अन्वयः
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आतपे धृतिमता वध्वा सह यामिनीविरहिणा विहगेन हिमरश्मेः किरणाः न सेहिरे। हि दुःखिते मनसि सर्वम् असह्यम्।
English Summary
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The Chakravaka bird, separated from its mate during the night, could not bear the moon's rays even when reunited with her, who had patiently endured the sun's heat. Indeed, to a sorrowful mind, everything is unbearable.
सारांश
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अपनी मादा के साथ धूप को सहने वाले, किंतु अब रात्रि में विरही हुए चक्रवाक पक्षी से चंद्रमा की शीतल किरणें भी सहन नहीं हुईं; सच है कि दुखी मन के लिए सब कुछ असह्य हो जाता है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
आतप इति ॥ आतपे । दुःखकरेऽपीति भावः । बध्वा चक्रवाक्या सहाति एष धृतिमता संतोषवता यामिनीषु विरहिणा नियतविरहेणात एव विहगेन चक्रवाकेण हिमरश्मेश्चन्द्रस्य किरणा न सेहिरे। तथाहि । दुःखिते संजातदुःखे मनसि सर्वम् । मनोहरमपीति भावः । असह्यं सोढुमशक्यम् ।
शकिसहोश्च (अष्टाध्यायी ३.१.९९ ) इति यत्प्रत्ययः। पूर्वे तु आतपाः इति पेठु: । तत्र वध्वा सहातपा अपि सेहिरे । तद्विरहिणा तु शशिकिरणा अपि न सेहिर इति योज्यम् । फलं तु समानम् ॥
पदच्छेदः
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| आतपे | आतप (७.१) | in the sun's heat |
| धृतिमता | धृतिमत् (३.१) | by the patient one |
| सह | सह | with |
| वध्वा | वधू (३.१) | his mate |
| यामिनीविरहिणा | यामिनी–विरहिन् (३.१) | by the one separated during the night |
| विहगेन | विहग (३.१) | by the bird (Chakravaka) |
| सेहिरे | सेहिरे (√सह् भावकर्मणोः लिट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | were borne |
| न | न | not |
| किरणाः | किरण (१.३) | the rays |
| हिमरश्मेः | हिम–रश्मि (६.१) | of the moon (the cool-rayed one) |
| दुःखिते | दुःखित (७.१) | when afflicted with sorrow |
| मनसि | मनस् (७.१) | the mind |
| सर्वम् | सर्व (१.१) | everything |
| असह्यम् | असह्य (१.१) | is unbearable |
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | त | पे | धृ | ति | म | ता | स | ह | व | ध्वा |
| या | मि | नी | वि | र | हि | णा | वि | ह | गे | न |
| से | हि | रे | न | कि | र | णा | हि | म | र | श्मे |
| र्दुः | खि | ते | म | न | सि | स | र्व | म | स | ह्यम् |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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