जहीहि कोपं दयितोऽनुगम्यतां
पुरानुशेते तव चञ्चलं मनः ।
इति प्रियं कांचिदुपैतुमिच्छतीं
पुरोऽनुनिन्ये निपुणः सखीजनः ॥
जहीहि कोपं दयितोऽनुगम्यतां
पुरानुशेते तव चञ्चलं मनः ।
इति प्रियं कांचिदुपैतुमिच्छतीं
पुरोऽनुनिन्ये निपुणः सखीजनः ॥
पुरानुशेते तव चञ्चलं मनः ।
इति प्रियं कांचिदुपैतुमिच्छतीं
पुरोऽनुनिन्ये निपुणः सखीजनः ॥
अन्वयः
AI
"कोपम् जहीहि, दयितः अनुगम्यताम् । तव चञ्चलम् मनः पुरः अनुशेते ।" इति, प्रियम् उपैतुम् इच्छतीम् कांचित् निपुणः सखी-जनः पुरः अनुनिन्ये ।
English Summary
AI
"Give up your anger, follow your beloved! Your fickle mind will regret it later." With these words, a skillful group of friends persuaded a certain woman who, despite her anger, secretly wished to go to her lover.
सारांश
AI
चतुर सखियों ने प्रियतम के पास जाने की इच्छुक किसी मानिनी को यह कहकर मनाया कि क्रोध त्यागो और प्रिय के पीछे जाओ, अन्यथा तुम्हारा चंचल मन बाद में पछताएगा।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
जहीहीति ॥ प्रियमुपैतुं स्वयमेवानुसर्तुमिच्छतीम् ।
आच्छीनद्योर्नुम् (अष्टाध्यायी ७.१.८० ) इति विकल्पान्नुमभावः। कांचिन्नायिकां निपुणश्चित्तज्ञ: सखीजनः। कोपं जहीहि त्यज । आ च हौ (अष्टाध्यायी ६.४.११७ ) इति विकल्पादीकारादेशः । दयितोऽनुगम्यतामनुस्रियताम् । उभयथापि प्रार्थनायां लोट् । अन्यथा चञ्चलमस्थिरं तव मनः पुरानुशेतेऽग्रेऽनुशयिष्यते । अनुतप्स्यत इत्यर्थः । यावत्पुरानिपातयोर्लट् (अष्टाध्यायी ३.३.४ ) इति लट् । इत्यनेन प्रकारेण पुरः पूर्वमेवानुनिन्ये प्रसादयामास॥ अथ चतुर्भिः श्लोकैः कलापकमाह
पदच्छेदः
AI
| जहीहि | जहीहि (√हा कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | abandon! |
| कोपं | कोप (२.१) | anger |
| दयितः | दयित (१.१) | the beloved |
| अनुगम्यताम् | अनुगम्यताम् (अनु√गम् भावकर्मणोः लोट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | let be followed |
| पुरः | पुरस् | afterwards |
| अनुशेते | अनुशेते (अनु√शी कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | repents |
| तव | युष्मद् (६.१) | your |
| चञ्चलं | चञ्चल (१.१) | fickle |
| मनः | मनस् (१.१) | mind |
| इति | इति | thus |
| प्रियं | प्रिय (२.१) | the beloved |
| कांचित् | कांचित् (२.१) | a certain woman |
| उपैतुम् | उपैतुम् (उप√इ+तुमुन्) | to approach |
| इच्छतीम् | इच्छन्ती (√इष्+शतृ+ङीप्, २.१) | who wished |
| पुरः | पुरस् | forward |
| अनुनिन्ये | अनुनिन्ये (अनु√नी कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | persuaded |
| निपुणः | निपुण (१.१) | skillful |
| सखीजनः | सखी–जन (१.१) | the group of friends |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ज | ही | हि | को | पं | द | यि | तो | ऽनु | ग | म्य | तां |
| पु | रा | नु | शे | ते | त | व | च | ञ्च | लं | म | नः |
| इ | ति | प्रि | यं | कां | चि | दु | पै | तु | मि | च्छ | तीं |
| पु | रो | ऽनु | नि | न्ये | नि | पु | णः | स | खी | ज | नः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.