८.१
अथ स्वमायाकृतमन्दिरोज्ज्वलं
ज्वलन्मणि व्योमसदां सनातनम् ।
सुराङ्गना गोपतिचापगोपुरं
पुरं वनानां विजिहीर्षया जहुः ॥
ज्वलन्मणि व्योमसदां सनातनम् ।
सुराङ्गना गोपतिचापगोपुरं
पुरं वनानां विजिहीर्षया जहुः ॥
सारांश
AI
देवताओं की स्त्रियाँ वन विहार की इच्छा से अपनी उज्ज्वल मणियों और इंद्रधनुषी तोरणों वाले शाश्वत स्वर्ग को छोड़कर पृथ्वी पर उतरीं।
८.२
यथायथं ताः सहिता नभश्चरैः
प्रभाभिरुद्भासितशैलवीरुधः ।
वनं विशन्त्यो वनजायतेक्षणाः
क्षणद्युतीनां दधुरेकरूपताम् ॥
प्रभाभिरुद्भासितशैलवीरुधः ।
वनं विशन्त्यो वनजायतेक्षणाः
क्षणद्युतीनां दधुरेकरूपताम् ॥
सारांश
AI
गन्धर्वों के साथ वन में प्रवेश करती हुई उन कमलनयनी स्त्रियों की शारीरिक कांति से पर्वतीय लताएँ चमक उठीं और वे बिजली की चमक के समान प्रतीत होने लगीं।
८.३
निवृत्तवृत्तोरुपयोधरक्लमः
प्रवृत्तैनिर्ह्रादिविभूषणारवः ।
नितम्बिनीनां भृशमादधे धृतिं
नभःप्रयाणादवनौ परिक्रमः ॥
प्रवृत्तैनिर्ह्रादिविभूषणारवः ।
नितम्बिनीनां भृशमादधे धृतिं
नभःप्रयाणादवनौ परिक्रमः ॥
सारांश
AI
आकाश मार्ग के स्थान पर पृथ्वी पर चलने से उन सुन्दरी स्त्रियों के भारी स्तनों की थकान दूर हो गई और उनके बजते हुए आभूषणों ने उन्हें अत्यधिक प्रसन्नता प्रदान की।
८.४
घनानि कामं कुसुमानि बिभ्रतः
करप्रचेयान्यपहाय शाखिनः ।
पुरोऽभिसस्रे सुरसुन्दरीजनै-
र्यथोत्तरेच्छा हि गुणेषु कामिनः ॥
करप्रचेयान्यपहाय शाखिनः ।
पुरोऽभिसस्रे सुरसुन्दरीजनै-
र्यथोत्तरेच्छा हि गुणेषु कामिनः ॥
सारांश
AI
वे देवांगनाएँ सुलभ पुष्पों वाले वृक्षों को छोड़कर आगे बढ़ गईं, क्योंकि अभिलाषी जन सदैव उत्तरोत्तर श्रेष्ठ गुणों और वस्तुओं की ही कामना करते हैं।
८.५
तनूरलक्तारुणपाणिपल्लवाः
स्फुरन्नखांशूत्करमञ्जरीभृतः ।
विलासिनीबाहुलता वनालयो
विलेपनामोदहृताः सिषेविरे ॥
स्फुरन्नखांशूत्करमञ्जरीभृतः ।
विलासिनीबाहुलता वनालयो
विलेपनामोदहृताः सिषेविरे ॥
सारांश
AI
सुगंधित लेप की खुशबू से आकर्षित होकर उन विलासिनी स्त्रियों ने अपनी कोमल भुजाओं, लाल हथेलियों और चमकते नाखूनों से वन की लताओं का सेवन किया।
८.६
निपीयमानस्तबका शिलीमुखै-
रशोकयष्टिश्चलबालपल्लवा ।
विडम्बयन्ती ददृशे वधूजनै-
रमन्ददष्टौष्ठकरावधूननम् ॥
रशोकयष्टिश्चलबालपल्लवा ।
विडम्बयन्ती ददृशे वधूजनै-
रमन्ददष्टौष्ठकरावधूननम् ॥
सारांश
AI
भँवरों द्वारा रसपान की जाती हुई और हिलते पल्लवों वाली अशोक की डाल ऐसी लग रही थी मानो कोई सुन्दरी अधर-दंश के कारण पीड़ा से हाथ झटक रही हो।
८.७
करौ धुनाना नवपल्लवाकृती
वृथा कृथा मानिनि मा परिश्रमम् ।
उपेयुषी कल्पलताभिशङ्कया
कथं न्वितस्त्रस्यति षट्पदावलिः ॥
वृथा कृथा मानिनि मा परिश्रमम् ।
उपेयुषी कल्पलताभिशङ्कया
कथं न्वितस्त्रस्यति षट्पदावलिः ॥
सारांश
AI
सखी ने कहा—हे मानिनी! तुम व्यर्थ ही अपने पल्लव जैसे हाथों को मत झटको; ये भ्रमर तुम्हें कल्पलता समझकर आ रहे हैं, इनसे तुम भयभीत क्यों हो रही हो?
८.८
जहीहि कोपं दयितोऽनुगम्यतां
पुरानुशेते तव चञ्चलं मनः ।
इति प्रियं कांचिदुपैतुमिच्छतीं
पुरोऽनुनिन्ये निपुणः सखीजनः ॥
पुरानुशेते तव चञ्चलं मनः ।
इति प्रियं कांचिदुपैतुमिच्छतीं
पुरोऽनुनिन्ये निपुणः सखीजनः ॥
सारांश
AI
चतुर सखियों ने प्रियतम के पास जाने की इच्छुक किसी मानिनी को यह कहकर मनाया कि क्रोध त्यागो और प्रिय के पीछे जाओ, अन्यथा तुम्हारा चंचल मन बाद में पछताएगा।
८.९
समुन्नतैः काशदुकूलशालिभिः
परिक्वणत्सारसपङ्क्तिमेखलैः ।
प्रतीरदेशैः स्वकलत्रचारुभि-
र्विभूषिताः कुञ्जसमुद्रयोषितः ॥
परिक्वणत्सारसपङ्क्तिमेखलैः ।
प्रतीरदेशैः स्वकलत्रचारुभि-
र्विभूषिताः कुञ्जसमुद्रयोषितः ॥
सारांश
AI
काश के पुष्पों रूपी रेशमी वस्त्रों और सारसों की चहचहाती पंक्ति रूपी करधनी से सुशोभित तट प्रदेशों वाले कुंज अपनी पत्नियों के समान सुंदर लग रहे थे।
८.१०
विदूरपातेन भिदामुपेयुष-
श्च्युताः प्रवाहादभितः प्रसारिणः ।
प्रियाङ्कशीताः शुचिमौक्तिकत्विषो
वनप्रहासा इव वारिबिन्दवः ॥
श्च्युताः प्रवाहादभितः प्रसारिणः ।
प्रियाङ्कशीताः शुचिमौक्तिकत्विषो
वनप्रहासा इव वारिबिन्दवः ॥
सारांश
AI
ऊँचाई से गिरने के कारण बिखरती हुई जल की बूंदें मोतियों जैसी आभा वाली थीं और प्रियतम की गोद की तरह शीतल होकर वन की मधुर मुस्कान सी लग रही थीं।
८.११
सखीजनं प्रेम गुरूकृतादरं
निरीक्षमाणा इव नम्रमूर्तयः ।
स्थिरद्विरेफाञ्जनशरितोदरै-
र्विसारिभिः पुष्पविलोचनैर्लताः ॥
निरीक्षमाणा इव नम्रमूर्तयः ।
स्थिरद्विरेफाञ्जनशरितोदरै-
र्विसारिभिः पुष्पविलोचनैर्लताः ॥
सारांश
AI
फूलों रूपी नेत्रों और भँवरों रूपी अंजन से युक्त लताएँ झुककर ऐसी लग रही थीं मानो वे प्रेमपूर्ण सखियों की तरह देवांगनाओं को निहार रही हों।
८.१२
उपेयुषीणां बृहतीरधित्यका
मनांसि जह्रुः सुरराजयोषिताम् ।
कपोलकाषैः करिणां मदारुणै-
रुपाहितश्यामरुचश्च चन्दनाः ॥
मनांसि जह्रुः सुरराजयोषिताम् ।
कपोलकाषैः करिणां मदारुणै-
रुपाहितश्यामरुचश्च चन्दनाः ॥
सारांश
AI
पर्वत की चोटियों पर स्थित चंदन के वे वृक्ष देवांगनाओं के मन को मोहने लगे, जो मदमस्त हाथियों के रगड़ने से उनके गालों के मद की लाली से काले पड़ गए थे।
८.१३
स्वगोचरे सत्यपि वित्तहारिणा
विलोभ्यमानाः प्रसवेन शाखिनाम् ।
नभश्चराणामुपकर्तुमिच्छतां
प्रियाणि चक्रुः प्रणयेन योषितः ॥
विलोभ्यमानाः प्रसवेन शाखिनाम् ।
नभश्चराणामुपकर्तुमिच्छतां
प्रियाणि चक्रुः प्रणयेन योषितः ॥
सारांश
AI
समीप में पुष्प होने पर भी वृक्षों की सुंदरता से लुभाती हुई उन स्त्रियों ने गन्धर्वों की प्रिय इच्छाओं को प्रेमपूर्वक पूरा कर उन्हें सुख प्रदान किया।
८.१४
प्रयच्छतोच्चैः कुसुमानि मानिनी
विपक्षगोत्रं दयितेन लम्भिता ।
न किंचिदूचे चरणेन केवलं
लिलेख बाष्पाकुललोचना भुवम् ॥
विपक्षगोत्रं दयितेन लम्भिता ।
न किंचिदूचे चरणेन केवलं
लिलेख बाष्पाकुललोचना भुवम् ॥
सारांश
AI
पुष्प देते समय जब प्रियतम ने भूल से दूसरी स्त्री का नाम ले लिया, तब मानिनी कुछ न बोली और अश्रुपूरित नेत्रों से केवल पैर के अंगूठे से धरती कुरेदने लगी।
८.१५
प्रियेऽपरा यच्छति वाचमुन्मुखी
निबद्धदृष्टिः शिथिलाकुलोच्चया ।
समादधे नांशुकमाहितं वृथा
विवेद पुष्पेषु न पाणिपल्लवम् ॥
निबद्धदृष्टिः शिथिलाकुलोच्चया ।
समादधे नांशुकमाहितं वृथा
विवेद पुष्पेषु न पाणिपल्लवम् ॥
सारांश
AI
प्रियतम को एकटक निहारती हुई एक स्त्री प्रेम में इतनी सुध-बुध खो बैठी कि उसे अपने ढीले होते वस्त्रों और फूलों से हटते अपने हाथों का ध्यान ही न रहा।
८.१६
सलीलमासक्तलतान्तभूषणं
समासजन्त्या कुसुमावतंसकम् ।
स्तनोपपीडं नुनुदे नितम्बिना
घनेन कश्चिज्जघनेन कान्तया ॥
समासजन्त्या कुसुमावतंसकम् ।
स्तनोपपीडं नुनुदे नितम्बिना
घनेन कश्चिज्जघनेन कान्तया ॥
सारांश
AI
लीलापूर्वक फूलों के आभूषण पहनती हुई किसी सुन्दरी ने अपने भारी नितम्बों और उन्नत स्तनों के दबाव से अपने प्रियतम को आलिंगन जैसा सुखद स्पर्श दिया।
८.१७
कलत्रभारेण विलोलनीविना
गलद्दुकूलस्तनशालिनोरसा ।
बलिव्यपायस्फुटरोमराजिना
निरायतत्वादुदरेण ताम्यता ॥
गलद्दुकूलस्तनशालिनोरसा ।
बलिव्यपायस्फुटरोमराजिना
निरायतत्वादुदरेण ताम्यता ॥
सारांश
AI
भारी नितम्बों, खिसकते रेशमी वस्त्रों और उन्नत स्तनों के भार से युक्त उस सुन्दरी का उदर भाग खिंचाव के कारण और अधिक कृश तथा शोभायमान दिखाई दे रहा था।
८.१८
विलम्बमानाकुलकेशपाशया
कयाचिदाविष्कृतबाहुमूलया ।
तरुप्रसूनान्यपदिश्य सादरं
मनोधिनाथस्य मनः समाददे ॥
कयाचिदाविष्कृतबाहुमूलया ।
तरुप्रसूनान्यपदिश्य सादरं
मनोधिनाथस्य मनः समाददे ॥
सारांश
AI
फूलों को तोड़ने के बहाने अपनी भुजाओं के मूल भाग को प्रदर्शित करती हुई और बिखरे केशों वाली किसी सुन्दरी ने अपने प्रियतम के मन को पूरी तरह मोह लिया।
८.१९
व्यपोहितुं लोचनतो मुखानिलै-
रपारयन्तं किल पुष्पजं रजः ।
पयोधरेणोरसि काचिदुन्मनाः
प्रियं जघानोन्नतपीवरस्तनी ॥
रपारयन्तं किल पुष्पजं रजः ।
पयोधरेणोरसि काचिदुन्मनाः
प्रियं जघानोन्नतपीवरस्तनी ॥
सारांश
AI
आँखों में पड़े पराग को प्रियतम द्वारा फूँक मारकर निकालने का बहाना कर, किसी उन्नत स्तनों वाली कामिनी ने उन्हें अपने हृदय से लगा लिया।
८.२०
इमान्यमूनीत्यपवर्जिते शनै-
र्यथाभिरामं कुसुमाग्रपल्लवे ।
विहाय निःसारतयेव भूरुहा-
न्पदं वनश्रीर्वनितासु संदधे ॥
र्यथाभिरामं कुसुमाग्रपल्लवे ।
विहाय निःसारतयेव भूरुहा-
न्पदं वनश्रीर्वनितासु संदधे ॥
सारांश
AI
सुंदर पुष्पों और कोमल पत्तों के चुन लिए जाने पर वन की शोभा मानो वृक्षों को निस्सार समझकर त्याग कर उन देवांगनाओं के सौंदर्य में समा गई।
८.२१
प्रवालभङ्गारुणपाणिपल्लवः
परागपाण्डूकृतपीवरस्तनः ।
महीरुहः पुष्पसुगन्धिराददे
वपुर्गुणोच्छ्रायमिवाङ्गनाजनः ॥
परागपाण्डूकृतपीवरस्तनः ।
महीरुहः पुष्पसुगन्धिराददे
वपुर्गुणोच्छ्रायमिवाङ्गनाजनः ॥
सारांश
AI
वृक्षों ने पुष्पों की सुगंध, पल्लवों जैसे लाल हाथों और पराग से धवलित स्तनों वाली देवांगनाओं की शोभा के उत्कर्ष को मानो स्वयं में धारण कर लिया।
८.२२
वरोरुभिर्वारणहस्तपीवरै-
श्चिराय खिन्नान्नवपल्लवश्रियः ।
समेऽपि यातुं चरणाननीश्वरा-
न्मदादिव प्रस्खलतः पदे पदे ॥
श्चिराय खिन्नान्नवपल्लवश्रियः ।
समेऽपि यातुं चरणाननीश्वरा-
न्मदादिव प्रस्खलतः पदे पदे ॥
सारांश
AI
हाथी की सूंड जैसी पुष्ट जंघाओं वाली देवांगनाएँ मार्ग में थक जाने के कारण समतल भूमि पर भी मदमस्त होकर लड़खड़ाते हुए धीरे-धीरे चल रही थीं।
८.२३
विसारिकाञ्चीमणिरश्मिलब्धया
मनोहरोच्छायनितम्बशोभया ।
स्थितानि जित्वा नवसैकतद्युतिं
श्रमातिरिक्तैर्जघनानि गौरवैः ॥
मनोहरोच्छायनितम्बशोभया ।
स्थितानि जित्वा नवसैकतद्युतिं
श्रमातिरिक्तैर्जघनानि गौरवैः ॥
सारांश
AI
करधनी की मणियों की किरणों से युक्त और अपने भारीपन के कारण वैभवशाली सुंदर जघनों ने नवीन बालू के टीलों की शोभा को भी जीत लिया।
८.२४
समुच्छ्वसत्पङ्कजकोशकोमलै-
रुपाहितश्रीण्युपनीवि नाभिभिः ।
दधन्ति मध्येषु वलीविभङ्गिषु
स्तनातिभारादुदराणि नम्रताम् ॥
रुपाहितश्रीण्युपनीवि नाभिभिः ।
दधन्ति मध्येषु वलीविभङ्गिषु
स्तनातिभारादुदराणि नम्रताम् ॥
सारांश
AI
खिले कमल के समान कोमल और गहरी नाभि से सुशोभित स्त्रियों के उदर, स्तनों के अत्यधिक भार के कारण वलियों के पास झुक गए थे।
८.२५
समानकान्तीनि तुषारभूषणैः
सरोरुहैरस्फुटपत्त्रपङ्क्तिभिः ।
चितानि घर्माम्बुकणैः समन्ततो
मुखान्यनुत्फुल्लविलोचनानि च ॥
सरोरुहैरस्फुटपत्त्रपङ्क्तिभिः ।
चितानि घर्माम्बुकणैः समन्ततो
मुखान्यनुत्फुल्लविलोचनानि च ॥
सारांश
AI
पसीने की बूंदों से युक्त और अधखुली आँखों वाले देवांगनाओं के मुख, ओस कणों से व्याप्त उन कमलों के समान थे जिनकी पंखुड़ियाँ पूरी तरह नहीं खिली थीं।
८.२६
विनिर्यतीनां गुरुस्वेदमन्थरं
सुराङ्गनानामनुसानुवर्त्मनः ।
सविस्मयं रूपयतो नभश्चरा-
न्विवेश तत्पूर्वमिवेक्षणादरः ॥
सुराङ्गनानामनुसानुवर्त्मनः ।
सविस्मयं रूपयतो नभश्चरा-
न्विवेश तत्पूर्वमिवेक्षणादरः ॥
सारांश
AI
पर्वत की चोटियों से पसीने के कारण मन्द गति से आती हुई अप्सराओं के अनुपम रूप को देखकर आकाशचारियों के मन में अपार विस्मय और आदर भर गया।
८.२७
अथ स्फुरन्मीनविधूतपङ्कजा
विपङ्कतीरस्खलितोर्मिसंहतिः ।
पयोऽवगाढुं कलहंसनादिनी
समाजुहावेव वधूः सुरापगा ॥
विपङ्कतीरस्खलितोर्मिसंहतिः ।
पयोऽवगाढुं कलहंसनादिनी
समाजुहावेव वधूः सुरापगा ॥
सारांश
AI
चंचल मछलियों द्वारा हिलते कमलों वाली और हंसों के समान मधुर शब्द करने वाली गंगा नदी अपनी लहरों से मानो वधुओं को स्नान हेतु बुला रही थी।
८.२८
प्रशान्तघर्माभिभवः शनैर्विवा-
न्विलासिनीभ्यः परिमृष्टपङ्कजः ।
ददौ भुजालम्बमिवात्तशीकर-
स्तरङ्गमालान्तरगोचरोऽनिलः ॥
न्विलासिनीभ्यः परिमृष्टपङ्कजः ।
ददौ भुजालम्बमिवात्तशीकर-
स्तरङ्गमालान्तरगोचरोऽनिलः ॥
सारांश
AI
जल की बूंदों से शीतल और लहरों के बीच बहने वाली वायु, गर्मी को दूर करती हुई विलासिनी स्त्रियों को सहारा देने के लिए मानो अपना हाथ बढ़ा रही थी।
८.२९
गतैः सहावैः कलहंसविक्रमं
कलत्रभारैः पुलिनं नितम्बिभिः ।
मुखैः सरोजानि च दीर्घलोचनैः
सुरस्त्रियः साम्यगुणान्निरासिरे ॥
कलत्रभारैः पुलिनं नितम्बिभिः ।
मुखैः सरोजानि च दीर्घलोचनैः
सुरस्त्रियः साम्यगुणान्निरासिरे ॥
सारांश
AI
देवांगनाओं ने अपनी सुंदर चाल से हंसों को, भारी नितम्बों से तटों को और कमलों को अपने सुंदर मुखों की शोभा से पराजित कर दिया।
८.३०
विभिन्नपर्यन्तगमीनपङ्क्तयः
पुरो विगाढाः सखिभिर्मरुत्वतः ।
कथंचिदापः सुरसुन्दरीजनैः
सभीतिभिस्तत्प्रथमं प्रपेदिरे ॥
पुरो विगाढाः सखिभिर्मरुत्वतः ।
कथंचिदापः सुरसुन्दरीजनैः
सभीतिभिस्तत्प्रथमं प्रपेदिरे ॥
सारांश
AI
मछलियों की पंक्तियों को तितर-बितर करती हुई वे देवांगनाएँ सखियों के साथ कुछ भयभीत भाव से गंगा के जल में पहली बार प्रविष्ट हुईं।
८.३१
विगाढमात्रे रमणीभिरम्भसि
प्रयत्नसंवाहितपीवरोरुभिः ।
विभिद्यमाना विससार सारसा-
नुदस्य तीरेषु तरङ्गसंहतिः ॥
प्रयत्नसंवाहितपीवरोरुभिः ।
विभिद्यमाना विससार सारसा-
नुदस्य तीरेषु तरङ्गसंहतिः ॥
सारांश
AI
जब उन सुंदरियों ने जल में अपनी पुष्ट जंघाओं को चलाया, तब लहरों का समूह सारसों को उड़ाता हुआ तेजी से किनारों की ओर फैल गया।
८.३२
शिलाघनैर्नाकसदामुरःस्थलै-
र्बृहन्निवेशैश्च वधूपयोधरैः ।
तटाभिनीतेन विभिन्नवीचिना
रुषेव भेजे कलुषत्वमम्भसा ॥
र्बृहन्निवेशैश्च वधूपयोधरैः ।
तटाभिनीतेन विभिन्नवीचिना
रुषेव भेजे कलुषत्वमम्भसा ॥
सारांश
AI
देवताओं के कठोर वक्षस्थलों और वधुओं के विशाल स्तनों से टकराकर लहरें छिन्न-भिन्न हो गईं और जल क्रोध के कारण मानो मटमैला हो गया।
८.३३
विधूतकेशाः परिलोलितस्रजः
सुराङ्गनानां प्रविलुप्तचन्दनाः ।
अतिप्रसङ्गाद्विहितागसो मुहुः
प्रकम्पमीयुः सभया इवोर्मयः ॥
सुराङ्गनानां प्रविलुप्तचन्दनाः ।
अतिप्रसङ्गाद्विहितागसो मुहुः
प्रकम्पमीयुः सभया इवोर्मयः ॥
सारांश
AI
बिखरे बालों और टूटी मालाओं वाली स्त्रियों के चन्दन को धोती हुई लहरें, मानो मर्यादा उल्लंघन के अपराध से भयभीत होकर बार-बार कांपने लगीं।
८.३४
विपक्षचित्तोन्मथना नखव्रणा-
स्तिरोहिता विभ्रममण्डनेन ये
हृतस्य शेषानिव कुङ्कुमस्य
तान्विकत्थनीयान्दधुरन्यथा स्त्रिय्-
अः
स्तिरोहिता विभ्रममण्डनेन ये
हृतस्य शेषानिव कुङ्कुमस्य
तान्विकत्थनीयान्दधुरन्यथा स्त्रिय्-
अः
सारांश
AI
प्रसाधनों के धुल जाने पर सौतों के मन को दुखी करने वाले वे नख-क्षत पुनः स्पष्ट हो गए, जो स्त्रियों के लिए किसी गर्व से कम नहीं थे।
८.३५
सरोजपत्त्रे नु विलीनषट्पदे
विलोलदृष्टेः स्विदमू विलोचने ।
शिरोरुहाः स्विन्नतपक्ष्मसन्तते-
र्द्विरेफवृन्दं नु निशब्दनिश्चलम् ॥
विलोलदृष्टेः स्विदमू विलोचने ।
शिरोरुहाः स्विन्नतपक्ष्मसन्तते-
र्द्विरेफवृन्दं नु निशब्दनिश्चलम् ॥
सारांश
AI
क्या ये कमल के पत्तों में छिपे भौंरे हैं या चंचल आँखें? क्या ये पलकों पर बैठे शांत भौरों का समूह है या सिर के बाल? ऐसा संशय उत्पन्न हुआ।
८.३६
अगूढहासस्फुटदन्तकेसरं
मुखं स्विदेतद्विकसन्नु पङ्कजम् ।
इति प्रलीनां नलिनीवने सखीं
विदांबभूवुः सुचिरेण योषितः ॥
मुखं स्विदेतद्विकसन्नु पङ्कजम् ।
इति प्रलीनां नलिनीवने सखीं
विदांबभूवुः सुचिरेण योषितः ॥
सारांश
AI
क्या यह मंद मुस्कान और दांतों की चमक वाला मुख है या खिलता हुआ कमल? इस प्रकार सखियों ने जल में छिपी अपनी सखी को बहुत देर बाद पहचाना।
८.३७
प्रियेण संग्रथ्य विपक्षसंनिधा-
वुपाहितां वक्षसि पीवरस्तने ।
स्रजं न काचिद्विजहौ जलाविलां
वसन्ति हि प्रेम्णि गुणा न वस्तुनि ॥
वुपाहितां वक्षसि पीवरस्तने ।
स्रजं न काचिद्विजहौ जलाविलां
वसन्ति हि प्रेम्णि गुणा न वस्तुनि ॥
सारांश
AI
प्रिय द्वारा सौत के समक्ष पहनाई गई वह गंदी माला भी किसी स्त्री ने नहीं त्यागी, क्योंकि अनुराग का आधार गुण होते हैं, बाहरी वस्तु नहीं।
८.३८
असंशयं न्यस्तमुपान्तरक्ततां
यदेव रोद्धुं रमणीभिरञ्जनम् ।
हृतेऽपि तस्मिन्सलिलेन शुक्लतां
निरास रागो नयनेषु न श्रियम् ॥
यदेव रोद्धुं रमणीभिरञ्जनम् ।
हृतेऽपि तस्मिन्सलिलेन शुक्लतां
निरास रागो नयनेषु न श्रियम् ॥
सारांश
AI
आँखों की लालिमा को ढंकने के लिए लगाया गया काजल यद्यपि जल में धुल गया, फिर भी आँखों की स्वाभाविक लालिमा और सुंदरता अक्षुण्ण बनी रही।
८.३९
द्युतिं वहन्तो वनितावतंसका
हृताः प्रलोभादिव वेगिभिर्जलैः ।
उपप्लुतास्तत्क्षणशोचनीयतां
च्युताधिकाराः सचिवा इवाययुः ॥
हृताः प्रलोभादिव वेगिभिर्जलैः ।
उपप्लुतास्तत्क्षणशोचनीयतां
च्युताधिकाराः सचिवा इवाययुः ॥
सारांश
AI
जल के वेग से बहते हुए स्त्रियों के कान के आभूषण ऐसे लग रहे थे, मानो अधिकार से च्युत होने के कारण अपमानित मंत्री दयनीय अवस्था में बह रहे हों।
८.४०
विपत्त्रलेखा निरलक्तकाधरा
निरञ्जनाक्षीरपि बिभ्रतीः श्रियम् ।
निरीक्ष्य रामा बुबुधे नभश्चरै-
रलंकृतं तद्वपुषैव मण्डनम् ॥
निरञ्जनाक्षीरपि बिभ्रतीः श्रियम् ।
निरीक्ष्य रामा बुबुधे नभश्चरै-
रलंकृतं तद्वपुषैव मण्डनम् ॥
सारांश
AI
बिना श्रृंगार और प्रसाधनों के भी उन स्त्रियों के स्वाभाविक सौंदर्य को देखकर देवताओं ने जान लिया कि उनका शरीर ही स्वयं में एक श्रेष्ठ आभूषण है।
८.४१
तथा न पूर्वं कृतभूषणादरः
प्रियानुरागेण विलासिनीजनः ।
यथा जलार्द्रो नखमण्डनश्रिया
ददाह दृष्टीश्च विपक्षयोषिताम् ॥
प्रियानुरागेण विलासिनीजनः ।
यथा जलार्द्रो नखमण्डनश्रिया
ददाह दृष्टीश्च विपक्षयोषिताम् ॥
सारांश
AI
विलासिनी स्त्रियों ने स्नान से पूर्व श्रृंगार पर उतना ध्यान नहीं दिया था, जितना जल में भीगने के बाद उनके शरीर पर उभरे नख-चिह्न सौतनों की आँखों को जला रहे थे।
८.४२
शुभाननाः साम्बुरुहेषु भीरवो
विलोलहाराश्चलफेनपङ्क्तिषु ।
नितान्तगौर्यो हृतकुङ्कुमेष्वलं
न लेभिरे ताः परभागमूर्मिषु ॥
विलोलहाराश्चलफेनपङ्क्तिषु ।
नितान्तगौर्यो हृतकुङ्कुमेष्वलं
न लेभिरे ताः परभागमूर्मिषु ॥
सारांश
AI
सुंदर मुख और चंचल हारों वाली वे स्त्रियाँ, जिनका कुंकुम धुल गया था, जल की लहरों और कमलों के बीच अपनी अत्यधिक गौरवर्ण आभा के कारण अनुपम शोभा पा रही थीं।
८.४३
ह्रदाम्भसि व्यस्तवधूकराहते
रवं मृदङ्गध्वनिधीरमुज्झति ।
मुहुस्तनैस्तालस्समं समाददे
मनोरमं नृत्यमिव प्रवेपितम् ॥
रवं मृदङ्गध्वनिधीरमुज्झति ।
मुहुस्तनैस्तालस्समं समाददे
मनोरमं नृत्यमिव प्रवेपितम् ॥
सारांश
AI
स्त्रियों के हाथों के प्रहार से जल से मृदंग जैसी गंभीर ध्वनि निकलने लगी और उनके स्तनों के कंपन ने इस दृश्य को एक थिरकते हुए मनोहर नृत्य जैसा बना दिया।
८.४४
श्रिया हसद्भिः कलमानि सस्मितै-
रलंकृताम्बुः प्रतिमागतैर्मुखैः ।
कृतानुकूल्या सुरराजयोषितां
प्रसादसाफल्यमवाप जाह्वनी ॥
रलंकृताम्बुः प्रतिमागतैर्मुखैः ।
कृतानुकूल्या सुरराजयोषितां
प्रसादसाफल्यमवाप जाह्वनी ॥
सारांश
AI
गंगा का जल देवांगनाओं के प्रतिबिंबित मुस्कुराते मुखों से सुशोभित होकर और कमलों की शोभा को पीछे छोड़ते हुए अपनी सेवा की सफलता का अनुभव कर रहा था।
८.४५
परिस्फुरन्मीनविघट्टितोरवः
सुराङ्गनास्त्रासविलोलदृष्टयः ।
उपाययुः कम्पितपाणिपल्लवाः
सखीजनस्यापि विलोकनीयताम् ॥
सुराङ्गनास्त्रासविलोलदृष्टयः ।
उपाययुः कम्पितपाणिपल्लवाः
सखीजनस्यापि विलोकनीयताम् ॥
सारांश
AI
चंचल मछलियों के स्पर्श से भयभीत देवांगनाएँ अपने कांपते हाथों और व्याकुल दृष्टि के कारण अपनी सखियों के लिए भी कौतूहल और विशेष आकर्षण का केंद्र बन गईं।
८.४६
भयादिवाश्लिष्य झषाहतेऽम्भसि
प्रियं मुदानन्दयति स्म मानिनी ।
अकृत्रिमप्रेमरसाहितैर्मनो
हरन्ति रामाः कृतकैरपीहितैः ॥
प्रियं मुदानन्दयति स्म मानिनी ।
अकृत्रिमप्रेमरसाहितैर्मनो
हरन्ति रामाः कृतकैरपीहितैः ॥
सारांश
AI
मछली से डरने का बहाना कर मानिनी स्त्री ने अपने प्रिय को गले लगा लिया; स्त्रियाँ अपने बनावटी हाव-भावों से भी प्रियतम का मन मोह लेने में कुशल होती हैं।
८.४७
तिरोहितान्तानि नितान्तमाकुलै-
रपां विगाहादलकैः प्रसारिभिः ।
ययुर्वधूनां वदनानि तुल्यतां
द्विरेफवृन्दान्तरितैः सरोरुहैः ॥
रपां विगाहादलकैः प्रसारिभिः ।
ययुर्वधूनां वदनानि तुल्यतां
द्विरेफवृन्दान्तरितैः सरोरुहैः ॥
सारांश
AI
जल में स्नान के समय बिखरे हुए बालों से ढके हुए स्त्रियों के मुख, भौरों के झुंड से घिरे हुए कमलों के समान अत्यंत सुंदर प्रतीत हो रहे थे।
८.४८
करौ धुनाना नवपल्लवाकृती
पयस्यगाधे किल जातसम्भ्रमा ।
सखीषु निर्वाच्यमधार्ष्ठ्यदूषितं
प्रियाङ्गसंश्लेषमवाप मानिनी ॥
पयस्यगाधे किल जातसम्भ्रमा ।
सखीषु निर्वाच्यमधार्ष्ठ्यदूषितं
प्रियाङ्गसंश्लेषमवाप मानिनी ॥
सारांश
AI
गहरे जल में घबराहट का बहाना कर हाथ हिलाती हुई मानिनी स्त्री ने सखियों के सामने अपनी धृष्टता को छिपाते हुए प्रिय का आलिंगन प्राप्त किया।
८.४९
प्रियैः सलीलं करवारिवारितः
प्रवृद्धनिःश्वासविकम्पितस्तनः ।
सविभ्रमाधूतकराग्रपल्लवो
यथार्थतामाप विलासिनीजनः ॥
प्रवृद्धनिःश्वासविकम्पितस्तनः ।
सविभ्रमाधूतकराग्रपल्लवो
यथार्थतामाप विलासिनीजनः ॥
सारांश
AI
प्रियतमों द्वारा क्रीड़ापूर्वक जल फेंके जाने पर लंबी साँसों से कांपते स्तनों और चंचल हाथों वाली वे स्त्रियाँ वास्तव में 'विलासिनी' नाम को सार्थक कर रही थीं।
८.५०
उदस्य धैर्यं दयितेन सादरं
प्रसादितायाः करवारिवारितम् ।
मुखं निमीलन्नयनं नतभ्रुवः
श्रियं सपत्नीवदनादिवाददे ॥
प्रसादितायाः करवारिवारितम् ।
मुखं निमीलन्नयनं नतभ्रुवः
श्रियं सपत्नीवदनादिवाददे ॥
सारांश
AI
प्रिय द्वारा फेंके गए जल को रोकने के लिए आँखें मूँदकर हाथ आगे बढ़ाती हुई सुंदरी का मुख ऐसा लग रहा था मानो उसने अपनी सौतनों की सारी शोभा छीन ली हो।
॥ इति अष्टमः सर्गः ॥
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