किं गतेन न हि युक्तमुपैतुं
कः प्रिये सुभगमानिनि मानः ।
योषितामिति कथासु समेतैः
कामिभिर्बहुरसा धृतिरूहे ॥
किं गतेन न हि युक्तमुपैतुं
कः प्रिये सुभगमानिनि मानः ।
योषितामिति कथासु समेतैः
कामिभिर्बहुरसा धृतिरूहे ॥
कः प्रिये सुभगमानिनि मानः ।
योषितामिति कथासु समेतैः
कामिभिर्बहुरसा धृतिरूहे ॥
अन्वयः
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समेतैः कामिभिः "किं गतेन? उपैतुम् युक्तं न हि। सुभगमानिनि प्रिये कः मानः?" इति योषितां कथासु बहुरसा धृतिः ऊहे।
English Summary
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Assembled lovers, while talking about women, experienced a multi-faceted pleasure. Their conversations revolved around topics like: "What's the use of her leaving in a huff? It's not right for her to approach now!" and tauntingly, "O you who think yourself so fortunate, what pride can you show before your beloved?"
सारांश
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"जाने से क्या लाभ?", "मिलना ही उचित है", "प्रियतम से कैसा मान?"—स्त्रियों की ऐसी परस्पर बातों के बीच प्रेमियों ने विभिन्न रसों से युक्त धैर्य और आनंद का अनुभव किया।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
किमिति ॥ पुनर्नायिकाह-तार्ह गतेन तं प्रति गमनेन किम् । कोऽर्थ इत्यर्थः । अत उपैतुं गन्तुं न युक्तं हि । पुनः सख्याह-हे सुभगमानिनि सौन्दर्यमानिनि । सुभगमात्मानं मन्यत इति ।
आत्ममाने खश्च (अष्टाध्यायी ३.२.८३ ) इति चकारागिणनिप्रत्ययः । तस्मिन्प्रिये विषये को मानः । मानो न कर्तव्य इत्यर्थः । यद्वा। नहीत्यादि सखीवाक्यम् । तत्र नहीत्येकं वाक्यम् । तद्युक्तं सखीत्यर्थः । हे सखि, किं तूपैतुं युक्तम् । कुतः। सुभगमानिनि प्रिये को मानः । तादृग्जनस्य दुर्लभत्वादिति भावः । इत्येवंरूपासु योषितां कथासु विषये समेतैः । समीपमागत्याकर्णयद्भिरित्यर्थः । कामिभिर्बहुरसानेकस्वादा धृतिः संतोष ऊह ऊढा । अत्र रौक्ष्योत्सुक्यनिर्वेदाद्यनेकभावशाबल्यपरिपूर्णकान्ताकथाकर्णनादुत्तरोत्तरमपूर्वहृदयानन्दनिष्यन्दमानन्दसंदोहमविन्दन्नित्यर्थः । प्रायेणात्र प्रौढाः कलहान्तरिताश्च नायिकाः॥ '
पदच्छेदः
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| किम् | किम् | what use |
| गतेन | गत (√गम्+क्त, ३.१) | with her having gone |
| न | न | not |
| हि | हि | indeed |
| युक्तम् | युक्त (√युज्+क्त, १.१) | is proper |
| उपैतुम् | उपैतुम् (उप√इ+तुमुन्) | to approach |
| कः | किम् (१.१) | what |
| प्रिये | प्रिय (७.१) | before the beloved |
| सुभगमानिनि | सुभगमानिन् (८.१) | O you who think yourself fortunate |
| मानः | मान (१.१) | pride |
| योषिताम् | योषित् (६.३) | of women |
| इति | इति | thus |
| कथासु | कथा (७.३) | in the talks |
| समेतैः | समेत (सम्√इ+क्त, ३.३) | by the assembled |
| कामिभिः | कामिन् (३.३) | lovers |
| बहुरसा | बहु–रस (१.१) | full of various sentiments |
| धृतिः | धृति (१.१) | pleasure |
| ऊहे | ऊहे (√ऊह् भावकर्मणोः लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was experienced |
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| किं | ग | ते | न | न | हि | यु | क्त | मु | पै | तुं |
| कः | प्रि | ये | सु | भ | ग | मा | नि | नि | मा | नः |
| यो | षि | ता | मि | ति | क | था | सु | स | मे | तैः |
| का | मि | भि | र्ब | हु | र | सा | धृ | ति | रू | हे |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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