अचकमत सपल्लवां धरित्रीं
मृदुसुरभिं विरहय्य पुष्पशय्याम् ।
भृशमरतिमवाप्य तत्र चास्या-
स्तव सुखशीतमुपैतुमङ्कमिच्छा ॥
अचकमत सपल्लवां धरित्रीं
मृदुसुरभिं विरहय्य पुष्पशय्याम् ।
भृशमरतिमवाप्य तत्र चास्या-
स्तव सुखशीतमुपैतुमङ्कमिच्छा ॥
मृदुसुरभिं विरहय्य पुष्पशय्याम् ।
भृशमरतिमवाप्य तत्र चास्या-
स्तव सुखशीतमुपैतुमङ्कमिच्छा ॥
अन्वयः
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अस्याः इच्छा सपल्लवां धरित्रीम् अचकमत, मृदुसुरभिं पुष्पशय्यां विरहय्य, तत्र भृशम् अरतिम् अवाप्य च, तव सुखशीतम् अङ्कम् उपैतुम् (अस्ति) ।
English Summary
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Her desire made her prefer the earth with its fresh sprouts, having abandoned the soft, fragrant flower-bed. And having become extremely restless there, she wishes to attain your pleasantly cool lap.
सारांश
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वह पुष्प-शय्या छोड़कर भूमि पर लोट रही है और अत्यधिक व्याकुलता के कारण अब आपकी शीतल गोद में स्थान पाने की अभिलाषा करती है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
अचकमतेति ॥ किं वाच्यं चेत्याह-सा स्त्री मृद्धी सुरभिश्च या तां मृदुसुरभिं पुष्पशय्यां विरहय्य विहाय सपल्लवां धरित्रीमचकमतैच्छत् । तस्यास्ततोऽपि शीतलत्वादिति भावः । कमेर्णिङन्ताल्लङ् ।
णिश्रिद्रुस्रुभ्यः कर्तरि चङ् (अष्टाध्यायी ३.१.४८ ) इति द्विर्भाव इति केचित् । तन्न । अचीकमतेति प्रसङ्गात् । अतो णिङभावपक्षे 'कमेश्चलेश्चङ् वक्तव्यः' इति वक्तव्याच्चङि रूपमेतत् । अस्या नायिकायास्तत्र धरित्र्यामपि भृशमरतिं दुःख भवाप्य । सुखयतीति सुखः शीतः शीतलश्च तं सुखशीतं तवाङ्कमुत्सङ्गमुपैतुमिच्छा । वर्तत इति शेषः । अस्याश्चौत्सुक्यं कथितम् । अत्रारतिजागरौ सुव्यक्तावित्यस्या नायिकायाः क्रमेण पुष्पशय्याद्यनेकाधारसंबन्धकथनात्प्रथमः पर्यायालंकारः । तदुक्तम्'क्रमेणैकमनेकसिन्नाधारे वर्तते यदि । एकस्मिन्नथवानेकं पर्यायालंकृतिर्द्विधाः ॥ इति लक्षणात् ॥
पदच्छेदः
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| अचकमत | अचकमत (आ√कम् +णिच् कर्तरि लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | desired |
| सपल्लवाम् | स–पल्लव (२.१) | with fresh sprouts |
| धरित्रीम् | धरित्री (२.१) | the earth |
| मृदुसुरभिम् | मृदु–सुरभि (२.१) | soft and fragrant |
| विरहय्य | विरहय्य (वि√रह्+णिच्+ल्यप्) | having abandoned |
| पुष्पशय्याम् | पुष्प–शय्या (२.१) | the bed of flowers |
| भृशम् | भृशम् | greatly |
| अरतिम् | अरति (२.१) | restlessness |
| अवाप्य | अवाप्य (अव√आप्+ल्यप्) | having attained |
| तत्र | तत्र | there |
| च | च | and |
| अस्याः | इदम् (६.१) | her |
| तव | युष्मद् (६.१) | your |
| सुखशीतम् | सुख–शीत (२.१) | pleasantly cool |
| उपैतुम् | उपैतुम् (उप√इ+तुमुन्) | to attain |
| अङ्कम् | अङ्क (२.१) | lap |
| इच्छा | इच्छा (१.१) | the desire |
छन्दः
पुष्पिताग्रा []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | च | क | म | त | स | प | ल्ल | वां | ध | रि | त्रीं | |
| मृ | दु | सु | र | भिं | वि | र | ह | य्य | पु | ष्प | श | य्याम् |
| भृ | श | म | र | ति | म | वा | प्य | त | त्र | चा | स्या | |
| स्त | व | सु | ख | शी | त | मु | पै | तु | म | ङ्क | मि | च्छा |
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