५.१
अथ जयाय नु मेरुमहीभृतो
रभसया नु दिगन्तदिदृक्षया ।
अभिययौ स हिमाचलमुच्छ्रितं
समुदितं नु विलङ्घयितुं नभः ॥
रभसया नु दिगन्तदिदृक्षया ।
अभिययौ स हिमाचलमुच्छ्रितं
समुदितं नु विलङ्घयितुं नभः ॥
सारांश
AI
अर्जुन विजय की आकांक्षा से अथवा दिशाओं के अंत को देखने के वेग से या मानो आकाश को लाँघने के लिए उस अत्यंत ऊँचे हिमालय पर्वत पर पहुँचे।
५.२
तपनमण्डलदीतितमेकतः
सततनैशतमोवृतमन्यतः ।
हसितभिन्नतमिस्रचयं पुरः
शिवमिवानुगतं गजचर्मणा ॥
सततनैशतमोवृतमन्यतः ।
हसितभिन्नतमिस्रचयं पुरः
शिवमिवानुगतं गजचर्मणा ॥
सारांश
AI
एक ओर सूर्य की किरणों से प्रकाशित और दूसरी ओर निरंतर अंधकार से घिरा वह पर्वत ऐसा लग रहा था मानो हाथी की खाल ओढ़े साक्षात भगवान शिव सामने खड़े हों।
५.३
क्षितिनभःसुरलोकनिवासिभिः
कृतनिकेतमदृष्टपरस्परैः ।
प्रथयितुं विभुतामभिनिर्मितं
प्रतिनिधिं जगतामिव शम्भुना ॥
कृतनिकेतमदृष्टपरस्परैः ।
प्रथयितुं विभुतामभिनिर्मितं
प्रतिनिधिं जगतामिव शम्भुना ॥
सारांश
AI
तीनों लोकों के निवासियों का आश्रय स्थल यह पर्वत मानो शिव द्वारा अपनी सर्वव्यापकता सिद्ध करने के लिए संपूर्ण जगत के एक प्रतिनिधि के रूप में रचा गया है।
५.४
भुजगराजसितेन नभःश्रिया
कनकराजिविराजितसानुना ।
समुदितं निचयेन तडित्वतीं
लघयता शरदम्बुदसंहतिम् ॥
कनकराजिविराजितसानुना ।
समुदितं निचयेन तडित्वतीं
लघयता शरदम्बुदसंहतिम् ॥
सारांश
AI
शेषनाग के समान धवल शिखरों और स्वर्ण रेखाओं से युक्त वह पर्वत अपनी ऊँचाई से बिजली वाले शरद ऋतु के बादलों के समूह को भी छोटा कर रहा था।
५.५
मणिमयूखचयांशुकभासुराः
सुरवधूपरिभुक्तलतागृहाः ।
दधतमुच्चशिलान्तरगोपुराः
पुर इवोदितपुष्पवना भुवः ॥
सुरवधूपरिभुक्तलतागृहाः ।
दधतमुच्चशिलान्तरगोपुराः
पुर इवोदितपुष्पवना भुवः ॥
सारांश
AI
मणियों की किरणों से जगमगाते लता-गृहों और ऊँची शिलाओं रूपी द्वारों से युक्त वह पर्वत भूमि खिले हुए फूलों वाले उपवनों से सुसज्जित किसी नगर के समान लग रही थी।
५.६
अविरतोज्झितवारिविपाण्डुभि-
र्विरहितैरचिरद्युतितेजसा ।
उदितपक्षमिवारतनिःस्वनैः
पृथुनितम्बविलम्बिभिरम्बुदैः ॥
र्विरहितैरचिरद्युतितेजसा ।
उदितपक्षमिवारतनिःस्वनैः
पृथुनितम्बविलम्बिभिरम्बुदैः ॥
सारांश
AI
पर्वत के विशाल ढलानों पर लटके हुए जलविहीन और बिजली की चमक से रहित सफेद बादल ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो हिमालय के श्वेत पंख निकल आए हों।
५.७
दधतमाकरिभिः करिभिः क्षतैः
समवतारसमैरसमैस्तटैः ।
विविधकामहिता महिताम्भसः
स्फुटसरोजवना जवना नदीः ॥
समवतारसमैरसमैस्तटैः ।
विविधकामहिता महिताम्भसः
स्फुटसरोजवना जवना नदीः ॥
सारांश
AI
मदमस्त हाथियों द्वारा तोड़े गए ऊबड़-खाबड़ तटों वाली और खिले हुए कमलों से युक्त वेगवती नदियाँ उस पर्वत की शोभा को और अधिक बढ़ा रही थीं।
५.८
नवविनिद्रजपाकुसुमत्विषां
द्युतिमतां निकरेण महाश्मनाम् ।
विहितसांध्यमयूखमिव क्वचि-
न्निचितकाञ्चनभित्तिषु सानुषु ॥
द्युतिमतां निकरेण महाश्मनाम् ।
विहितसांध्यमयूखमिव क्वचि-
न्निचितकाञ्चनभित्तिषु सानुषु ॥
सारांश
AI
ताजे खिले जपाकुसुम जैसी कांति वाली विशाल मणियों के कारण पर्वत की स्वर्णमयी चोटियों पर सदैव संध्याकालीन लालिमा का आभास होता रहता था।
५.९
पृथुकदम्बकदम्बकराजितं
ग्रहितमालतमालवनाकुलम् ।
लघुतुषारतुषारजलश्च्युतं
धृतसदानसदाननदन्तिनम् ॥
ग्रहितमालतमालवनाकुलम् ।
लघुतुषारतुषारजलश्च्युतं
धृतसदानसदाननदन्तिनम् ॥
सारांश
AI
कदम्ब और तमाल के सघन वनों से युक्त वह पर्वत मदमस्त हाथियों के विचरण और ओस की शीतल बूंदों के गिरने से अत्यंत मनोहारी लग रहा था।
५.१०
रहितरत्नचयान्न शिलोच्चया-
नफलताभवना न दरीभुवः ।
विपुलिनाम्बुरुहा न सरिद्वधू-
रकुसुमान्दधतं न महीरुहः ॥
नफलताभवना न दरीभुवः ।
विपुलिनाम्बुरुहा न सरिद्वधू-
रकुसुमान्दधतं न महीरुहः ॥
सारांश
AI
उस पर्वत पर कोई भी शिखर मणियों से रहित, कोई गुफा फलों से विहीन, कोई नदी कमलों के बिना और कोई वृक्ष फूलों से खाली नहीं था।
५.११
व्यथितसिन्धुमनीरशनैः शनै-
रमरलोकवधूजघनैर्घनैः ।
फणभृतामभितो विततं ततं
दयितरम्यलताबकुलैः कुलैः ॥
रमरलोकवधूजघनैर्घनैः ।
फणभृतामभितो विततं ततं
दयितरम्यलताबकुलैः कुलैः ॥
सारांश
AI
देववधुओं के विलास से क्षुब्ध जल वाली तथा सर्पों और सुंदर बकुल लताओं से व्याप्त वह पर्वत भूमि अत्यंत रमणीय प्रतीत हो रही थी।
५.१२
ससुरचापमनेकमणिप्रभै-
रपपयोविशदं हिमपाण्डुभिः ।
अविचलं शिखरैरुपबिभ्रतं
ध्वनितसूचितमम्बुमुचां चयम् ॥
रपपयोविशदं हिमपाण्डुभिः ।
अविचलं शिखरैरुपबिभ्रतं
ध्वनितसूचितमम्बुमुचां चयम् ॥
सारांश
AI
अनेक मणियों की कांति और इन्द्रधनुष से सुशोभित हिम के समान श्वेत बादलों के समूह को पर्वत अपने अडिग शिखरों पर धारण किए हुए था।
५.१३
विकचवारिरुहं दधतं सरः
सकलहंसगणं शुचि मानसम् ।
शिवमगात्मजया च कृतेर्ष्यया
सकलहं सगणं शुचिमानसम् ॥
सकलहंसगणं शुचि मानसम् ।
शिवमगात्मजया च कृतेर्ष्यया
सकलहं सगणं शुचिमानसम् ॥
सारांश
AI
वह पर्वत खिले कमलों और हंसों से युक्त मानसरोवर को धारण करता है, जो पार्वती के प्रति ईर्ष्या और गणों के साथ रहने वाले शिव के निर्मल मन के समान है।
५.१४
ग्रहविमानगणानभितो दिवं
ज्वलयतौषधिजेन कृशानुना ।
मुहुरनुस्मरयन्तमनुक्षपं
त्रिपुरदाहमुपापतिसेविनः ॥
ज्वलयतौषधिजेन कृशानुना ।
मुहुरनुस्मरयन्तमनुक्षपं
त्रिपुरदाहमुपापतिसेविनः ॥
सारांश
AI
वहाँ की ओषधियों से निकलने वाली अग्नि रात्रि में आकाश को इस प्रकार प्रकाशित करती थी मानो शिव के सेवकों को त्रिपुर-दाह की घटना की याद दिला रही हो।
५.१५
विततशीकरराशिभिरुच्छ्रितै-
रुपलरोधविवर्तिभिरम्बुभिः ।
दधतमुन्नतसानुसमुद्धतां
धृतसितव्यजनामिव जाह्नवीम् ॥
रुपलरोधविवर्तिभिरम्बुभिः ।
दधतमुन्नतसानुसमुद्धतां
धृतसितव्यजनामिव जाह्नवीम् ॥
सारांश
AI
ऊँची चोटियों से गिरती और पत्थरों से टकराकर बिखरती गंगा की जलधाराएँ ऐसी लग रही थीं मानो हिमालय ने सफेद चँवर धारण कर रखे हों।
५.१६
अनुचरेण धनाधिपतेरथो
नगविलोकनविस्मितमानसः ।
स जगदे वचनं प्रियमादरा-
न्मुखरतावसरे हि विराजते ॥
नगविलोकनविस्मितमानसः ।
स जगदे वचनं प्रियमादरा-
न्मुखरतावसरे हि विराजते ॥
सारांश
AI
पर्वत की सुंदरता देख विस्मित हुए अर्जुन से कुबेर के अनुचर ने आदरपूर्वक प्रिय वचन कहे, क्योंकि सही समय पर बोलना ही वाक्पटुता की शोभा है।
५.१७
अलमेष विलोकितः प्रजानां
सहसा संहतिमंहसां विहन्तुम् ।
घनवर्त्म सहस्रधेव कुर्व-
न्हिमगौरैरचलाधिपः शिरोभिः ॥
सहसा संहतिमंहसां विहन्तुम् ।
घनवर्त्म सहस्रधेव कुर्व-
न्हिमगौरैरचलाधिपः शिरोभिः ॥
सारांश
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बर्फ की तरह सफेद शिखरों से बादलों के मार्ग को विभाजित करने वाला यह पर्वतराज केवल दर्शन मात्र से ही मनुष्यों के समस्त पापों को नष्ट करने की शक्ति रखता है।
५.१८
इह दुरधिगमैः किंचिदेवागमैः
सततमसुतरं वर्णयन्त्यन्तरम् ।
अमुमतिविपिनं वेद दिग्व्यापिनं
पुरुषमिव परं पद्मयोनिः परम् ॥
सततमसुतरं वर्णयन्त्यन्तरम् ।
अमुमतिविपिनं वेद दिग्व्यापिनं
पुरुषमिव परं पद्मयोनिः परम् ॥
सारांश
AI
जिस प्रकार ब्रह्मा ही परम पुरुष के स्वरूप को जानते हैं, उसी प्रकार अत्यंत सघन वनों वाले और दिशाओं में व्याप्त इस पर्वत के विस्तार को केवल ब्रह्मा ही जान सकते हैं।
५.१९
रुचिरपल्लवपुष्पलतागृहै-
रुपलसज्जलजैर्जलराशिभिः ।
नयति संततमुत्सुकतामयं
धृतिमतीरुपकान्तमपि स्त्रियः ॥
रुपलसज्जलजैर्जलराशिभिः ।
नयति संततमुत्सुकतामयं
धृतिमतीरुपकान्तमपि स्त्रियः ॥
सारांश
AI
सुंदर पल्लवों, पुष्पों और कमलों से युक्त जलाशयों वाला यह पर्वत अत्यंत धैर्यवान स्त्रियों के मन में भी अपने प्रिय के मिलन की उत्कंठा जगा देता है।
५.२०
सुलभैः सदा नयवतायवता
निधिगुह्यकाधिपरमैः परमैः ।
अमुना धनैः क्षितिभृतातिभृता
समतीत्य भाति जगती जगती ॥
निधिगुह्यकाधिपरमैः परमैः ।
अमुना धनैः क्षितिभृतातिभृता
समतीत्य भाति जगती जगती ॥
सारांश
AI
कुबेर की निधियों से भी श्रेष्ठ और नीतिवान पुरुषों के लिए सुलभ धन-संपदा से परिपूर्ण यह पर्वत अपनी महिमा में संपूर्ण जगत को पीछे छोड़ देता है।
५.२१
अखिलमिदममुष्य गैरीगुरो-
स्त्रिभुवनमपि नैति मन्ये तुलाम् ।
अधिवसति सदा यदेनं जनै-
रविदितविभवो भवानीपतिः ॥
स्त्रिभुवनमपि नैति मन्ये तुलाम् ।
अधिवसति सदा यदेनं जनै-
रविदितविभवो भवानीपतिः ॥
सारांश
AI
मैं मानता हूँ कि यह संपूर्ण त्रिभुवन भी हिमालय की तुलना नहीं कर सकता, क्योंकि यहाँ पार्वती के पति भगवान शिव, जिनका वैभव सामान्य जनों के लिए अज्ञात है, सदैव निवास करते हैं।
५.२२
वीतजन्मजरसं परं शुचि
ब्रह्मणः पदमुपैतुमिच्छताम् ।
आगमादिव तमोपहादितः
सम्भवन्ति मतयो भवच्छिदः ॥
ब्रह्मणः पदमुपैतुमिच्छताम् ।
आगमादिव तमोपहादितः
सम्भवन्ति मतयो भवच्छिदः ॥
सारांश
AI
जन्म और मृत्यु से रहित ब्रह्म के परम पद को प्राप्त करने के इच्छुक मुनियों को इस पर्वत से वैसे ही संसार-बंधन काटने वाली बुद्धि प्राप्त होती है, जैसे अज्ञान को मिटाने वाले वेदों से प्राप्त होती है।
५.२३
दिव्यस्त्रीणां सचरणलाक्षारागा
रागायाते निपतितपुष्पापीडाः ।
पीडाभाजः कुसुमचिताः साशंसं
शंसन्त्यस्मिन्सुरतविशेषं शय्याः ॥
रागायाते निपतितपुष्पापीडाः ।
पीडाभाजः कुसुमचिताः साशंसं
शंसन्त्यस्मिन्सुरतविशेषं शय्याः ॥
सारांश
AI
यहाँ दिव्य स्त्रियों के चरणों के महावर से रंजित और बिखरे हुए फूलों वाली शय्याएँ, उन पर पड़े निशानों के माध्यम से यहाँ सम्पन्न हुए श्रेष्ठ रति-क्रीड़ा के सुखों का परिचय देती हैं।
५.२४
गुणसम्पदा समधिगम्य परं
महिमानमत्र महिते जगताम् ।
नयशालिनि श्रिय इवाधिपतौ
विरमन्ति न ज्वलितुमौषधयः ॥
महिमानमत्र महिते जगताम् ।
नयशालिनि श्रिय इवाधिपतौ
विरमन्ति न ज्वलितुमौषधयः ॥
सारांश
AI
विश्व में पूजनीय इस हिमालय पर, नीतिवान राजा के पास रहने वाली लक्ष्मी की तरह, दिव्य औषधियाँ अपनी गुण-संपदा के कारण महान महिमा को प्राप्त कर निरंतर प्रज्वलित रहती हैं।
५.२५
कुररीगणः कृतरवस्तरवः
कुसुमानताः सकमलं कमलम् ।
इह सिन्धवश्च वरणावरणाः
करिणां मुदे सनलदानलदाः ॥
कुसुमानताः सकमलं कमलम् ।
इह सिन्धवश्च वरणावरणाः
करिणां मुदे सनलदानलदाः ॥
सारांश
AI
यहाँ पक्षियों का कलरव, फूलों से लदे वृक्ष, कमलों से युक्त सरोवर और सुगन्धित घास वाली नदियाँ हाथियों को असीम आनंद प्रदान करती हैं।
५.२६
सादृश्यं गतमपनिद्रचूतगन्धै-
रामोदं मदजलसेकजं दधानः ।
एतस्मिन्मदयति कोकिलानकाले
लीनालिः सुरकरिणां कपोलकाषः ॥
रामोदं मदजलसेकजं दधानः ।
एतस्मिन्मदयति कोकिलानकाले
लीनालिः सुरकरिणां कपोलकाषः ॥
सारांश
AI
मदजल की गंध से युक्त और खिलते हुए आम के बौर जैसी सुगंध वाला यह हिमालय, असमय में भी कोयल को मदमस्त कर देता है और दिग्गजों के कपोलों के रगड़ से यहाँ भौंरे छिपे रहते हैं।
५.२७
सनाकवनितं नितम्बरुचिरं
चिरं सुनिनदैर्नदैर्वृतममुम् ।
मता फलवतोऽवतो रसपरा
परास्तवसुधा सुधाधिवसति ॥
चिरं सुनिनदैर्नदैर्वृतममुम् ।
मता फलवतोऽवतो रसपरा
परास्तवसुधा सुधाधिवसति ॥
सारांश
AI
देवांगनाओं से युक्त, सुंदर नितम्बों वाले प्रदेशों से सुशोभित और नदियों के मधुर स्वर से गुंजायमत यह हिमालय पृथ्वी के अमृत के समान है, जो यहाँ रहने वालों को मनोवांछित फल देता है।
५.२८
श्रीमल्लताभवनमोषधयः प्रदीपाः
शय्या नवानि हरिचन्दनपल्लवानि ।
अस्मिन्रतिश्रमनुदश्च सरोजवाताः
स्मर्तुं दिशन्ति न दिवः सुरसुन्दरीभ्यः ॥
शय्या नवानि हरिचन्दनपल्लवानि ।
अस्मिन्रतिश्रमनुदश्च सरोजवाताः
स्मर्तुं दिशन्ति न दिवः सुरसुन्दरीभ्यः ॥
सारांश
AI
यहाँ की लताएँ घर हैं, औषधियाँ दीपक हैं, कोमल पत्ते शय्या हैं और कमलों की सुगंध वाली वायु रति की थकान मिटाती है, जिससे यहाँ के निवासी स्वर्ग की अप्सराओं को भी भूल जाते हैं।
५.२९
ईशार्थमम्भसि चिराय तपश्चरन्त्या
यादोविलङ्घनविलोलविलोचनायाः ।
आलम्बताग्रकरमत्र भवो भवान्याः
श्च्योतन्निदाघसलिलाङ्गुलिना करेण ॥
यादोविलङ्घनविलोलविलोचनायाः ।
आलम्बताग्रकरमत्र भवो भवान्याः
श्च्योतन्निदाघसलिलाङ्गुलिना करेण ॥
सारांश
AI
शिव को प्राप्त करने के लिए जल में दीर्घकाल तक तपस्या करती हुई पार्वती का हाथ, पसीने की बूंदों से युक्त उंगलियों वाले भगवान शिव ने सहारा देने के लिए पकड़ा था।
५.३०
येनापविद्धसलिलः स्फुटनागसद्मा
देवासुरैरमृतमम्बुनिधिर्ममन्थे ।
व्यावर्तनैरहिपतेरयमाहिताङ्कः
खं व्यालिखन्निव विभाति स मन्दराद्रिः ॥
देवासुरैरमृतमम्बुनिधिर्ममन्थे ।
व्यावर्तनैरहिपतेरयमाहिताङ्कः
खं व्यालिखन्निव विभाति स मन्दराद्रिः ॥
सारांश
AI
यह वही मन्दराचल पर्वत है जिससे देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन किया था; वासुकी नाग के रगड़ के निशानों से युक्त यह पर्वत ऐसा प्रतीत होता है मानो आकाश को खुरच रहा हो।
५.३१
नीतोच्छ्रायं मुहुरशिशिररश्मेरुस्रै-
रानीलाभैर्विरचितपरभागा रत्नैः ।
ज्योत्स्नाशङ्कामिव वितरति हंसश्येनी
मध्येऽप्यह्नः स्फटिकरजतभित्तिच्छाया ॥
रानीलाभैर्विरचितपरभागा रत्नैः ।
ज्योत्स्नाशङ्कामिव वितरति हंसश्येनी
मध्येऽप्यह्नः स्फटिकरजतभित्तिच्छाया ॥
सारांश
AI
सूर्य की किरणों और नीलम मणियों की आभा से युक्त यहाँ की स्फटिक और चांदी जैसी धवल दीवारें दोपहर में भी चांदनी का भ्रम पैदा करती हैं।
५.३२
दधत इव विलासशालि नृत्यं
मृदु पतता पवनेन कम्पितानि ।
इह ललितविलासिनीजनभ्रू-
गतिकुटिलेषु पयःसु पङ्कजानि ॥
मृदु पतता पवनेन कम्पितानि ।
इह ललितविलासिनीजनभ्रू-
गतिकुटिलेषु पयःसु पङ्कजानि ॥
सारांश
AI
मंद पवन से कंपित यहाँ के कमलों की चंचलता ऐसी जान पड़ती है मानो वे सुंदर स्त्रियों की भौंहों के समान टेढ़ी गति वाला कोई विलासपूर्ण नृत्य कर रहे हों।
५.३३
अस्मिन्नगृह्यत पिनाकभृता सलील-
माबद्धवेपथुरधीरविलोचनायाः ।
विन्यस्तमङ्गलमहौषधिरीश्वरायाः
स्रस्तोरगप्रतिसरेण करेण पाणिः ॥
माबद्धवेपथुरधीरविलोचनायाः ।
विन्यस्तमङ्गलमहौषधिरीश्वरायाः
स्रस्तोरगप्रतिसरेण करेण पाणिः ॥
सारांश
AI
इसी स्थान पर भगवान शिव ने चंचल नेत्रों वाली पार्वती का हाथ लीलापूर्वक पकड़ा था, जहाँ विवाह के मांगलिक कंगन के रूप में लिपटे हुए सर्प पार्वती के हाथ की औषधियों के प्रभाव से खिसक गए थे।
५.३४
क्रामद्भिर्घनपदवीमनेकसंख्यै-
स्तेजोभिः शुचिमणिजन्मभिर्विभिन्नः ।
उस्राणां व्यभिचरतीव सप्तसप्तेः
पर्यस्यन्निह निचयः सहस्रसंख्याम् ॥
स्तेजोभिः शुचिमणिजन्मभिर्विभिन्नः ।
उस्राणां व्यभिचरतीव सप्तसप्तेः
पर्यस्यन्निह निचयः सहस्रसंख्याम् ॥
सारांश
AI
यहाँ की श्रेष्ठ मणियों से निकलने वाली अनगिनत किरणें जब आकाश की ओर बढ़ती हैं, तो ऐसा लगता है मानो वे सूर्य की हजार किरणों की संख्या को भी पीछे छोड़ रही हों।
५.३५
व्यधत्त यस्मिन्पुरमुच्चगोपुरं
पुरां विजेतुर्धृतये धनाधिपः ।
स एष कैलास उपान्तसर्पिणः
करोत्यकालास्तमयं विवस्वतः ॥
पुरां विजेतुर्धृतये धनाधिपः ।
स एष कैलास उपान्तसर्पिणः
करोत्यकालास्तमयं विवस्वतः ॥
सारांश
AI
कुबेर ने शिव की प्रसन्नता के लिए यहाँ ऊंचे गोपुरों वाला नगर बसाया था; यह कैलाश पर्वत अपनी ऊँचाई के कारण यहाँ विचरण करने वालों के लिए असमय ही सूर्यास्त का आभास करा देता है।
५.३६
नानारत्नज्योतिषां संनिपातै-
श्छन्नेष्वन्तःसानु वप्रान्तरेषु ।
बद्धां बद्धां भित्तिशङ्काममुष्मि-
न्नावानावान्मातरिश्वा निहन्ति ॥
श्छन्नेष्वन्तःसानु वप्रान्तरेषु ।
बद्धां बद्धां भित्तिशङ्काममुष्मि-
न्नावानावान्मातरिश्वा निहन्ति ॥
सारांश
AI
विभिन्न मणियों की कांति से ढकी हुई पर्वत की गुफाओं में जब बादल दीवार जैसा भ्रम पैदा करते हैं, तो बहती हुई वायु उन्हें बार-बार छिन्न-भिन्न कर देती है।
५.३७
रम्या नवद्युतिरपैति न शाद्वलेभ्यः
श्यामीभवन्त्यनुदिनं नलिनीवनानि ।
अस्मिन्विचित्रकुसुमस्तबकाचितानां
शाखाभृतां परिणमन्ति न पल्लवानि ॥
श्यामीभवन्त्यनुदिनं नलिनीवनानि ।
अस्मिन्विचित्रकुसुमस्तबकाचितानां
शाखाभृतां परिणमन्ति न पल्लवानि ॥
सारांश
AI
यहाँ घास के मैदानों की नवीन आभा कभी नष्ट नहीं होती, कमलिनी के वन काले नहीं पड़ते और फूलों के गुच्छों से लदी वृक्षों की शाखाओं के पत्ते कभी पुराने होकर नहीं गिरते।
५.३८
परिसरविषयेषु लीढमुक्ता
हरिततृणोद्गमशङ्कया मृगीभिः ।
इह नवशुककोमला मणीनां
रविकरसंवलिताः फलन्ति भासः ॥
हरिततृणोद्गमशङ्कया मृगीभिः ।
इह नवशुककोमला मणीनां
रविकरसंवलिताः फलन्ति भासः ॥
सारांश
AI
कोमल घास की शंका में मृगियाँ यहाँ की हरी मणियों को चाटती हैं; सूर्य की किरणों के संपर्क से मणियों की जो कांति फैलती है, वह अत्यंत मनमोहक आभा बिखेरती है।
५.३९
उत्फुल्लस्थलनलिनीवनादमुष्मा-
दुद्धूतः सरसिजसम्भवः परागः ।
वात्याभिर्वियति विवर्तितः समन्ता-
दाधत्ते कनकमयातपत्रलक्ष्मीम् ॥
दुद्धूतः सरसिजसम्भवः परागः ।
वात्याभिर्वियति विवर्तितः समन्ता-
दाधत्ते कनकमयातपत्रलक्ष्मीम् ॥
सारांश
AI
स्थल-कमलों के वनों से उठी हुई पराग जब वायु के बवंडर के साथ आकाश में चारों ओर घूमती है, तो वह एक स्वर्णमयी छत्र की शोभा धारण कर लेती है।
५.४०
इह सनियमयोः सुरापगाया-
मुषसि सयावकसव्यपादरेखा ।
कथयति शिवयोः शरीरयोगं
विषमपदा पदवी विवर्तनेषु ॥
मुषसि सयावकसव्यपादरेखा ।
कथयति शिवयोः शरीरयोगं
विषमपदा पदवी विवर्तनेषु ॥
सारांश
AI
प्रात:काल गंगा तट पर एक ओर महावर के निशान वाली पदचाप भगवान शिव और पार्वती के एकाकार शरीर की पुष्टि करती है, जो उनके चलने के असमान ढंग से प्रकट होती है।
५.४१
संमूर्छतां रजतभित्तिमयूखजालै-
रालोकपादपलतान्तरनिर्गतानाम् ।
घर्मद्युतेरिह मुहुः पटलानि धाम्ना-
मादर्शमण्डलनिभानि समुल्लसन्ति ॥
रालोकपादपलतान्तरनिर्गतानाम् ।
घर्मद्युतेरिह मुहुः पटलानि धाम्ना-
मादर्शमण्डलनिभानि समुल्लसन्ति ॥
सारांश
AI
यहाँ वृक्षों और लताओं के बीच से निकली हुई सूर्य की किरणों के समूह, पर्वत की चाँदी जैसी शिलाओं की चमक से मिलकर दर्पण के मंडलों के समान बार-बार चमक रहे हैं।
५.४२
शुक्लैर्मयूखनिचयैः परिवीतमूर्ति-
र्वप्राभिघातपरिमण्डलितोरुदेहः ।
शृङ्गाण्यमुष्य भजते गणभर्तुरुक्षा
कुर्वन्वधूजनमनःसु शशाङ्कशङ्काम् ॥
र्वप्राभिघातपरिमण्डलितोरुदेहः ।
शृङ्गाण्यमुष्य भजते गणभर्तुरुक्षा
कुर्वन्वधूजनमनःसु शशाङ्कशङ्काम् ॥
सारांश
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सफेद किरणों से घिरे हुए और तटों पर प्रहार करने से गोल पुष्ट शरीर वाले शिव के नन्दी बैल इस पर्वत के शिखरों पर सुशोभित हैं, जिन्हें देखकर देवांगनाओं के मन में चन्द्रमा का भ्रम उत्पन्न हो रहा है।
५.४३
सम्प्रति लब्धजन्म शनकैः कथमपि लघुनि
क्षीणपयस्युपेयुषि भिदां जलधरपटले ।
खण्डितविग्रहं बलभिदो धनुरिह विविधाः
पूरयितुं भवन्ति विभवः शिखरमणिरुचः ॥
क्षीणपयस्युपेयुषि भिदां जलधरपटले ।
खण्डितविग्रहं बलभिदो धनुरिह विविधाः
पूरयितुं भवन्ति विभवः शिखरमणिरुचः ॥
सारांश
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जलरहित बादलों के फटने पर, इस पर्वत के शिखरों पर जड़े रत्नों की विविध कान्तियाँ इन्द्रधनुष के टूटे हुए अंगों को पूर्ण करने में समर्थ हो रही हैं।
५.४४
स्नपितनवलतातरुप्रवालै-
रमृतलवस्रुतिशालिभिर्मयूखैः ।
सततमसितयामिनीषु शम्भो
अमलयतीह वनान्तमिन्दुलेखा ॥
रमृतलवस्रुतिशालिभिर्मयूखैः ।
सततमसितयामिनीषु शम्भो
अमलयतीह वनान्तमिन्दुलेखा ॥
सारांश
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भगवान शिव के मस्तक पर सुशोभित चन्द्रलेखा अपनी अमृतमयी किरणों से नवीन लताओं और कोपलों को सींचती हुई अंधेरी रातों में भी यहाँ के वन प्रदेश को प्रकाशित करती रहती है।
५.४५
क्षिपति योऽनुवनं विततां बृह-
द्बृहतिकामिव रौचनिकीं रुचम् ।
अयमनेकहिरण्मयकंदर-
स्तव पितुर्दयितो जगतीधरः ॥
द्बृहतिकामिव रौचनिकीं रुचम् ।
अयमनेकहिरण्मयकंदर-
स्तव पितुर्दयितो जगतीधरः ॥
सारांश
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यह अनेक स्वर्णमयी गुफाओं वाला पर्वत, जो पूरे वन में गोरोचन के समान पीली आभा को एक विशाल चादर की तरह फैला रहा है, तुम्हारे पिता इन्द्र का प्रिय पर्वत है।
५.४६
सक्तिं लवादपनयत्यनिले लतानां
वैरोचनैर्द्विगुणिताः सहसा मयूखैः ।
रोधोभुवां मुहुरमुत्र हिरण्मयीनां
भासस्तडिद्विलसितानि विडम्बयन्ति ॥
वैरोचनैर्द्विगुणिताः सहसा मयूखैः ।
रोधोभुवां मुहुरमुत्र हिरण्मयीनां
भासस्तडिद्विलसितानि विडम्बयन्ति ॥
सारांश
AI
हवा द्वारा लताओं के हिलने पर, सूर्य की किरणों से दोगुनी हुई इन स्वर्णमयी तटों की चमक बार-बार बिजली के चमकने का आभास कराती है।
५.४७
कषणकम्पनिरस्तमहाहिभिः
क्षणविमत्तमतङ्गजवर्जितैः ।
इह मदस्नपितैरनुमीयते
सुरगजस्य गतं हरिचन्दनैः ॥
क्षणविमत्तमतङ्गजवर्जितैः ।
इह मदस्नपितैरनुमीयते
सुरगजस्य गतं हरिचन्दनैः ॥
सारांश
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रगड़ने से हिलते हुए और साँपों को दूर भगाने वाले, तथा ऐरावत के मद से भीगे हुए इन हरिचन्दन के वृक्षों से इन्द्र के हाथी के यहाँ से गुजरने का अनुमान लगाया जाता है।
५.४८
जलदजालघनैरसिताश्मना-
मुपहतप्रचयेह मरीचिभिः ।
भवति दीप्तिरदीपितकंदरा
तिमिरसंवलितेव विवस्वतः ॥
मुपहतप्रचयेह मरीचिभिः ।
भवति दीप्तिरदीपितकंदरा
तिमिरसंवलितेव विवस्वतः ॥
सारांश
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यहाँ बादलों के समान काली शिलाओं की किरणों से बाधित होने के कारण, सूर्य का प्रकाश गुफाओं को प्रकाशित नहीं कर पाता और ऐसा लगता है मानो प्रकाश अंधकार से मिला हुआ हो।
५.४९
भव्यो भवन्नपि मुनेरिह शासनेन
क्षात्रे स्थितः पथि तपस्य हतप्रमादः ।
प्रायेण सत्यपि हितार्थकरे विधौ हि
श्रेयांसि लब्धुमसुखानि विनान्तरायैः ॥
क्षात्रे स्थितः पथि तपस्य हतप्रमादः ।
प्रायेण सत्यपि हितार्थकरे विधौ हि
श्रेयांसि लब्धुमसुखानि विनान्तरायैः ॥
सारांश
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समर्थ होते हुए भी आप मुनि की आज्ञा से क्षत्रिय धर्म पर चलते हुए प्रमाद रहित होकर तपस्या करें, क्योंकि कल्याणकारी साधन होने पर भी बिना विघ्नों के श्रेय की प्राप्ति दुर्लभ होती है।
५.५०
मा भूवन्नपथहृतस्तवेन्द्रियाश्वाः
संतापे दिशतु शिवः शिवां प्रसक्तिम् ।
रक्षन्तस्तपसि बलं च लोकपालाः
कल्याणीमधिकफलां क्रियां क्रियायुः ॥
संतापे दिशतु शिवः शिवां प्रसक्तिम् ।
रक्षन्तस्तपसि बलं च लोकपालाः
कल्याणीमधिकफलां क्रियां क्रियायुः ॥
सारांश
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आपकी इन्द्रिय रूपी घोड़े कुमार्ग पर न जाएँ, शिव आपके कष्टों में शुभ बुद्धि प्रदान करें और लोकपाल आपकी तपस्या एवं बल की रक्षा करते हुए आपके श्रेष्ठ कार्यों को सिद्ध करें।
॥ इति पञ्चमः सर्गः ॥
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