व्यधत्त यस्मिन्पुरमुच्चगोपुरं
पुरां विजेतुर्धृतये धनाधिपः ।
स एष कैलास उपान्तसर्पिणः
करोत्यकालास्तमयं विवस्वतः ॥
व्यधत्त यस्मिन्पुरमुच्चगोपुरं
पुरां विजेतुर्धृतये धनाधिपः ।
स एष कैलास उपान्तसर्पिणः
करोत्यकालास्तमयं विवस्वतः ॥
पुरां विजेतुर्धृतये धनाधिपः ।
स एष कैलास उपान्तसर्पिणः
करोत्यकालास्तमयं विवस्वतः ॥
अन्वयः
AI
धनाधिपः पुरां विजेतुः धृतये यस्मिन् उच्चगोपुरं पुरं व्यधत्त, सः एषः कैलासः उपान्तसर्पिणः विवस्वतः अकालास्तमयं करोति।
English Summary
AI
This is that Kailasa mountain, on which Kubera, the lord of wealth, built a city with high gates for the pleasure of Shiva, the conqueror of cities. Its great height causes an untimely sunset for the sun as it approaches its vicinity.
सारांश
AI
कुबेर ने शिव की प्रसन्नता के लिए यहाँ ऊंचे गोपुरों वाला नगर बसाया था; यह कैलाश पर्वत अपनी ऊँचाई के कारण यहाँ विचरण करने वालों के लिए असमय ही सूर्यास्त का आभास करा देता है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
व्यधत्तेति ॥ यस्मिन्कैलासे धनाधिपः कुबेरः पुरां विजेतुः शिवस्य धृतये संतोषायोच्चगोपुरमुन्नतपुरद्वारम् ।
पुरद्वारं तु गोपुरम् इत्यमरः (अमरकोशः २.२.१७ ) । पुरमलकाख्यां पुरी व्यधत्त निर्मितवान् । तत्सखित्वादिति भावः । स एष कैलास उपान्तसर्पिणः प्रान्तचारिणो विवस्वतः सूर्यस्याकाले प्रसिद्धेतरकालेऽस्तमयं करोतीवेत्युत्प्रेक्षा। वस्तुतस्तु तत्कारणाभावाद्व्यञ्जकाप्रयोगाद्गम्योत्प्रेक्षा । सा चोपान्तवर्तितयासंबन्धे संबन्धलक्षणातिशयोक्त्युत्थापितेति विवेकः । अस्तमिति मकारान्तमव्ययम् । तस्य पचाधजन्तेनायशब्देन षष्ठीसमासः । वृत्तमुक्तम् ॥
पदच्छेदः
AI
| व्यधत्त | व्यधत्त (वि√धा कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | created |
| यस्मिन् | यद् (७.१) | on which |
| पुरम् | पुर (२.१) | a city |
| उच्चगोपुरम् | उच्च–गोपुर (२.१) | with high gates |
| पुराम् | पुर (६.३) | of cities |
| विजेतुः | विजेतृ (वि√जि, ६.१) | of the conqueror (Shiva) |
| धृतये | धृति (४.१) | for the pleasure |
| धनाधिपः | धनाधिप (१.१) | the lord of wealth (Kubera) |
| सः | तद् (१.१) | that |
| एषः | एतद् (१.१) | this |
| कैलासः | कैलास (१.१) | Kailasa |
| उपान्तसर्पिणः | उपान्तसर्पिन् (६.१) | of the one approaching its vicinity |
| करोति | करोति (√कृ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | causes |
| अकालास्तमयम् | अकाल–अस्तमय (२.१) | an untimely setting |
| विवस्वतः | विवस्वत् (६.१) | of the sun |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| व्य | ध | त्त | य | स्मि | न्पु | र | मु | च्च | गो | पु | रं |
| पु | रां | वि | जे | तु | र्धृ | त | ये | ध | ना | धि | पः |
| स | ए | ष | कै | ला | स | उ | पा | न्त | स | र्पि | णः |
| क | रो | त्य | का | ला | स्त | म | यं | वि | व | स्व | तः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.