कथमिव तव संमतिर्भवित्री
समम् ऋतुभिर्मुनिनावधीरितस्य ।
इति विरचितमल्लिकाविकासः
स्मयत इव स्म मधुं निदाघकालः ॥
कथमिव तव संमतिर्भवित्री
समम् ऋतुभिर्मुनिनावधीरितस्य ।
इति विरचितमल्लिकाविकासः
स्मयत इव स्म मधुं निदाघकालः ॥
समम् ऋतुभिर्मुनिनावधीरितस्य ।
इति विरचितमल्लिकाविकासः
स्मयत इव स्म मधुं निदाघकालः ॥
अन्वयः
AI
मुनिना अवधीरितस्य तव ऋतुभिः समं कथम् इव संमतिः भवित्री? इति विरचितमल्लिकाविकासः निदाघकालः मधुं स्मयते इव स्म।
English Summary
AI
The summer season, having made the jasmine flowers bloom, seemed to smile at the spring season, saying: 'You have been disregarded by the sage (Arjuna); how then can you have an accord with the other seasons?'
सारांश
AI
मल्लिका पुष्पों के खिलने से ग्रीष्म ऋतु मानो वसन्त पर हंसते हुए कह रही थी कि जो मुनि उसे ही ठुकरा चुका है, वह ग्रीष्म को क्या अपनाएगा।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
कथमिति ॥ विरचितमल्लिकाविकासो निदाधकालो ग्रीष्मो ऋतुभिर्वर्षादिभिः समं मुनिनावधीरितस्य तिरस्कृतस्य तव संमतिर्लोके योग्यत्वेनानुमतिर्मान्यत्वं कथमिव भवित्री । न संमानः कथंचिद्भविष्यतीत्यर्थः । इतीत्थं मधुर्वसन्तः ।
चैत्रे दैत्ये वसन्ते च जीवे कोके मधुः स्मृतः इति विश्वः । स्मयते स्मेव जहास किमित्युत्प्रेक्षा।लट् स्मे (अष्टाध्यायी ३.२.११८ ) इति भूतार्थे लट् । प्रहासस्य शुभ्रत्वेन कविप्रसिद्धेर्मल्लिकाविकासे ह्रासत्वाध्यवसायः। अत्रर्तुभिः सममवधीरितस्येत्यत्राभेदाध्यवसायमूला सहोक्तिरलंकारः । संबन्धभेदभिन्नस्यावधीरणस्याभिन्नतयाध्यवसायात्तदेवावधीरणमसंमतिद्वारा स्मयोत्प्रेक्षेत्यनयोरङ्गाङ्गिभावेन संकरः ॥
पदच्छेदः
AI
| कथम् | कथम् | How |
| इव | इव | as if |
| तव | युष्मद् (६.१) | your |
| संमतिः | संमति (१.१) | agreement |
| भवित्री | भवित्री (√भू+तृच्+ङीप्, १.१) | will be |
| समम् | समम् | with |
| ऋतुभिः | ऋतु (३.३) | with the seasons |
| मुनिना | मुनि (३.१) | by the sage (Arjuna) |
| अवधीरितस्य | अवधीरित (अव√धीर्+क्त, ६.१) | of the one who has been disregarded |
| इति | इति | Thus |
| विरचितमल्लिकाविकासः | विरचित–मल्लिका–विकास (१.१) | he who has caused the jasmine to bloom |
| स्मयते | स्मयते (√स्मि कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | smiles |
| इव | इव | as if |
| स्म | स्म | (makes past tense) |
| मधुम् | मधु (२.१) | at Spring |
| निदाघकालः | निदाघ–काल (१.१) | The summer season |
छन्दः
पुष्पिताग्रा []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क | थ | मि | व | त | व | सं | म | ति | र्भ | वि | त्री | |
| स | म | मृ | तु | भि | र्मु | नि | ना | व | धी | रि | त | स्य |
| इ | ति | वि | र | चि | त | म | ल्लि | का | वि | का | सः | |
| स्म | य | त | इ | व | स्म | म | धुं | नि | दा | घ | का | लः |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.