श्रिया हसद्भिः कलमानि सस्मितै-
रलंकृताम्बुः प्रतिमागतैर्मुखैः ।
कृतानुकूल्या सुरराजयोषितां
प्रसादसाफल्यमवाप जाह्वनी ॥
श्रिया हसद्भिः कलमानि सस्मितै-
रलंकृताम्बुः प्रतिमागतैर्मुखैः ।
कृतानुकूल्या सुरराजयोषितां
प्रसादसाफल्यमवाप जाह्वनी ॥
रलंकृताम्बुः प्रतिमागतैर्मुखैः ।
कृतानुकूल्या सुरराजयोषितां
प्रसादसाफल्यमवाप जाह्वनी ॥
अन्वयः
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श्रिया कलमानि हसद्भिः स-स्मितैः प्रतिमा-गतैः मुखैः अलंकृत-अम्बुः जाह्नवी सुर-राज-योषिताम् कृत-अनुकूल्या (सती) प्रसाद-साफल्यम् अवाप।
English Summary
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The river Ganges, its waters adorned by the reflected, smiling faces of the celestial women which mocked the lotuses with their beauty, having thus shown favor to these consorts of the king of gods, attained the full fruition of its grace.
सारांश
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गंगा का जल देवांगनाओं के प्रतिबिंबित मुस्कुराते मुखों से सुशोभित होकर और कमलों की शोभा को पीछे छोड़ते हुए अपनी सेवा की सफलता का अनुभव कर रहा था।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
श्रियेति ॥ श्रिया शोभया कमलानि हसद्भिः। कमलसदृशैरित्यर्थः ।
हसतीर्ष्यत्यसूयति इति दण्डिना सदृशपर्यायपरा उक्ताः । सस्मितै: प्रतिमागतैः । प्रतिबिम्बगतैरित्यर्थः । प्रतिमानं प्रतिबिम्बं प्रतिमा इत्यमरः (अमरकोशः २.१०.३६ ) । मुखैरलंकृतान्यम्बूनि यस्याः सा । किं च सुरराजयोषितां कृतमानुकूल्यं विहाराद्युपकारो यया सा । इत्थं योषिद्भिरुपकृता स्वयं च तासामुपचिकीर्षुर्जाह्नवी गङ्गा प्रसादस्य स्वच्छत्वस्य साफल्यम् । अर्थगौरववत्षष्ठीसमासनिर्वाहः। अवाप । अप्रसन्नाम्भसि विहारबिम्बग्रहणयोरसंभवादित्यर्थः। स्वच्छा एव हि परैरुपक्रियन्ते स्वयं चोपकुर्वते तेषामिति भावः । कृतानुकारा इति पाठेऽनुकारोऽनुकूलकरणमुपकार इत्येवं व्याख्येयम्।अत्र जाहृवीविशेषणपदार्थस्य साफल्यं प्रति हेतुत्वाकाव्यलिङ्गमलंकारः ॥
पदच्छेदः
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| श्रिया | श्री (३.१) | with their beauty |
| हसद्भिः | हसत् (√हस्+शतृ, ३.३) | mocking |
| कलमानि | कलम (२.३) | the lotuses, |
| सस्मितैः | सस्मित (३.३) | with smiles, |
| अलंकृताम्बुः | अलंकृत (अलम्√कृ+क्त)–अम्बु (१.१) | whose water was adorned |
| प्रतिमागतैः | प्रतिमा–गत (३.३) | by the reflected |
| मुखैः | मुख (३.३) | faces, |
| कृतानुकूल्या | कृत (√कृ+क्त)–आनुकूल्य (१.१) | having shown favor |
| सुरराजयोषितां | सुरराज–योषित् (६.३) | to the women of the king of gods, |
| प्रसादसाफल्यम् | प्रसाद–साफल्य (२.१) | the fruitfulness of its grace |
| अवाप | अवाप (अव√आप् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | attained |
| जाह्नवी | जाह्नवी (१.१) | the river Ganges. |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श्रि | या | ह | स | द्भिः | क | ल | मा | नि | स | स्मि | तै |
| र | लं | कृ | ता | म्बुः | प्र | ति | मा | ग | तै | र्मु | खैः |
| कृ | ता | नु | कू | ल्या | सु | र | रा | ज | यो | षि | तां |
| प्र | सा | द | सा | फ | ल्य | म | वा | प | जा | ह्व | नी |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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