करौ धुनाना नवपल्लवाकृती
वृथा कृथा मानिनि मा परिश्रमम् ।
उपेयुषी कल्पलताभिशङ्कया
कथं न्वितस्त्रस्यति षट्पदावलिः ॥
करौ धुनाना नवपल्लवाकृती
वृथा कृथा मानिनि मा परिश्रमम् ।
उपेयुषी कल्पलताभिशङ्कया
कथं न्वितस्त्रस्यति षट्पदावलिः ॥
वृथा कृथा मानिनि मा परिश्रमम् ।
उपेयुषी कल्पलताभिशङ्कया
कथं न्वितस्त्रस्यति षट्पदावलिः ॥
अन्वयः
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मानिनि, नव-पल्लव-आकृती करौ धुनाना त्वम् वृथा परिश्रमम् मा कृथाः । कल्प-लता-अभिशङ्कया उपेयुषी षट्पद-आवलिः इतः कथम् नु त्रस्यति?
English Summary
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A friend says to a proud lady, "O proud one, do not waste your effort shaking your hands, which look like fresh sprouts. Why would this swarm of bees, which approached you mistaking you for a wish-fulfilling creeper, be frightened away by this?"
सारांश
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सखी ने कहा—हे मानिनी! तुम व्यर्थ ही अपने पल्लव जैसे हाथों को मत झटको; ये भ्रमर तुम्हें कल्पलता समझकर आ रहे हैं, इनसे तुम भयभीत क्यों हो रही हो?
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
कराविति ॥ मानपरिहारेण मधुपाश्रयणे तु न कश्चिद्बाध इत्याशयेन संबोधयतिहे मानिनीति । नवपल्लवस्याकृतिरिवाकृतिर्ययोरित्युपमा । तौ करौ धुनाना । धूञः क्रैयादिकाकर्तरि लटः शानच् । वृथा व्यर्थ परिश्रमं मा कृथा मा कुरुष्व । करोतेराशीरर्थे माङि लुङ् । वृथात्वे हेतुमाह-कल्पलताभिशङ्कया कल्पवल्लीभ्रमेणेति भ्रान्तिमदलंकारः। उपेयुष्युपगता षट्पदावलिः कथं न्वितस्त्रस्यति बिभेति । न त्रस्यत्येवेत्यर्थः ।
वा भ्राश- (अष्टाध्यायी ३.१.७० ) इत्यादिना विकल्पेन श्यन्प्रत्ययः । अत्र कान्तापरिश्रमवैयर्थ्यरूपकार्यस्य षट्पदावले: कल्पवल्लीभ्रमनिबन्धनवित्रासरूपकारणसमर्थनात्कारणेन कार्यसमर्थनरूपोऽर्थान्तरन्यासो भ्रान्तिमताङ्गाङ्गिभावेन संकीर्णः । स तूपमया संसृज्यते ॥ अथ काचित्सखी कांचित्प्रणयकुपितामाह-~
पदच्छेदः
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| करौ | कर (२.२) | two hands |
| धुनाना | धुनान (√धू+शानच्, १.१) | shaking |
| नवपल्लवाकृती | नवपल्लव–आकृति (२.२) | which have the form of new sprouts |
| वृथा | वृथा | in vain |
| कृथाः | कृथाः (√कृ कर्तरि लुङ् (परस्मै.) म.पु. एक.) | do |
| मानिनि | मानिनी (८.१) | O proud lady! |
| मा | मा | don't |
| परिश्रमम् | परिश्रम (२.१) | effort |
| उपेयुषी | उपेयिवस् (उप√इ+क्वसु+ङीप्, १.१) | having approached |
| कल्पलताभिशङ्कया | कल्पलता–अभिशङ्का (३.१) | with the suspicion of it being a wish-fulfilling creeper |
| कथं | कथम् | why |
| नु | नु | indeed |
| इतः | इतस् | from here |
| त्रस्यति | त्रस्यति (√त्रस् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | is frightened |
| षट्पदावलिः | षट्पद–आवलि (१.१) | a line of bees |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क | रौ | धु | ना | ना | न | व | प | ल्ल | वा | कृ | ती |
| वृ | था | कृ | था | मा | नि | नि | मा | प | रि | श्र | मम् |
| उ | पे | यु | षी | क | ल्प | ल | ता | भि | श | ङ्क | या |
| क | थं | न्वि | त | स्त्र | स्य | ति | ष | ट्प | दा | व | लिः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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