अन्वयः
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प्रियवधूं उपकण्ठं श्लिष्यतः, तारकाततकरस्य हिमांशोः लोहितरागः, समन्तात् उद्वमन्, अङ्गरागः इव अभिरराज।
English Summary
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The red glow of the rising moon, which was embracing its beloved wife (the Night) and whose rays were spread among the stars, shone brightly all around like a red cosmetic paste (angaraaga).
सारांश
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अपनी किरण रूपी भुजाओं को फैलाकर अपनी प्रियतमा रूपी रात्रि का आलिंगन करने वाले चंद्रमा की वह लालिमा चारों ओर ऐसे शोभायमान हो रही थी, मानो शरीर पर लगाया गया लाल अंगराग हो।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
लिप्यत इति । तताःप्रसारिताः करा एव करा अंशुहस्ता येन तस्य ततकरस्य तारका एव प्रियवधूरुपकण्ठमन्तिके कण्ठे वा । अत्यन्तसंयोगे द्वितीया। विभक्त्यर्थेऽव्ययीभावः। श्लिष्यतःप्रत्यासीदत आलिङ्गतश्च हिमांशोः संबन्धी समन्तादुद्वमन्नुत्सर्पन्। अर्थान्तरत्वादकर्मकत्वम् ।
धातोरर्थान्तरे वृत्तेः इति वचनात् । लोहितरागोऽरुणप्रभोऽङ्गराग इवाभिरराज । आलिङ्गनाद्रागो गलतीति प्रसिद्धिः। अत्र रूपकोपमयोरङ्गाङ्गिभावेन संकरः॥ प्रेरितः शशधरेण करोघः संहतान्यपि नुनोद तमांसि । क्षीरसिन्धुरिव मन्दरभिन्नः काननान्यविरलोच्चतरूणि
पदच्छेदः
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| श्लिष्यतः | श्लिष्यत् (√श्लिष्+शतृ, ६.१) | of the one embracing |
| प्रियवधूं | प्रियवधू (२.१) | his beloved wife (the Night) |
| उपकण्ठम् | उपकण्ठम् | closely |
| तारकाततकरस्य | तारका–तत (√तन्+क्त)–कर (६.१) | of the one whose rays were spread among the stars |
| हिमांशुः | हिमांशु (६.१) | of the moon |
| उद्वमन् | उद्वमत् (उत्√वम्+शतृ, १.१) | emitting |
| अभिरराज | अभिरराज (अभि√राज् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | shone brightly |
| समन्तात् | समन्तात् | all around |
| अङ्गरागः | अङ्गराग (१.१) | cosmetic paste |
| इव | इव | like |
| लोहितरागः | लोहितराग (१.१) | the red glow |
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श्लि | ष्य | तः | प्रि | य | व | धू | रु | प | क | ण्ठं |
| ता | र | का | स्त | त | क | र | स्य | हि | मां | शोः |
| उ | द्व | म | न्न | भि | र | रा | ज | स | म | न्ता |
| द | ङ्ग | रा | ग | इ | व | लो | हि | त | रा | गः |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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