अन्वयः
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तारक-राजे अन्तिकम् व्रजति (सति), तमिस्राम् आशु उज्झती (सती) इव, ऐन्द्री दिक्-प्रसाद-गुण-मण्डनम् रश्मि-हास-विशदम् मुखम् ऊहे ।
English Summary
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As the king of stars (the moon) approached, the eastern direction, as if quickly abandoning the darkness like grief, assumed a face that was bright with the smile of its rays and was an ornament of its own clearness.
सारांश
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चंद्रमा के समीप आने पर पूर्व दिशा का मुख किरणों की मुस्कान से उज्ज्वल हो उठा और उसने अंधकार रूपी शोक को त्याग दिया।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
उज्झतीति ॥ इन्द्रस्येयमैन्द्री दिक्प्राची तारकराजे नक्षत्रनाथे।
कनीनिकायां नक्षत्रे तारकं तारकापि च इति विश्वः । अन्तिकं समीपं व्रजति सति । आशु तमिस्रामन्धतमसम् । तमिस्रा स्त्री ध्वान्तनिशि निश्यन्धतमसे न ना इति वैजयन्ती। शुचमिव । विरहदुःखमिवेत्यर्थः । उज्झती विजहती प्रसादो नैर्मल्यमेव गुणः स एव मण्डनं यस्य तत् । रश्मयो हास इव तेन विशदं मुखमिव मुखमग्रभागम् । श्लिष्टोपमेयम् । ऊहे वहति स्म । अत्र दिक्चन्द्रयोर्नायिकानायकौपम्यं गम्यते ॥
पदच्छेदः
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| उज्झती | उज्झती (√उझ्झ्+शतृ, १.१) | abandoning |
| शुचम् | शुच् (२.१) | grief |
| इव | इव | as if |
| आशु | आशु | quickly |
| तमिस्राम् | तमिस्रा (२.१) | the darkness |
| अन्तिकं | अन्तिकम् | near |
| व्रजति | व्रजत् (√व्रज्+शतृ, ७.१) | as approached |
| तारकराजे | तारक–राजन् (७.१) | the king of stars (the moon) |
| दिक्प्रसादगुणमण्डनम् | दिक्–प्रसाद–गुण–मण्डन (२.१) | an ornament of the quality of clearness |
| ऊहे | ऊहे (√वह् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | assumed |
| रश्मिहासविशदं | रश्मि–हास–विशद (२.१) | bright with the smile of its rays |
| मुखम् | मुख (२.१) | a face |
| ऐन्द्री | ऐन्द्री (१.१) | the eastern direction |
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उ | ज्झ | ती | शु | च | मि | वा | शु | त | मि | स्रा |
| म | न्ति | कं | व्र | ज | ति | ता | र | क | रा | जे |
| दि | क्प्र | सा | द | गु | ण | म | ण्ड | न | मू | हे |
| र | श्मि | हा | स | वि | श | दं | मु | ख | मै | न्द्री |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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