अन्वयः
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आसाम् लोचनानि उत्पलानां निचये तथा न अभिरतुम् उपलेभिरे, विषमच्छदगुच्छयूथिकासु च न, यथा हरितनयावयवेषु अभिरतुम् उपलेभिरे।
English Summary
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The eyes of the celestial women did not find as much delight in the clusters of blue lotuses or in the bunches of jasmine as they found in gazing upon the limbs of Arjuna, the son of Hari (Indra).
सारांश
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अप्सराओं की दृष्टि न तो कमलों पर टिकी और न ही जूही के फूलों के गुच्छों पर; वे केवल अर्जुन के दिव्य अंगों के सौन्दर्य को ही निहारती रहीं।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
नेत्यादि ॥ आसां लोचनानि हरितनयावयवेषु यथा तथा दलति विकसत्युत्पलानां निचयेऽमिरतिं नोपलेभिरे न प्रापुः। तथा विषमच्छदगुच्छाः सप्तपर्णस्तबका यूथिकमल्लिकाश्च तास्वभिरतिं नोपलेभिरे।
सप्तपर्णो विशालत्वक्शारदो विषमच्छदःइत्यमरः (अमरकोशः २.४.२३ ) । तथा रमणीयत्वात् । तदवयवानामित्यर्थः । इति चक्षुःप्रीतिरुक्ता ॥ अथ मनःसङ्गं सूचयति
पदच्छेदः
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| न | न | not |
| दलति | दलति (√दल् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | rested upon |
| निचये | निचय (७.१) | in the cluster |
| तथा | तथा | so much |
| उत्पलानाम् | उत्पल (६.३) | of blue lotuses |
| न | न | not |
| च | च | and |
| विषमच्छदगुच्छयूथिकासु | विषम–छद–गुच्छ–यूथिका (७.३) | in the clusters of Yuthika (jasmine) |
| अभिरतुम् | अभिरति (२.१) | delight |
| उपलेभिरे | उपलेभिरे (उप√लभ् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | they obtained |
| यथा | यथा | as |
| आसाम् | इदम् (६.३) | Their |
| हरितनयावयवेषु | हरि–तनय–अवयव (७.३) | on the limbs of Hari's son (Arjuna) |
| लोचनानि | लोचन (१.३) | the eyes |
छन्दः
पुष्पिताग्रा []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| न | द | ल | ति | नि | च | ये | त | थो | त्प | ला | नां | |
| न | च | वि | ष | म | च्छ | द | गु | च्छ | यू | थि | का | सु |
| अ | भि | र | तु | मु | प | ले | भि | रे | य | था | सां | |
| ह | रि | त | न | या | व | य | वे | षु | लो | च | ना | नि |
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