अन्वयः
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नूपुराणां ध्वनिः पृथु-रशना-गुण-शिञ्जित-अनुयातः (सन्) अग-विवरेषु प्रतिरव-विततः (सन्) वनानि मुखर-समुत्सुक-हंस-सारसानि चक्रे।
English Summary
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The sound of the nymphs' anklets, accompanied by the tinkling of their heavy girdles, spread through the mountain caves by echoes and made the forests resonant with the excited cries of swans and cranes.
सारांश
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पर्वत की गुफाओं में गूँजते नूपुरों और करधनी के स्वर ने हंसों और सारसों को चहकने के लिए व्याकुल कर दिया।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
ध्वनिरिति ॥ अगविवरेषु नगरन्ध्रेषु । गुहास्वित्यर्थः । प्रतिरवैः प्रतिध्वनिभिर्विततः सम्मूर्च्छितः पृथुभी रशनागुणानां शिञ्जितैः स्वनितैरनुयातोऽनुगतः । मिलित इति यावत् ।
स्वनिते वस्त्रपर्णानां भूषणानां तु शिञ्जितम् इत्यमरः (अमरकोशः १.६.२६ ) । नूपुराणां ध्वनिभिर्ध्वनैर्वनानि मुखराः शब्दायमानाः समुत्सुका उत्कण्ठिता हंसाःसारसाश्च येषां तानि चक्रे । अत्र हंसादिषु मुखरसमुत्सुकीकरणरूपेण वस्तुना तेषां नूपुरादिध्वनौ सादृश्याद्धंससारसान्तरकूजितभ्रान्तिप्रतीतेर्भान्तिमदलंकारो व्यज्यते ॥
पदच्छेदः
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| ध्वनिः | ध्वनि (१.१) | sound |
| अगविवरेषु | अग–विवर (७.३) | in the mountain caves |
| नूपुराणाम् | नूपुर (६.३) | of the anklets |
| पृथुरशनागुणशिञ्जितानुयातः | पृथु–रशना–गुण–शिञ्जित–अनुयात (अनु√या+क्त, १.१) | followed by the tinkling of the strings of their heavy girdles |
| प्रतिरवविततः | प्रतिरव–वितत (वि√तन्+क्त, १.१) | spread by echoes |
| वनानि | वन (२.३) | the forests |
| चक्रे | चक्रे (√कृ कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | made |
| मुखरसमुत्सुकहंससारसानि | मुखर–समुत्सुक–हंस–सारस (२.३) | in which the swans and cranes became noisy and eager |
छन्दः
पुष्पिताग्रा []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ध्व | नि | र | ग | वि | व | रे | षु | नू | पु | रा | णां | |
| पृ | थु | र | श | ना | गु | ण | शि | ञ्जि | ता | नु | या | तः |
| प्र | ति | र | व | वि | त | तो | व | ना | नि | च | क्रे | |
| मु | ख | र | स | मु | त्सु | क | हं | स | सा | र | सा | नि |
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