३४
श्वसनचलितपल्लवाधरोष्ठे
नवनिहितेर्ष्यमिवावधूनयन्ती ।
मधुसुरभिणि षट्पदेन पुष्पे
मुख इव शाललतावधूश्चुचुम्बे ॥
नवनिहितेर्ष्यमिवावधूनयन्ती ।
मधुसुरभिणि षट्पदेन पुष्पे
मुख इव शाललतावधूश्चुचुम्बे ॥
सारांश
AI
हवा से हिलते पल्लव रूपी अधरों वाली शाललता रूपी वधू को भौंरे ने जब चूमा, तो वह ईर्ष्या वश कांपते होठों वाली नायिका जैसी लगी।
१०.३५
प्रभवति न तदा परो विजेतुं
भवति जितेन्द्रियता यदात्मरक्षा ।
अवजितभुवनस्तथा हि लेभे
सिततुरगे विजयं न पुष्पमासः ॥
भवति जितेन्द्रियता यदात्मरक्षा ।
अवजितभुवनस्तथा हि लेभे
सिततुरगे विजयं न पुष्पमासः ॥
सारांश
AI
आत्म-विजय ही वास्तविक रक्षा है; इसी कारण सम्पूर्ण विश्व को जीतने वाला वसन्त काल भी जितेन्द्रिय अर्जुन पर विजय प्राप्त न कर सका।
१०.३६
कथमिव तव संमतिर्भवित्री
समम् ऋतुभिर्मुनिनावधीरितस्य ।
इति विरचितमल्लिकाविकासः
स्मयत इव स्म मधुं निदाघकालः ॥
समम् ऋतुभिर्मुनिनावधीरितस्य ।
इति विरचितमल्लिकाविकासः
स्मयत इव स्म मधुं निदाघकालः ॥
सारांश
AI
मल्लिका पुष्पों के खिलने से ग्रीष्म ऋतु मानो वसन्त पर हंसते हुए कह रही थी कि जो मुनि उसे ही ठुकरा चुका है, वह ग्रीष्म को क्या अपनाएगा।
१०.३७
बलवदपि बलं मिथोविरोधि
प्रभवति नैव विपक्षनिर्जयाय ।
भुवनपरिभवी न यत्तदानीं
तम् ऋतुगणः क्षणमुन्मनीचकार ॥
प्रभवति नैव विपक्षनिर्जयाय ।
भुवनपरिभवी न यत्तदानीं
तम् ऋतुगणः क्षणमुन्मनीचकार ॥
सारांश
AI
परस्पर विरोधी शक्तियाँ मिलकर भी शत्रु पर विजय नहीं पा सकतीं; इसीलिए ऋतुओं का समूह भी अर्जुन के मन को क्षण भर के लिए विचलित न कर सका।
१०.३८
श्रुतिसुखमुपवीणितं सहायै-
रविरललाञ्छनहारिणश्च कालाः ।
अविहितहरिसूनुविक्रियाणि
त्रिदशवधूषु मनोभवं वितेनुः ॥
रविरललाञ्छनहारिणश्च कालाः ।
अविहितहरिसूनुविक्रियाणि
त्रिदशवधूषु मनोभवं वितेनुः ॥
सारांश
AI
मधुर संगीत और रमणीय ऋतुओं ने अर्जुन के मन में कोई विकार उत्पन्न नहीं किया, बल्कि वे अप्सराओं के मन में ही काम-भाव जगाने लगे।
१०.३९
न दलति निचये तथोत्पलानां
न च विषमच्छदगुच्छयूथिकासु ।
अभिरतुमुपलेभिरे यथासां
हरितनयावयवेषु लोचनानि ॥
न च विषमच्छदगुच्छयूथिकासु ।
अभिरतुमुपलेभिरे यथासां
हरितनयावयवेषु लोचनानि ॥
सारांश
AI
अप्सराओं की दृष्टि न तो कमलों पर टिकी और न ही जूही के फूलों के गुच्छों पर; वे केवल अर्जुन के दिव्य अंगों के सौन्दर्य को ही निहारती रहीं।
१०.४०
मुनिमभिमुखतां निनीषवो याः
समुपययुः कमनीयतागुणेन ।
मदनमुपदधे स एव तासां
दुरधिगमा हि गतिः प्रयोजनानाम् ॥
समुपययुः कमनीयतागुणेन ।
मदनमुपदधे स एव तासां
दुरधिगमा हि गतिः प्रयोजनानाम् ॥
सारांश
AI
मुनि को आकर्षित करने आई अप्सराएं स्वयं ही कामदेव के वश में हो गईं; प्रयोजनों की सिद्धि का मार्ग बड़ा ही अनिश्चित और दुरूह होता है।
१०.४१
प्रकृतमनुससार नाभिनेयं
प्रविकसदङ्गुलि पाणिपल्लवं वा ।
प्रथममुपहितं विलासि चक्षुः
सिततुरगे न चचाल नर्तकीनाम् ॥
प्रविकसदङ्गुलि पाणिपल्लवं वा ।
प्रथममुपहितं विलासि चक्षुः
सिततुरगे न चचाल नर्तकीनाम् ॥
सारांश
AI
नर्तकियों ने अभिनय या हस्त-मुद्राओं से पहले ही अपनी विकसित कमलों जैसी आँखों को अर्जुन पर स्थिर कर दिया, जो वहाँ से तनिक भी विचलित नहीं हुईं।
१०.४२
अभिनयमनसः सुराङ्गनाया
निहितमलक्तकवर्तनाभिताम्रम् ।
चरणमभिपपात षट्पदाली
धुतनवलोहितपङ्कजाभिशङ्का ॥
निहितमलक्तकवर्तनाभिताम्रम् ।
चरणमभिपपात षट्पदाली
धुतनवलोहितपङ्कजाभिशङ्का ॥
सारांश
AI
अभिनय के लिए उद्यत एक अप्सरा के लाक्षारस से रंगे लाल चरणों को नवीन लाल कमल समझकर भ्रमरों का समूह उन पर मंडराने लगा।
१०.४३
अविरलमलसेषु नर्तकीनां द्रुतपरिषिक्तमलक्तकं पदेषु । सवपुषामिव चित्तरागमूहुर्नमितशिखानि कदम्बकेसराणि ॥
सारांश
AI
नर्तकियों के सुकुमार चरणों पर लगा सघन महावर उनके शरीर में व्याप्त अनुराग के समान प्रतीत हो रहा था, जैसे कदम्ब के झुके हुए केसर शोभायमान हों।
१०.४४
नृपसुतमभितः समन्मथायाः
परिजनगात्रतिरोहिताङ्गयष्टेः ।
स्फुटमभिलषितं बभूव वध्वा
वदति हि संवृतिरेव कामितानि ॥
परिजनगात्रतिरोहिताङ्गयष्टेः ।
स्फुटमभिलषितं बभूव वध्वा
वदति हि संवृतिरेव कामितानि ॥
सारांश
AI
अर्जुन के निकट अपनी सखियों के पीछे अंगों को छिपाने का प्रयास करती हुई उस नवयौवना की लज्जा ने ही उसके मन की काम-इच्छा को स्पष्ट रूप से प्रकट कर दिया।
१०.४५
अभिमुनि सहसा हृते परस्या
घनमरुता जघनांशुकैकदेशे ।
चकितमवसनोरु सत्रपायाः
प्रतियुवतीरपि विस्मयं निनाय ॥
घनमरुता जघनांशुकैकदेशे ।
चकितमवसनोरु सत्रपायाः
प्रतियुवतीरपि विस्मयं निनाय ॥
सारांश
AI
अर्जुन के सम्मुख अचानक तीव्र वायु द्वारा एक अप्सरा का वस्त्र उड़ जाने पर, वह लज्जित हो गई और उसकी नग्न जंघाओं को देखकर अन्य स्त्रियाँ भी चकित रह गईं।
१०.४६
धृतबिसवलये निधाय पाणौ
मुखमधिरूषितपाण्डुगण्डलेखम् ।
नृपसुतमपरा स्मराभितापा-
दमधुमदालसलोचनं निदध्यौ ॥
मुखमधिरूषितपाण्डुगण्डलेखम् ।
नृपसुतमपरा स्मराभितापा-
दमधुमदालसलोचनं निदध्यौ ॥
सारांश
AI
कामदेव के ताप से व्याकुल एक अन्य स्त्री ने मृणाल के वलय वाले हाथ पर अपना पाण्डु वर्ण का कपोल रखकर मदभरी आँखों से अर्जुन को निहारा।
१०.४७
सखि दयितमिहानयेति सा मां
प्रहितवती कुसुमेषुणाभितप्ता ।
हृदयमहृदया न नाम पूर्वं
भवदुपकण्ठमुपागतं विवेद ॥
प्रहितवती कुसुमेषुणाभितप्ता ।
हृदयमहृदया न नाम पूर्वं
भवदुपकण्ठमुपागतं विवेद ॥
सारांश
AI
उस विरहिणी ने मुझे यह कहकर भेजा है कि 'सखि, मेरे प्रिय को यहाँ लाओ', जबकि उसका हृदय तो आपसे पहले ही मिल चुका है।
१०.४८
चिरमपि कलितान्यपारयन्त्या
परिगदितुं परिशुष्यता मुखेन ।
गतघृण गमितानि सत्सखीनां
नयनयुगैः सममार्द्रतां मनांसि ॥
परिगदितुं परिशुष्यता मुखेन ।
गतघृण गमितानि सत्सखीनां
नयनयुगैः सममार्द्रतां मनांसि ॥
सारांश
AI
मुख सूखने के कारण वह कुछ बोल न सकी, किंतु उसकी अश्रुपूर्ण आँखों ने उसकी सखियों के हृदयों को भी करुणा से भर दिया।
१०.४९
अचकमत सपल्लवां धरित्रीं
मृदुसुरभिं विरहय्य पुष्पशय्याम् ।
भृशमरतिमवाप्य तत्र चास्या-
स्तव सुखशीतमुपैतुमङ्कमिच्छा ॥
मृदुसुरभिं विरहय्य पुष्पशय्याम् ।
भृशमरतिमवाप्य तत्र चास्या-
स्तव सुखशीतमुपैतुमङ्कमिच्छा ॥
सारांश
AI
वह पुष्प-शय्या छोड़कर भूमि पर लोट रही है और अत्यधिक व्याकुलता के कारण अब आपकी शीतल गोद में स्थान पाने की अभिलाषा करती है।
१०.५०
तदनघ तनुरस्तु सा सकामा
व्रजति पुरा हि परासुतां त्वदर्थे ।
पुनरपि सुलभं तपोऽनुरागी
युवतिजनः खलु नाप्यतेऽनुरूपः ॥
व्रजति पुरा हि परासुतां त्वदर्थे ।
पुनरपि सुलभं तपोऽनुरागी
युवतिजनः खलु नाप्यतेऽनुरूपः ॥
सारांश
AI
हे निष्पाप! उस सुन्दरी की इच्छा पूर्ण करें क्योंकि वह आपके लिए प्राण त्याग रही है। तपस्या पुनः मिल सकती है, पर योग्य प्रेमी सुलभ नहीं होता।
॥ इति दशमः सर्गः ॥
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