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॥ अथ नवमः सर्गः ॥
९.१
वीक्ष्य रन्तुमनसः सुरनारी-
रात्तचित्रपरिधानविभूषाः ।
तत्प्रियार्थमिव यातुमथास्तं
भानुमानुपपयोधि ललम्बे ॥
सारांश AI सुंदर वस्त्राभूषणों से सुसज्जित और क्रीड़ा की इच्छुक देवांगनाओं को देखकर, मानो उनके सुख के लिए भगवान सूर्य अस्ताचल की ओर चल दिए।
९.२
मध्यमोपलनिभे लसदंशा-
वेकतश्च्युतिमुपेयुषि भानौ ।
द्यौरुवाह परिवृत्तिविलोलां
हारयष्टिमिव वासरलक्ष्मीम् ॥
सारांश AI सूर्य रूपी मध्य मणि के एक ओर झुक जाने पर आकाश ने दिन की शोभा को एक ओर खिसकती हुई चंचल मुक्तावली के समान धारण किया।
९.३
अंशुपाणिभिरतीव पिपासुः
पद्मजं मधु भृशं रसयित्वा ।
क्षीबतामिव गतः क्षितिमेष्यं-
ल्लोहितं वपुरुवाह पतङ्गः ॥
सारांश AI किरणों रूपी हाथों से कमलों का मकरंद पीकर मतवाले हुए सूर्य ने पृथ्वी की ओर आते समय लाल वर्ण धारण कर लिया।
९.४
गम्यतामुपगते नयनानां
लोहितायाति सहस्रमरीचौ ।
आससाद विरहय्य धरित्रीं
चक्रवाकहृदयान्यभितापः ॥
सारांश AI सूर्य के अस्त होने पर पृथ्वी को छोड़कर विरह का संताप चक्रवाक पक्षियों के हृदयों में समा गया।
९.५
मुक्तमूललघुरुज्झितपूर्वः
पश्चिमे नभसि सम्भृतसान्द्रः ।
सामि मज्जति रवौ न विरेजे
खिन्नजिह्म इव रश्मिसमूहः ॥
सारांश AI आधा डूबे हुए सूर्य की किरणों का समूह, जो पश्चिम में सघन था, किसी थके हुए टेढ़े-मेढ़े पुंज के समान आभाहीन होकर डूब गया।
९.६
कान्तदूत्य इव कुङ्कुमताम्राः
सायमण्डलमभि त्वरयन्त्यः ।
सादरं ददृशिरे वनिताभिः
सौधजालपतिता रविभासः ॥
सारांश AI प्रेमियों की दूती के समान झरोखों से आती सूर्य की केसरिया किरणें स्त्रियों द्वारा आदरपूर्वक देखी गईं।
९.७
अग्रसानुषु नितान्तपिशङ्गै-
र्भूरुहान्मृदुकरैरवलम्ब्य ।
अस्तशैलगहनं नु विवस्वा-
नाविवेश जलधिं नु महीं नु ॥
सारांश AI शिखर के वृक्षों का कोमल किरणों से सहारा लेकर सूर्य मानो समुद्र, पृथ्वी या अस्ताचल की गुफाओं में समा गए।
९.८
आकुलश्चलपतत्रिकुलाना-
मारवैरनुदितौषसरागः ।
आययावहरिदश्वविपाण्डु-
स्तुल्यतां दिनमुखेन दिनान्तः ॥
सारांश AI पक्षियों के कलरव से युक्त और सूर्य के घोड़ों के अभाव में पीली पड़ी संध्या, प्रातःकाल के समान प्रतीत होने लगी।
९.९
आस्थितः स्थगितवारिदपङ्क्त्या
संध्यया गगनपश्चिमभागः ।
सोर्मिविद्रुमविन्तानविभासा
रञ्जितस्य जलधेः श्रियमूहे ॥
सारांश AI बादलों की पंक्तियों और संध्या की लाली से युक्त पश्चिमी आकाश, लहरों और मूंगों से सुशोभित समुद्र की शोभा पाने लगा।
९.१०
प्राञ्जलावपि जने नतमूर्ध्नि
प्रेम तत्प्रवणचेतसि हित्वा ।
संध्ययानुविदधे विरमन्त्या
चापलेन सुजनेतरमैत्री ॥
सारांश AI अस्त होती संध्या ने सूर्य का साथ छोड़ दिया, मानो किसी चंचल व्यक्ति ने अपने समर्पित और सज्जन मित्र से मित्रता तोड़ ली हो।
९.११
औषसातपभयादपलीनं
वासरच्छविविरामपटीयः ।
संनिपत्य शनकैरिव निम्ना-
दन्धकारमुदवाप समानि ॥
सारांश AI धूप के डर से छिपे हुए और दिन की कांति समाप्त होते ही प्रबल हुए अंधकार ने गड्ढों से निकलकर धीरे-धीरे समतल भूमि को व्याप्त कर लिया।
९.१२
एकतामिव गतस्य विवेकः
कस्यचिन्न महतोऽप्युपलेभे ।
भास्वता निदधिरे भुवनाना-
मात्मनीव पतितेन विशेषाः ॥
सारांश AI अस्त होते हुए सूर्य के साथ ही संसार के समस्त विशेष गुण मानो उसी में विलीन हो गए, जिससे भेद मिट गए और सब कुछ एक जैसा दिखने लगा।
९.१३
इच्छतां सह वधूभिरभेदं
यामिनीविरहिणां विहगानाम् ।
आपुरेव मिथुनानि वियोगं
लङ्घ्यते न खलु कालनियोगः ॥
सारांश AI पत्नियों के साथ रहने की इच्छा रखने वाले चक्रवाक पक्षियों को भी वियोग सहना पड़ा, क्योंकि काल के विधान का उल्लंघन असंभव है।
९.१४
यच्छति प्रतिमुखं दयितायै
वाचमन्तिकगतेऽपि शकुन्तौ ।
नीयते स्म नतिमुज्झितहर्षं
पङ्कजं मुखमिवाम्बुरुहिण्या ॥
सारांश AI रात्रि के आने पर कमलिनी ने अपना विकसित मुख बंद कर लिया, मानो प्रिय के समीप होने पर भी उसने शोक में सिर झुका लिया हो।
९.१५
रञ्जिता नु विविधास्तरुशैला
नामितं नु गगनं स्थगितं नु ।
पूरिता नु विषमेषु धरित्री
संहृता नु ककुभस्तिमिरेण ॥
सारांश AI अंधकार ने मानो वृक्षों-पर्वतों को रंग दिया, आकाश को झुका दिया, पृथ्वी के ऊंच-नीच को भर दिया और दिशाओं को समेट लिया।
९.१६
रात्रिरागमलिनानि विकासं
पङ्कजानि रहयन्ति विहाय ।
स्पष्टतारकमियाय नभः श्री-
र्वस्तुमिच्छति निरापदि सर्वः ॥
सारांश AI रात्रि आने पर कमल मुरझा गए और आकाश तारों से जगमगा उठा; वास्तव में हर कोई संकटमुक्त स्थान में रहना चाहता है।
९.१७
व्यानशे शशधरेण विमुक्तः
केतकीकुसुमकेसरपाण्डुः ।
चूर्णमुष्टिरिव लम्भितकान्ति-
र्वासवस्य दिशमंशुसमूहः ॥
सारांश AI चंद्रमा द्वारा छोड़ी गई केतकी के पराग जैसी श्वेत किरणें पूर्व दिशा में बिखेरी गई चूर्ण की मुट्ठी के समान फैल गईं।
९.१८
उज्झती शुचमिवाशु तमिस्रा-
मन्तिकं व्रजति तारकराजे ।
दिक्प्रसादगुणमण्डनमूहे
रश्मिहासविशदं मुखमैन्द्री ॥
सारांश AI चंद्रमा के समीप आने पर पूर्व दिशा का मुख किरणों की मुस्कान से उज्ज्वल हो उठा और उसने अंधकार रूपी शोक को त्याग दिया।
९.१९
नीलनीरजनिभे हिमगौरं
शैलरुद्धवपुषः सितरश्मेः ।
खे रराज निपतत्करजालं
वारिधेः पयसि गाङ्गमिवाम्भः ॥
सारांश AI पहाड़ के पीछे स्थित चंद्रमा की नीले आकाश में गिरती हुई श्वेत किरणें समुद्र के जल में गिरती गंगा की धारा के समान सुशोभित हुईं।
९.२०
द्यां निरुन्धदतिनीलघनाभं
ध्वान्तमुद्यतकरेण पुरस्तात् ।
क्षिप्यमाणमसितेतरभासा
शम्भुनेव करिचर्म चकासे ॥
सारांश AI चंद्रमा की किरणों द्वारा हटाया जाता हुआ सघन अंधकार ऐसा लगा मानो भगवान शिव अपने हाथों से गज-चर्म को झटक रहे हों चुका।
९.२१
अन्तिकान्तिकगतेन्दुविसृष्टे
जिह्मतां जहति दीधितिजाले ।
निःसृतस्तिमिरभारनिरोधा-
दुच्छ्वसन्निव रराज दिगन्तः ॥
सारांश AI चंद्रमा के ऊपर उठने और उसकी किरणों के सीधा फैलने से अंधकार का जाल दूर हो गया, जिससे दिशाओं के छोर अंधकार के भारी दबाव से मुक्त होकर मानो सुख की सांस लेते हुए सुशोभित होने लगे।
९.२२
लेखया विमलविद्रुमभासा
संततं तिमिरमिन्दुरुदासे ।
दंष्ट्रया कनकटङ्कपिशङ्ग्या
मण्डलं भुव इवादिवराहः ॥
सारांश AI स्वच्छ मूँगे के समान कांति वाली अपनी किरण रेखा से चंद्रमा ने सघन अंधकार को वैसे ही दूर कर दिया, जैसे स्वर्ण के कुदाल की तरह पीली अपनी दाढ़ से आदिवराह ने पृथ्वी मंडल को ऊपर उठाया था।
९.२३
दीपयन्नथ नभः किरणौघैः
कुङ्कुमारुणपयोधरगौरः ।
हेमकुम्भ इव पूर्वपयोधे-
रुन्ममज्ज शनकैस्तुहिनांशुः ॥
सारांश AI अपनी किरणों के समूह से आकाश को प्रकाशित करते हुए और केसर के समान लाल बादलों की आभा वाले चंद्रमा, पूर्वी समुद्र से धीरे-धीरे वैसे ही ऊपर आए जैसे कोई सोने का घड़ा जल से बाहर निकल रहा हो।
९.२४
उद्गतेन्दुमविभिन्नतमिस्रां
पश्यति स्म रजनीमवितृप्तः ।
व्यंशुकस्फुटमुखीमतिजिह्मां
व्रीडया नववधूमिव लोकः ॥
सारांश AI चंद्रमा के उदय होने पर भी जहाँ अंधकार पूरी तरह मिटा नहीं था, उस रात्रि को लोग अपलक देखते रहे; वह रात्रि लज्जा के कारण झुककर अपना मुख दिखाने वाली नववधू के समान प्रतीत हो रही थी।
९.२५
न प्रसादमुचितं गमिता द्यै-
र्नोद्धृतं तिमिरमद्रिवनेभ्यः ।
दिङ्मुखेषु न च धाम विकीर्णं
भूषितैव रजनी हिमभासा ॥
सारांश AI न तो आकाश अभी पूरी तरह स्वच्छ हुआ था, न पर्वतों के वनों से अंधकार दूर हुआ था और न ही दिशाओं के मुख पर प्रकाश पूरी तरह फैला था, फिर भी वह रात्रि शीतल चाँदनी से सुशोभित हो गई थी।
९.२६
मानिनीजनविलोचनपाता-
नुष्णबाष्पकलुषान्प्रतिगृह्णन् ।
मन्दमन्दमुदितः प्रययौ खं
भीतभीत इव शीतमयूखः ॥
सारांश AI मानिनी स्त्रियों के गर्म आँसुओं से भरे कटाक्षों को मानो झेलते हुए, शीतल किरणों वाला चंद्रमा अत्यंत भयभीत सा होकर धीरे-धीरे आकाश की ओर बढ़ने लगा।
९.२७
श्लिष्यतः प्रियवधूरुपकण्ठं
तारकास्ततकरस्य हिमांशोः ।
उद्वमन्नभिरराज समन्ता-
दङ्गराग इव लोहितरागः ॥
सारांश AI अपनी किरण रूपी भुजाओं को फैलाकर अपनी प्रियतमा रूपी रात्रि का आलिंगन करने वाले चंद्रमा की वह लालिमा चारों ओर ऐसे शोभायमान हो रही थी, मानो शरीर पर लगाया गया लाल अंगराग हो।
९.२८
प्रेरितः शशधरेण करौघः
संहतान्यपि नुनोद तमांसि ।
क्षीरसिन्धुरिव मन्दरभिन्नः
काननान्यविरलोच्चतरूणि ॥
सारांश AI चंद्रमा द्वारा प्रेरित किरणों के समूह ने घने अंधकार को वैसे ही छिन्न-भिन्न कर दिया, जैसे मंदराचल पर्वत से मथे गए क्षीर सागर के जल ने ऊंचे और सघन वृक्षों वाले वनों को आप्लावित कर दिया था।
९.२९
शारतां गमितया शशिपादै-
श्छायया विटपिनां प्रतिपेदे ।
न्यस्तशुक्लबलिचित्रतलाभि-
स्तुल्यता वसतिवेश्ममहीभिः ॥
सारांश AI चंद्रमा की किरणों से चितकबरी हुई वृक्षों की छाया ऐसी लग रही थी, मानो घर के आँगन की भूमि सफेद पुष्पों और पूजन सामग्री की भेंट से चित्रित या सुसज्जित की गई हो।
९.३०
आतपे धृतिमता सह वध्वा
यामिनीविरहिणा विहगेन ।
सेहिरे न किरणा हिमरश्मे-
र्दुःखिते मनसि सर्वमसह्यम् ॥
सारांश AI अपनी मादा के साथ धूप को सहने वाले, किंतु अब रात्रि में विरही हुए चक्रवाक पक्षी से चंद्रमा की शीतल किरणें भी सहन नहीं हुईं; सच है कि दुखी मन के लिए सब कुछ असह्य हो जाता है।
९.३१
गन्धमुद्धतरजःकणवाही
विक्षिपन्विकसतां कुमुदानाम् ।
आदुधाव परिलीनविहङ्गा
यामिनीमरुदपां वनराजीः ॥
सारांश AI खिलते हुए कुमुदों की सुगंध और पराग कणों को चारों ओर बिखेरता हुआ रात्रि का समीर, शांत पक्षियों वाले जलाशयों और वन की श्रेणियों में तेजी से बहने लगा।
९.३२
संविधातुमभिषेकमुदासे
मन्मथस्य लसदंशुजलौघः ।
यामिनीवनितया ततचिह्नः
सोत्पलो रजतकुम्भ इवेन्दुः ॥
सारांश AI अपनी किरणों के जल-प्रवाह से युक्त और कलंक रूपी नीलकमल के चिन्ह वाला चंद्रमा, रात्रि रूपी नायिका द्वारा कामदेव के राज्याभिषेक के लिए उठाए गए चांदी के घड़े के समान सुशोभित हुआ।
९.३३
ओजसापि खलु नूनमनूनं
नासहायमुपयाति जयश्रीः
यद्विभुः शशिमयूखसखः
सन्नाददे विजयि चापमनङ्ग्-
अः
सारांश AI अत्यंत पराक्रमी होने पर भी विजय लक्ष्मी बिना सहायक के प्राप्त नहीं होती; तभी तो कामदेव ने चंद्रमा की किरणों का साथ पाकर ही अपने विजयी धनुष को धारण किया।
९.३४
सद्मनां विरचनाहितशोभै-
रागतप्रियकथैरपि दूत्यम् ।
संनिकृष्टरतिभिः सुरदारै-
र्भूषितैरपि विभूषणमीषे ॥
सारांश AI यद्यपि घरों की सजावट हो चुकी थी और दूतियों ने प्रियतम के आने का समाचार सुना दिया था, फिर भी मिलन के लिए उत्सुक देवांगनाओं ने स्वयं को और अधिक सजाने हेतु आभूषणों की इच्छा की।
९.३५
न स्रजो रुरुचिरे रमणीभ्य-
श्चन्दनानि विरहे मदिरा वा ।
साधनेषु हि रतेरुपधत्ते
रम्यतां प्रियसमागम एव ॥
सारांश AI विरह की अवस्था में स्त्रियों को न मालाएँ अच्छी लगीं, न चंदन और न ही मदिरा; वास्तव में रति के साधनों में रमणीयता तभी आती है जब प्रियतम का समागम निकट हो।
९.३६
प्रस्थिताभिरधिनाथनिवासं
ध्वंसितप्रियसखीवचनाभिः ।
मानिनीभिरपहस्तितधैर्यः
सादयन्निव मदोऽवललम्बे ॥
सारांश AI सखियों की बातों को अनसुना कर अपने स्वामियों के पास जाने वाली मानिनी स्त्रियों के धैर्य को नष्ट करते हुए, मादकता ने उन्हें ऐसे जकड़ लिया मानो वह उन्हें शिथिल कर रही हो।
९.३७
कान्तवेश्म बहु संदिशतीभि-
र्यातमेव रतये रमणीभिः ।
मन्मथेन परिलुप्तमतीनां
प्रायशः स्खलितमप्युपकारि ॥
सारांश AI अपने प्रियतम के घर बार-बार संदेश भेजती हुई स्त्रियाँ स्वयं ही रति के लिए वहाँ पहुँच गईं; कामदेव द्वारा बुद्धि हर लिए जाने पर अक्सर की गई गलतियाँ भी उपकारी सिद्ध होती हैं।
९.३८
आशु कान्तमभिसारितवत्या
योषितः पुलकरुद्धकपोलम् ।
निर्जिगाय मुखमिन्दुमखण्डं
खण्डपत्रतिलकाकृति कान्त्या ॥
सारांश AI शीघ्रता से प्रियतम के पास पहुँचने वाली उस स्त्री के रोमांचित कपोलों और पत्रलेख से सजे मुख ने अपनी कांति से पूर्ण चंद्रमा को भी जीत लिया।
९.३९
उच्यतां स वचनीयमशेषं
नेश्वरे परुषता सखि साध्वी ।
आनयैनमनुनीय कथं वा
विप्रियाणि जनयन्ननुनेयः ॥
सारांश AI हे सखि! उससे मेरी सारी शिकायतें कह देना, पर प्रियतम के प्रति कठोरता उचित नहीं। उसे मनाकर ले आओ; अथवा जो बार-बार अप्रिय कार्य करता है, वह मनाने योग्य कैसे हो सकता है?
९.४०
किं गतेन न हि युक्तमुपैतुं
कः प्रिये सुभगमानिनि मानः ।
योषितामिति कथासु समेतैः
कामिभिर्बहुरसा धृतिरूहे ॥
सारांश AI "जाने से क्या लाभ?", "मिलना ही उचित है", "प्रियतम से कैसा मान?"—स्त्रियों की ऐसी परस्पर बातों के बीच प्रेमियों ने विभिन्न रसों से युक्त धैर्य और आनंद का अनुभव किया।
९.४१
योषितः पुलकरोधि दधत्या
घर्मवारि नवसंगमजन्म ।
कान्तवक्षसि बभूव पतन्त्या
मण्डनं लुलितमण्डनतैव ॥
सारांश AI नवसंगम के पसीने और रोमांच को धारण करती हुई स्त्रियाँ जब प्रिय के वक्ष पर गिरीं, तब उनके अस्त-व्यस्त आभूषण ही उनका वास्तविक श्रृंगार बन गए।
९.४२
शीधुपानविधुरासु निगृह्ण-
न्मानमाशु शिथिलीकृतलज्जः ।
संगतासु दयितैरुपलेभे
कामिनीषु मदनो नु मदो नु ॥
सारांश AI मदिरा से विह्वल, लज्जाहीन और मान त्याग चुकी स्त्रियों के प्रियतम से मिलन पर यह स्पष्ट नहीं था कि यह कामदेव का प्रभाव है या मद का।
९.४३
द्वारि चक्षुरधिपाणि कपोलौ
कीवितं त्वयि कुतः कलहोऽस्याः ।
कामिनामिति वचः पुनरुक्तं
प्रीतये नवनवत्वमियाय ॥
सारांश AI द्वार पर टिकी दृष्टि, हाथों पर टिके कपोल और 'मेरा जीवन तुम्हीं हो' - प्रेमियों के ये पुनरुक्त वचन मानिनी स्त्रियों को बार-बार नवीन आनंद देने लगे।
९.४४
साचि लोचनयुगं नमयन्ती
रुन्धती दयितवक्षसि पातम् ।
सुभ्रुवो जनयति स्म विभूषां
संगतावुपरराम च लज्जा ॥
सारांश AI तिरछी नज़रों को झुकाते हुए और प्रिय के वक्ष पर गिरने से स्वयं को रोकती हुई स्त्रियों की लज्जा मिलन के क्षणों में समाप्त होकर उनके सौंदर्य का आभूषण बन गई।
९.४५
सव्यलीकमवधीरितखिन्नं
प्रस्थितं सपदि कोपपदेन ।
योषितः सुहृदिव स्म रुणद्धि
प्राणनाथमभिबाष्पनिपातः ॥
सारांश AI क्रोध के कारण तुरंत जाते हुए प्रियतम को स्त्रियों के गिरते हुए आँसुओं ने एक सच्चे मित्र की भाँति रोक लिया।
९.४६
शङ्किताय कृतबाष्पनि-
पातामीर्ष्यया विमुखितां दयिताय ।
मानिनिमभिमुखाहित-
चित्तां शंसति स्म घनरोमविभेदः ॥
सारांश AI ईर्ष्यावश विमुख होकर बैठी मानिनी स्त्री के रोमाञ्च ने उसके हृदय के उस अनुराग को प्रकट कर दिया, जिसे वह आँसुओं के माध्यम से छिपाना चाहती थी।
९.४७
लोलदृष्टि वदनं दयि-
तायाश्चुम्बति प्रियतमे रभसेन ।
व्रीडया सह विनीवि
नितम्बादंशुकं शिथिलतामुपपदे ॥
सारांश AI जब प्रियतम ने चंचल नेत्रों वाली सुंदरी का वेग से चुंबन लिया, तब लज्जा के साथ-साथ उसकी कमर से वस्त्र की गाँठ भी ढीली हो गई।
९.४८
ह्रीतय अगलितनीवि
निरस्यन्नन्तरीयमवलम्बितकाञ्चि ।
मण्डलीकृतपृथुस्तन-
भारं सस्वजे दयितया हृदयेशः ॥
सारांश AI लज्जावश जिसकी नीवी ढीली हो गई थी, उस सुंदरी ने करधनी का सहारा लेकर और अपने उन्नत स्तनों को समेटते हुए हृदयेश्वर का आलिंगन किया।
९.४९
आदृता नखपदैः परिरम्भा-
श्चुम्बितानि घनदन्तनिपातैः ।
सौकुमार्यगुणसम्भृतकीर्ति-
र्वाम एव सुरतेष्वपि कामः ॥
सारांश AI नख-क्षत युक्त आलिंगन और दंत-क्षत युक्त चुंबन दर्शाते हैं कि अत्यंत सुकुमार स्वभाव वाला कामदेव भी रति-क्रीड़ा के समय कठोर हो जाता है।
९.५०
पाणिपल्लवविधूननमन्तः
सीत्कृतानि नयनार्धनिमेषाः ।
योषितां रहसि गद्गदवाचा-
मस्त्रतामुपययुर्मदनस्य ॥
सारांश AI हाथों को झटकना, सीत्कार, अधखुले नेत्र और गदगद वाणी - एकांत में स्त्रियों के ये सभी हाव-भाव कामदेव के अस्त्रों में परिवर्तित हो गए।
॥ इति नवमः सर्गः ॥
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