सखि दयितमिहानयेति सा मां
प्रहितवती कुसुमेषुणाभितप्ता ।
हृदयमहृदया न नाम पूर्वं
भवदुपकण्ठमुपागतं विवेद ॥
सखि दयितमिहानयेति सा मां
प्रहितवती कुसुमेषुणाभितप्ता ।
हृदयमहृदया न नाम पूर्वं
भवदुपकण्ठमुपागतं विवेद ॥
प्रहितवती कुसुमेषुणाभितप्ता ।
हृदयमहृदया न नाम पूर्वं
भवदुपकण्ठमुपागतं विवेद ॥
अन्वयः
AI
सखि, इह दयितम् आनय, इति कुसुमेषुणा अभितप्ता सा मां प्रहितवती। अहृदया नाम सा पूर्वं भवदुपकण्ठम् उपागतं स्वकीयं हृदयं न विवेद।
English Summary
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A messenger-nymph speaks to Arjuna: "'O friend, bring my beloved here!' — saying this, she, tormented by the god of love, sent me to you. That heartless one, indeed, did not know that her own heart had already arrived in your presence."
सारांश
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उस विरहिणी ने मुझे यह कहकर भेजा है कि 'सखि, मेरे प्रिय को यहाँ लाओ', जबकि उसका हृदय तो आपसे पहले ही मिल चुका है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
सखीति ॥ कुसुमेषुणा कामेनाभितप्ता पीडिता सा नायिका । हे सखि, दयितं मुनिमिहानयेति मां प्रहितवती भवदन्तिकं प्रेषितवती । किं त्वविमृश्यकारिणीयमि त्याहहृदयमिति । अहृदयामनस्का। तस्यास्त्वद्गतत्वादिति भावः । अत एव सा पूर्वं प्रागेव भवदुपकण्ठं त्वत्समीपमुपागतं हृदयं मनो न विवेद । नाम संभावनायाम् । अतो मत्प्रेषणं व्यर्थं तस्यान्तरङ्गत्वाद्बहिरङ्गस्य दुर्बलत्वादिति भावः । एतेन मनःसङ्ग उक्तः । चक्षुःप्रीतिस्तु प्रागेव सर्वासामुक्तेति न पृथगुच्यते ॥
दृङ्मनःसङ्गसंकल्पा जागरः कृशता रतिः । ह्रीत्यागोन्मादमूर्ध्वान्ता इत्यनङ्गदशा दश॥ इति । तत्राद्यमवस्थाद्वयमयधायि । संप्रति काचित्क्रमनैरपेक्ष्येण सूचयति
पदच्छेदः
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| सखि | सखि (८.१) | O friend |
| दयितम् | दयित (२.१) | the beloved |
| इह | इह | here |
| आनय | आनय (आ√नी कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | bring |
| इति | इति | Thus |
| सा | तद् (१.१) | she |
| माम् | अस्मद् (२.१) | me |
| प्रहितवती | प्रहितवत् (प्र√धा+क्तवतु+ङीप्, १.१) | sent |
| कुसुमेषुणा | कुसुम–इषु (३.१) | by the one with flower-arrows (Kama) |
| अभितप्ता | अभितप्त (अभि√तप्+क्त, १.१) | tormented |
| हृदयम् | हृदय (२.१) | the heart |
| अहृदया | अहृदय (१.१) | Heartless one |
| न | न | not |
| नाम | नाम | indeed |
| पूर्वम् | पूर्वम् | already |
| भवदुपकण्ठम् | भवत्–उपकण्ठ (२.१) | to your vicinity |
| उपागतम् | उपागत (उप+आ√गम्+क्त, २.१) | having arrived |
| विवेद | विवेद (√विद् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | knew |
छन्दः
पुष्पिताग्रा []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | खि | द | यि | त | मि | हा | न | ये | ति | सा | मां | |
| प्र | हि | त | व | ती | कु | सु | मे | षु | णा | भि | त | प्ता |
| हृ | द | य | म | हृ | द | या | न | ना | म | पू | र्वं | |
| भ | व | दु | प | क | ण्ठ | मु | पा | ग | तं | वि | वे | द |
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