नानारत्नज्योतिषां संनिपातै-
श्छन्नेष्वन्तःसानु वप्रान्तरेषु ।
बद्धां बद्धां भित्तिशङ्काममुष्मि-
न्नावानावान्मातरिश्वा निहन्ति ॥
नानारत्नज्योतिषां संनिपातै-
श्छन्नेष्वन्तःसानु वप्रान्तरेषु ।
बद्धां बद्धां भित्तिशङ्काममुष्मि-
न्नावानावान्मातरिश्वा निहन्ति ॥
श्छन्नेष्वन्तःसानु वप्रान्तरेषु ।
बद्धां बद्धां भित्तिशङ्काममुष्मि-
न्नावानावान्मातरिश्वा निहन्ति ॥
अन्वयः
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अमुष्मिन् अन्तःसानु नानारत्नज्योतिषां संनिपातैः छन्नेषु वप्रान्तरेषु मातरिश्वा आवान् आवान् बद्धां बद्धां भित्तिशङ्कां निहन्ति।
English Summary
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On this mountain, in the caves within its peaks which are obscured by the converging lights of various gems, the wind, by blowing repeatedly, dispels the recurring illusion that there is a solid wall, revealing the open space.
सारांश
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विभिन्न मणियों की कांति से ढकी हुई पर्वत की गुफाओं में जब बादल दीवार जैसा भ्रम पैदा करते हैं, तो बहती हुई वायु उन्हें बार-बार छिन्न-भिन्न कर देती है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
नानेति ॥ अमुष्मिन्कैलासेऽन्तःसानु । सानुष्वित्यर्थः । विभत्त्यर्थेऽव्ययीभावः। नानारत्नज्योतिषां अनेकमणिकान्तीनां संनिपातैर्व्यतिकरैश्छन्नेषु छादितेषु ।
वा दान्तशान्त- (अष्टाध्यायी ७.२.२७ ) इत्यादिना निपातः । वप्रान्तरेषु कटकान्तरेषु बद्धांबद्धामभीक्ष्णबद्धाम् । दृढोत्पादितामित्यर्थः । नित्यवीप्सयोः (अष्टाध्यायी ८.१.४ ) इति नित्यार्थे द्विर्भावः । नित्यमभीक्ष्णम् इति काशिका । एकपदं चैतत् । भित्तिशङ्कां भित्तिरिति संदेहमावानावानभीक्ष्णमापतन् । आङ्पूर्वाद्वाधातोः शतृप्रत्ययः। द्विर्भावादि पूर्ववत् । मातर्यन्तरिक्षे श्वयति गच्छतीति मातरिश्वा वायुः । कनिन्प्रत्ययः । तत्पुरुषे कृति बहुलम् (अष्टाध्यायी ६.३.१४ ) इत्यलुक् । निहन्ति निवर्तयति । वायुसंचाराद्भित्त्यभावोऽवधार्यत इत्यर्थः । अतो निश्चयान्तः संदेहालंकारः । शालिनीवृत्तम् ॥
पदच्छेदः
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| नानारत्नज्योतिषाम् | नाना–रत्न–ज्योतिस् (६.३) | of the lights of various gems |
| संनिपातैः | संनिपात (सम्+नि√पत्, ३.३) | by the convergence |
| छन्नेषु | छन्न (√छद्+क्त, ७.३) | when covered |
| अन्तःसानु | अन्तर्–सानु | within the peaks |
| वप्रान्तरेषु | वप्र–अन्तर (७.३) | in the spaces between the slopes |
| बद्धाम् | बद्ध (√बन्ध्+क्त, २.१) | repeatedly formed |
| बद्धाम् | बद्ध (√बन्ध्+क्त, २.१) | repeatedly formed |
| भित्तिशङ्काम् | भित्ति–शङ्का (२.१) | the doubt of a wall |
| अमुष्मिन् | अदस् (७.१) | on this (mountain) |
| आवान् | आवात् (आ√वा+शतृ, १.१) | blowing again |
| आवान् | आवात् (आ√वा+शतृ, १.१) | and again |
| मातरिश्वा | मातरिश्वन् (१.१) | the wind |
| निहन्ति | निहन्ति (नि√हन् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | dispels |
छन्दः
शालिनी [११: मततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ना | ना | र | त्न | ज्यो | ति | षां | सं | नि | पा | तै |
| श्छ | न्ने | ष्व | न्तः | सा | नु | व | प्रा | न्त | रे | षु |
| ब | द्धां | ब | द्धां | भि | त्ति | श | ङ्का | म | मु | ष्मि |
| न्ना | वा | ना | वा | न्मा | त | रि | श्वा | नि | ह | न्ति |
| म | त | त | ग | ग | ||||||
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