व्यपोहितुं लोचनतो मुखानिलै-
रपारयन्तं किल पुष्पजं रजः ।
पयोधरेणोरसि काचिदुन्मनाः
प्रियं जघानोन्नतपीवरस्तनी ॥
व्यपोहितुं लोचनतो मुखानिलै-
रपारयन्तं किल पुष्पजं रजः ।
पयोधरेणोरसि काचिदुन्मनाः
प्रियं जघानोन्नतपीवरस्तनी ॥
रपारयन्तं किल पुष्पजं रजः ।
पयोधरेणोरसि काचिदुन्मनाः
प्रियं जघानोन्नतपीवरस्तनी ॥
अन्वयः
AI
काचित् उन्नतपीवरस्तनी उन्मनाः (सती) लोचनतः पुष्पजं रजः मुखानिलैः व्यपोहितुम् अपारयन्तं प्रियं उरसि पयोधरेण जघान किल ।
English Summary
AI
A certain woman with high, plump breasts, feigning agitation, struck her beloved on the chest with her breast. He was unable to remove the flower pollen from his eye by blowing on it, and she pretended to strike him in anger.
सारांश
AI
आँखों में पड़े पराग को प्रियतम द्वारा फूँक मारकर निकालने का बहाना कर, किसी उन्नत स्तनों वाली कामिनी ने उन्हें अपने हृदय से लगा लिया।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
व्यपोहितुमिति ॥ उन्नतौ च पीवरौ च स्तनौ यस्याः सोन्नतपीवरस्तनी।
स्याङ्गाच्च- इत्यादिना ङीप्। काचिल्लोचनतः स्वनेत्रात्पुष्पजं रजः परागं मुखानिलैः फूत्कारमारुतैर्व्यपोहितुमपनेतुमपारयन्तं किलाशक्नुवन्तं किलेत्यलोके । वस्तुतस्तदास्यस्पर्शलोभादपारयन्तमित्यर्थः । प्रियमुन्मना उत्सुका सत्यत एव पयोधरेणोरसि जघान । तत्कपटपरिज्ञानजन्यादौत्सुक्यादिति भावः। हननस्थानत्वादुरसीति-सप्तमी। इयं च प्रगल्भैव ॥
पदच्छेदः
AI
| व्यपोहितुं | व्यपोहितुम् (वि+अप√ऊह्+तुमुन्) | to remove |
| लोचनतः | लोचनतस् | from the eye |
| मुखानिलैः | मुख–अनिल (३.३) | with the breaths from his mouth |
| अपारयन्तं | अपारयन्त (√पॄ+णिच्+शतृ, २.१) | the one who was unable |
| किल | किल | feigning |
| पुष्पजं | पुष्पज (२.१) | pollen |
| रजः | रजस् (२.१) | dust |
| पयोधरेण | पयोधर (३.१) | with her breast |
| उरसि | उरस् (७.१) | on the chest |
| काचित् | काचित् (१.१) | a certain woman |
| उन्मनाः | उन्मनस् (१.१) | agitated |
| प्रियं | प्रिय (२.१) | her beloved |
| जघान | जघान (√हन् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | struck |
| उन्नतपीवरस्तनी | उन्नत–पीवर–स्तन (१.१) | she with high and plump breasts |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| व्य | पो | हि | तुं | लो | च | न | तो | मु | खा | नि | लै |
| र | पा | र | य | न्तं | कि | ल | पु | ष्प | जं | र | जः |
| प | यो | ध | रे | णो | र | सि | का | चि | दु | न्म | नाः |
| प्रि | यं | ज | घा | नो | न्न | त | पी | व | र | स्त | नी |
| ज | त | ज | र | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.