तनुमवजितलोकसारधाम्नीं
त्रिभुवनगुप्तिसहां विलोकयन्त्यः ।
अवययुरमरस्त्रियोऽस्य यत्नं
विजयफले विफलं तपोधिकारे ॥
तनुमवजितलोकसारधाम्नीं
त्रिभुवनगुप्तिसहां विलोकयन्त्यः ।
अवययुरमरस्त्रियोऽस्य यत्नं
विजयफले विफलं तपोधिकारे ॥
त्रिभुवनगुप्तिसहां विलोकयन्त्यः ।
अवययुरमरस्त्रियोऽस्य यत्नं
विजयफले विफलं तपोधिकारे ॥
अन्वयः
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अविजित-लोक-सार-धाम्नीं त्रिभुवन-गुप्ति-सहां अस्य तनुं विलोकयन्त्यः अमर-स्त्रियः, अस्य यत्नं विजय-फले (सति) तपः-अधिकारे विफलम् अवययुः।
English Summary
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Beholding his body, which surpassed the essence of all worlds in lustre and was capable of protecting the three worlds, the celestial women inferred that their effort to disrupt his penance would be fruitless, as victory was its certain outcome.
सारांश
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जगत के सारभूत तेज और त्रिलोक की रक्षा में समर्थ उनके शरीर को देखकर अप्सराओं को अपनी लुभाने की शक्ति व्यर्थ लगी।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
तनुमिति ॥ अवजिते तिरस्कृते लोकानां सारधाम्नी सत्त्वतेजसी यया ताम् ।
अन उपधा- (अष्टाध्यायी ४.१.२८ ) इत्यादिना ङीप् । त्रयाणां भुवनानां समाहारस्त्रिभुवनम्।तद्धितार्थ- (अष्टाध्यायी २.१.५१ ) इत्यादिना समाहारार्थे तत्पुरुषः । पात्रादित्वात्स्त्रीत्वप्रतिषेधः । तस्य गुप्तौ रक्षणे सहा समर्थाम् । पचाद्यच् । तनुं मूर्त्तिं विलोकयन्त्योऽमरस्त्रियोऽप्सरसो विजयफले विजयार्थे तपोधिकारे तपोनुष्ठानेऽस्यार्जुनस्य यत्नं विफलभवययुर्मेनिरे । त्रैलोक्याधिपत्यादिमहाफलसाधनसमर्थस्य तुच्छफलाभिलाषो मत्तमातङ्गमांसभोगोचितस्य कण्ठीरवस्य जीर्णतृणचर्वणोत्कण्ठेव न शोशामावहतीति भावः ।अत्र विशिष्टतनुविलोकनस्य स्त्रीविशेषणवैफल्यजननहेतुत्वोक्त्या पदार्थहेतुकं काव्यलिङ्गमलंकारः ॥
पदच्छेदः
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| तनुम् | तनु (२.१) | body |
| अवजितलोकसारधाम्नीम् | अवजित (अव√जि+क्त)–लोक–सार–धामन् (२.१) | which surpassed in lustre the essence of all worlds |
| त्रिभुवनगुप्तिसहाम् | त्रिभुवन–गुप्ति–सह (२.१) | capable of protecting the three worlds |
| विलोकयन्त्यः | विलोकयन्त् (वि√लोक्+णिच्+शतृ, १.३) | seeing |
| अवययुः | अवययुः (अव√इ कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | understood |
| अमरस्त्रियः | अमर–स्त्री (१.३) | the celestial women |
| अस्य | इदम् (६.१) | his |
| यत्नम् | यत्न (२.१) | effort |
| विजयफले | विजय–फल (७.१) | when victory is the fruit |
| विफलम् | विफल (२.१) | fruitless |
| तपोधिकारे | तपस्–अधिकार (७.१) | in the matter of austerity |
छन्दः
पुष्पिताग्रा []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | नु | म | व | जि | त | लो | क | सा | र | धा | म्नीं | |
| त्रि | भु | व | न | गु | प्ति | स | हां | वि | लो | क | य | न्त्यः |
| अ | व | य | यु | र | म | र | स्त्रि | यो | ऽस्य | य | त्नं | |
| वि | ज | य | फ | ले | वि | फ | लं | त | पो | धि | का | रे |
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