अन्वयः
AI
साचि लोचनयुगं नमयन्ती, दयितवक्षसि पातं रुन्धती लज्जा, सुभ्रुवः संगतौ विभूषां जनयति स्म, उपरराम च।
English Summary
AI
During their union, the shyness of the beautiful-browed woman acted as her adornment; it made her cast her eyes sideways and checked her from falling onto her lover's chest. Then, that very shyness ceased to exist.
सारांश
AI
तिरछी नज़रों को झुकाते हुए और प्रिय के वक्ष पर गिरने से स्वयं को रोकती हुई स्त्रियों की लज्जा मिलन के क्षणों में समाप्त होकर उनके सौंदर्य का आभूषण बन गई।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
साचीति ॥ लोचनयुगं साचि तिर्यङ्गमयन्ती प्रिये तिर्यक्पातयन्ती । न तु समरेखयेत्यर्थः । दयितवक्षसि पातं रुन्धतीष्टमपि प्रतिबध्नती लज्जा सुभ्रुवो नायिकाया विभूषां शोभां जनयति स्म संगतौ सुरतप्रसङ्गे सत्युपरराम च । एवं यतस्तदा चाभूषणमेवेति भावः ।
विभाषाकर्मकात् इति परस्मैपदम् ॥
पदच्छेदः
AI
| साचि | साचि | sideways |
| लोचनयुगम् | लोचन–युग (२.१) | the pair of eyes |
| नमयन्ती | नमयन्ती (√नम्+णिच्+शतृ, १.१) | causing to bend |
| रुन्धती | रुन्धती (√रुध्+शतृ, १.१) | obstructing |
| दयितवक्षसि | दयित–वक्षस् (७.१) | on the lover's chest |
| पातम् | पात (२.१) | the fall |
| सुभ्रुवः | सुभ्रू (६.१) | of the one with beautiful eyebrows |
| जनयति | जनयति (√जन् +णिच् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | produced |
| स्म | स्म | (makes past tense) |
| विभूषाम् | विभूषा (२.१) | an adornment |
| संगतौ | संगत (७.१) | in union |
| उपरराम | उपरराम (उप√रम् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | ceased |
| च | च | and |
| लज्जा | लज्जा (१.१) | shyness |
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सा | चि | लो | च | न | यु | गं | न | म | य | न्ती |
| रु | न्ध | ती | द | यि | त | व | क्ष | सि | पा | तम् |
| सु | भ्रु | वो | ज | न | य | ति | स्म | वि | भू | षां |
| सं | ग | ता | वु | प | र | रा | म | च | ल | ज्जा |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.