प्राञ्जलावपि जने नतमूर्ध्नि
प्रेम तत्प्रवणचेतसि हित्वा ।
संध्ययानुविदधे विरमन्त्या
चापलेन सुजनेतरमैत्री ॥
प्राञ्जलावपि जने नतमूर्ध्नि
प्रेम तत्प्रवणचेतसि हित्वा ।
संध्ययानुविदधे विरमन्त्या
चापलेन सुजनेतरमैत्री ॥
प्रेम तत्प्रवणचेतसि हित्वा ।
संध्ययानुविदधे विरमन्त्या
चापलेन सुजनेतरमैत्री ॥
अन्वयः
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विरमन्त्या संध्यया प्राञ्जलौ नत-मूर्ध्नि तत्-प्रवण-चेतसि जने अपि प्रेम हित्वा चापलेन सुजन-इतर-मैत्री अनुविदधे ।
English Summary
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The departing twilight, by its fickleness, abandoning its affection for the people who were devoted to it with bowed heads and folded hands, imitated the friendship of the wicked.
सारांश
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अस्त होती संध्या ने सूर्य का साथ छोड़ दिया, मानो किसी चंचल व्यक्ति ने अपने समर्पित और सज्जन मित्र से मित्रता तोड़ ली हो।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
प्राञ्जलाविति ॥ प्रबद्धोऽञ्जलिर्येन तस्मिन्प्राञ्जलौ बद्धाञ्जलौ ।
तौ युतावञ्जलिः पुमान् इत्यमरः (अमरकोशः २.६.८६ ) । प्रादिभ्यो धातुजस्य बहुव्रीहिर्वाच्यो वोत्तरपदलोपश्च । नतमूर्ध्नि नमस्कुर्वाणे तत्प्रवणं तत्र संध्यायामेवाहितं चेतो यस्य तस्मिन्नेवंविधेऽपि जने विषये प्रेम हित्वा विहाय विरमन्त्या निवर्तमानया । च्याङ्परिभ्यो रमः इति परस्मैपदम् । संध्यया चापलेनास्थैर्येण । युवादित्वादण्प्रत्ययः । सुजनादितरो दुर्जनस्तस्य मैत्री सख्यमनुविदधेऽनुचक्रे । कर्मणि लिट् । यथा दुर्जनमैत्री स्निह्यन्तमपि जहाति तद्वत्संध्यापि सेवमानं जनमहासीदित्यर्थः । मित्रस्य कर्म मैत्री । अणन्तान्ङीप् । अत्र संध्यादुर्जनमैत्र्योश्चापलं समानधर्मोऽनुविधानम् । अत एवार्थरूपेणेयमुपमा ॥
पदच्छेदः
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| प्राञ्जलौ | प्राञ्जलि (७.१) | with folded hands |
| अपि | अपि | even |
| जने | जन (७.१) | for the people |
| नतमूर्ध्नि | नत–मूर्धन् (७.१) | with bowed heads |
| प्रेम | प्रेमन् (२.१) | affection |
| तत्प्रवणचेतसि | तद्–प्रवण–चेतस् (७.१) | whose minds were devoted to it |
| हित्वा | हित्वा (√हा+क्त्वा) | having abandoned |
| संध्यया | संध्या (३.१) | by the twilight |
| अनुविदधे | अनुविदधे (अनु+वि√धा कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was imitated |
| विरमन्त्या | विरमन्ती (वि√रम्+शतृ, ३.१) | departing |
| चापलेन | चापल (३.१) | by the fickleness |
| सुजनेतरमैत्री | सुजन–इतर–मैत्री (१.१) | the friendship of the wicked |
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्रा | ञ्ज | ला | व | पि | ज | ने | न | त | मू | र्ध्नि |
| प्रे | म | त | त्प्र | व | ण | चे | त | सि | हि | त्वा |
| सं | ध्य | या | नु | वि | द | धे | वि | र | म | न्त्या |
| चा | प | ले | न | सु | ज | ने | त | र | मै | त्री |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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