अन्वयः
AI
सहस्र-मरीचौ नयनानाम् गम्यताम् उपगते (सति) लोहितायति (सति च), अभितापः धरित्रीम् विरहय्य चक्रवाक-हृदयानि आससाद ।
English Summary
AI
As the thousand-rayed sun became visible to the eyes and grew red, sorrow, leaving the earth behind, took possession of the hearts of the Chakravaka birds.
सारांश
AI
सूर्य के अस्त होने पर पृथ्वी को छोड़कर विरह का संताप चक्रवाक पक्षियों के हृदयों में समा गया।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
गम्यतामिति ॥ सहस्रमरीचौ सूर्ये । लोहितो भवतीति लोहितायति ।
लोहितादिडाज्भ्यः क्यप् इति क्यप् । वा क्यप: इति परस्मैपदे शतृप्रत्ययः । अतएव नयनानां गम्यतामुपगते दर्शनीयतां प्राप्ते सत्यभितापो धरित्रीं विरहय्य विहाय । ल्यपि लघुपूर्वात् (अष्टाध्यायी ६.४.५६ ) इत्ययादेशः । चक्रवाकहृदयान्याससाद प्राप । अत्र धरित्र्या यादृशस्तीव्रार्ककरकृतसंतापस्तादृक्चक्रवाकहृदयेषु विरहसंतापः संजात इति परमार्थः। परंतु तदुपक्रमानन्तरमेतस्याविर्भावात्स एवात्र संक्रान्त इत्यभेदाध्यवसायेनोपदेशः। अतएव भेदेऽभेदरूपातिशयोक्तिरलंकारः ॥
पदच्छेदः
AI
| गम्यताम् | गम्यता (२.१) | accessibility |
| उपगते | उपगत (उप√गम्+क्त, ७.१) | having reached |
| नयनानां | नयन (६.३) | of the eyes |
| लोहितायति | लोहितायत् (√लोहित+क्यच्+शतृ, ७.१) | while becoming red |
| सहस्रमरीचौ | सहस्र–मरीचि (७.१) | the thousand-rayed sun |
| आससाद | आससाद (आ√सद् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | approached |
| विरहय्य | विरहय्य (वि√रह्+णिच्+ल्यप्) | having left |
| धरित्रीं | धरित्री (२.१) | the earth |
| चक्रवाकहृदयानि | चक्रवाक–हृदय (२.३) | the hearts of the Chakravaka birds |
| अभितापः | अभिताप (१.१) | sorrow |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ग | म्य | ता | मु | प | ग | ते | न | य | ना | नां |
| लो | हि | ता | या | ति | स | ह | स्र | म | री | चौ |
| आ | स | सा | द | वि | र | ह | य्य | ध | रि | त्रीं |
| च | क्र | वा | क | हृ | द | या | न्य | भि | ता | पः |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.