वरोरुभिर्वारणहस्तपीवरै-
श्चिराय खिन्नान्नवपल्लवश्रियः ।
समेऽपि यातुं चरणाननीश्वरा-
न्मदादिव प्रस्खलतः पदे पदे ॥
वरोरुभिर्वारणहस्तपीवरै-
श्चिराय खिन्नान्नवपल्लवश्रियः ।
समेऽपि यातुं चरणाननीश्वरा-
न्मदादिव प्रस्खलतः पदे पदे ॥
श्चिराय खिन्नान्नवपल्लवश्रियः ।
समेऽपि यातुं चरणाननीश्वरा-
न्मदादिव प्रस्खलतः पदे पदे ॥
अन्वयः
AI
(तासां) वरोरुभिः वारणहस्तपीवरैः (जघनानि गौरवैः स्थितानि) । चिराय खिन्नान् नवपल्लवश्रियः समे अपि पदे पदे मदात् इव प्रस्खलतः यातुम् अनीश्वरान् चरणान् (च दधन्ति) ।
English Summary
AI
(This verse describes their thighs and feet). They had excellent thighs, plump like an elephant's trunk. Their feet, beautiful as new sprouts and long fatigued, were unable to walk even on level ground, stumbling at every step as if from intoxication.
सारांश
AI
हाथी की सूंड जैसी पुष्ट जंघाओं वाली देवांगनाएँ मार्ग में थक जाने के कारण समतल भूमि पर भी मदमस्त होकर लड़खड़ाते हुए धीरे-धीरे चल रही थीं।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
वरोरुभिरिति ॥ अनुसानु सानुषु यद्वर्त्म ततः सकाशाद्गुरुणा खेदेन भन्थरमलसं विनिर्यतीनां निर्गच्छन्तीनां सुराङ्गनानां संबन्धिभिर्वारणहस्तपीवरैः करिकरस्थूलैः । वराश्च त उरवश्चेति तैः । चिराय खिन्नान् । किं च नवपल्लवानां श्रीरिव श्रीर्येषां तान् । तद्वन्मृदूनित्यर्थः । अत एव समे समस्थलेऽपि । किं पुनर्विषम इति भावः । यातुं गन्तुमनीश्वरानशक्तानत एव मदादिव पदे पदे । वीप्सायां द्विर्भावः । प्रस्खलतश्चरणान् । मदादिवेत्युपमा ॥
पदच्छेदः
AI
| वरोरुभिः | वर–ऊरु (३.३) | with excellent thighs |
| वारणहस्तपीवरैः | वारण–हस्त–पीवर (३.३) | plump like an elephant's trunk |
| चिराय | चिराय | for a long time |
| खिन्नान् | खिन्न (√खिद्+क्त, २.३) | fatigued |
| नवपल्लवश्रियः | नव–पल्लव–श्री (२.३) | having the beauty of new sprouts |
| समे | सम (७.१) | on even ground |
| अपि | अपि | even |
| यातुं | यातुम् (√या+तुमुन्) | to walk |
| चरणान् | चरण (२.३) | feet |
| अनीश्वरान् | अनीश्वर (२.३) | unable |
| मदात् | मद (५.१) | from intoxication |
| इव | इव | as if |
| प्रस्खलतः | प्रस्खलत् (प्र√स्खल्+शतृ, २.३) | stumbling |
| पदे | पद (७.१) | at every step |
| पदे | पद (७.१) | at every step |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| व | रो | रु | भि | र्वा | र | ण | ह | स्त | पी | व | रै |
| श्चि | रा | य | खि | न्ना | न्न | व | प | ल्ल | व | श्रि | यः |
| स | मे | ऽपि | या | तुं | च | र | णा | न | नी | श्व | रा |
| न्म | दा | दि | व | प्र | स्ख | ल | तः | प | दे | प | दे |
| ज | त | ज | र | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.