अस्मिन्नगृह्यत पिनाकभृता सलील-
माबद्धवेपथुरधीरविलोचनायाः ।
विन्यस्तमङ्गलमहौषधिरीश्वरायाः
स्रस्तोरगप्रतिसरेण करेण पाणिः ॥
अस्मिन्नगृह्यत पिनाकभृता सलील-
माबद्धवेपथुरधीरविलोचनायाः ।
विन्यस्तमङ्गलमहौषधिरीश्वरायाः
स्रस्तोरगप्रतिसरेण करेण पाणिः ॥
माबद्धवेपथुरधीरविलोचनायाः ।
विन्यस्तमङ्गलमहौषधिरीश्वरायाः
स्रस्तोरगप्रतिसरेण करेण पाणिः ॥
अन्वयः
AI
अस्मिन् पिनाकभृता स्रस्तोरगप्रतिसरेण करेण अधीरविलोचनायाः आबद्धवेपथुः विन्यस्तमङ्गलमहौषधिः ईश्वरायाः पाणिः सलीलम् अगृह्यत।
English Summary
AI
On this mountain, the wielder of the Pinaka bow, Shiva, playfully grasped the hand of the goddess Parvati. Her hand, on which auspicious herbs were placed, was trembling, her eyes were restless, and Shiva's own hand had its serpent-bracelet slipped off.
सारांश
AI
इसी स्थान पर भगवान शिव ने चंचल नेत्रों वाली पार्वती का हाथ लीलापूर्वक पकड़ा था, जहाँ विवाह के मांगलिक कंगन के रूप में लिपटे हुए सर्प पार्वती के हाथ की औषधियों के प्रभाव से खिसक गए थे।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
अस्मिन्निति ॥ अस्मिन्नद्रौ पिनाकभृता शिवेनाधीरविलोचनायाश्चकितदृष्टेः । उरगदर्शनादिति भावः । ईश्वराया गौर्याः।
स्थेशभास— (अष्टाध्यायी ३.२.१७५ ) इत्यादिना वरच् । पुंयोगविवक्षाभावान्न ङीप् । आबद्धवेपथुः प्राप्तकम्प इति सात्त्विकोक्तिः । द्वितोऽथुच् इत्यथुच्प्रत्ययः । विन्यस्ता मङ्गलमहौषधिर्यवाङ्कुरादि यस्मिन्स पाणिः । सस्तो गलित उरग एव प्रतिसरः कौतुकसूत्रं यस्य तेन । आहुः प्रतिसरो हस्तसूत्रे माल्ये च मण्डने इति विश्वः । करेण सलीलमगृह्यतेति देवस्य पार्वतीपरिणयनवर्णनम् । ईशार्थमित्वत्र त्वनुग्रहमात्रोक्तिरित्यपौनरुक्त्त्यम् । भाविकमेवालंकारः ॥ कामद्भिर्घनपदवीमनेकसंख्यैस्तेजोभिः शुचिमणिजन्मभिर्विभिन्नः । उस्त्राणां व्यभिचरतीव सप्तसप्तेः पर्यस्यन्निह निचयः सहस्रसंख्याम्
पदच्छेदः
AI
| अस्मिन् | इदम् (७.१) | on this (mountain) |
| अगृह्यत | अगृह्यत (√ग्रह् भावकर्मणोः लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was grasped |
| पिनाकभृता | पिनाकभृत् (३.१) | by the wielder of the Pinaka bow (Shiva) |
| सलीलम् | सलीलम् | playfully |
| आबद्धवेपथुः | आबद्ध–वेपथु (१.१) | trembling |
| अधीरविलोचनायाः | अधीर–विलोचना (६.१) | of her with restless eyes (Parvati) |
| विन्यस्तमङ्गलमहौषधिः | विन्यस्त (वि√न्यस्+क्त)–मङ्गल–महौषधि (१.१) | on which auspicious great herbs were placed |
| ईश्वरायाः | ईश्वरा (६.१) | of the goddess (Parvati) |
| स्रस्तोरगप्रतिसरेण | स्रस्त (√स्रंस्+क्त)–उरग–प्रतिसर (३.१) | by the hand from which the serpent-bracelet had slipped |
| करेण | कर (३.१) | by the hand |
| पाणिः | पाणि (१.१) | the hand |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | स्मि | न्न | गृ | ह्य | त | पि | ना | क | भृ | ता | स | ली | ल |
| मा | ब | द्ध | वे | प | थु | र | धी | र | वि | लो | च | ना | याः |
| वि | न्य | स्त | म | ङ्ग | ल | म | हौ | ष | धि | री | श्व | रा | याः |
| स्र | स्तो | र | ग | प्र | ति | स | रे | ण | क | रे | ण | पा | णिः |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.