विपत्त्रलेखा निरलक्तकाधरा
निरञ्जनाक्षीरपि बिभ्रतीः श्रियम् ।
निरीक्ष्य रामा बुबुधे नभश्चरै-
रलंकृतं तद्वपुषैव मण्डनम् ॥
विपत्त्रलेखा निरलक्तकाधरा
निरञ्जनाक्षीरपि बिभ्रतीः श्रियम् ।
निरीक्ष्य रामा बुबुधे नभश्चरै-
रलंकृतं तद्वपुषैव मण्डनम् ॥
निरञ्जनाक्षीरपि बिभ्रतीः श्रियम् ।
निरीक्ष्य रामा बुबुधे नभश्चरै-
रलंकृतं तद्वपुषैव मण्डनम् ॥
अन्वयः
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नभः-चरैः विपत्त्र-लेखाः, निरलक्तक-अधराः, निरञ्जन-अक्षीः अपि श्रियम् बिभ्रतीः रामाः निरीक्ष्य, तत् मण्डनम् वपुषा एव अलंकृतम् (इति) बुबुधे।
English Summary
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Seeing the lovely women who, despite being without painted decorations, lac-dyed lips, or collyrium, still possessed great beauty, the celestials understood that it was the ornaments that were adorned by their bodies, and not the other way around.
सारांश
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बिना श्रृंगार और प्रसाधनों के भी उन स्त्रियों के स्वाभाविक सौंदर्य को देखकर देवताओं ने जान लिया कि उनका शरीर ही स्वयं में एक श्रेष्ठ आभूषण है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
विपत्रेति ॥ विगताः पत्रलेखास्तिलकविशेषा यासां ता विपत्रलेखाः। निरलक्तकाः क्षालितरागा अधरा यासां ताः। निरञ्जनान्यक्षीणि यासां ता निरञ्जनाक्षीरपि । ब्रवीहौ सपथ्यक्ष्णोः स्वाङ्गात्यच् ।
षिद्गौरादिभ्यश्च (अष्टाध्यायी ४.१.४१ ) इति ङीप् । तथापि श्रियं बिभ्रतीः शोभाकारणाभावेऽपि शोभमाना इति विभावनालंकारः । रामा निरीक्ष्य नभश्चरैर्गन्धर्वैस्तासां वपुषैव मण्डनमलंकृतम् । न तु मण्डनेन तद्वपुरित्यक्षरार्थः । इति बुबुधे ज्ञातम् । कर्मणि लिट् । स्वभावरमणीयानां किमलंकरणैरिति भावः ॥
पदच्छेदः
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| विपत्त्रलेखाः | वि–पत्रलेखा (२.३) | without decorative paintings, |
| निरलक्तकाधराः | निर्–अलक्तक–अधर (२.३) | with lips without lac-dye, |
| निरञ्जनाक्षीः | निर्–अञ्जन–अक्षि (२.३) | with eyes without collyrium, |
| अपि | अपि | even while |
| बिभ्रतीः | बिभ्रत् (√भृ+शतृ+ङीप्, २.३) | bearing |
| श्रियम् | श्री (२.१) | beauty, |
| निरीक्ष्य | निरीक्ष्य (निर्√ईक्ष्+ल्यप्) | having seen |
| रामाः | रामा (२.३) | the lovely women, |
| बुबुधे | बुबुधे (√बुध् भावकर्मणोः लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | it was understood |
| नभश्चरैः | नभस्–चर (३.३) | by the celestials |
| अलंकृतं | अलंकृत (अलम्√कृ+क्त, १.१) | is adorned |
| तद्वपुषैव | तद्–वपुस् (३.१)–एव | by their bodies themselves |
| मण्डनम् | मण्डन (१.१) | that the ornament |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | प | त्त्र | ले | खा | नि | र | ल | क्त | का | ध | रा |
| नि | र | ञ्ज | ना | क्षी | र | पि | बि | भ्र | तीः | श्रि | यम् |
| नि | री | क्ष्य | रा | मा | बु | बु | धे | न | भ | श्च | रै |
| र | लं | कृ | तं | त | द्व | पु | षै | व | म | ण्ड | नम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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