अन्वयः
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(हिमालयं) घनैः अनीरशनैः अमरलोकवधूजघनैः (इव स्थितैः), शनैः व्यथितसिन्धुम्, अभितः दयितरम्यलताबकुलैः कुलैः विततम्, फणभृताम् ततम् (अभिययौ)।
English Summary
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(He approached the Himalaya) which was an abode for serpents, and whose slopes, spread out on all sides with lovely creepers and Bakula trees, resembled the dense, girdle-less hips of celestial nymphs, slowly agitating the rivers.
सारांश
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देववधुओं के विलास से क्षुब्ध जल वाली तथा सर्पों और सुंदर बकुल लताओं से व्याप्त वह पर्वत भूमि अत्यंत रमणीय प्रतीत हो रही थी।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
व्यथितेति ॥ पुनश्च । अनीरशनैरनिर्मेखलैः।सरशनैरित्यर्थः। घनैर्निबिडैरमरलोकवधूजघनैः शनैर्मन्दंमन्दं व्यथितसिन्धुं क्षोभितनदीकम् । अयमपरः स्वर्ग इति भावः। ये रम्या लताश्च बकुलाः केसराश्च ते दयिताः प्रिया येषां तैस्तथोक्तैः ।
विशारदो मद्यगन्धो बकुलः स च केसरः इति वैद्यके । फणभृतां सर्पाणां कुलैरभितस्ततं व्याप्तं तथा विततं विस्तृतम् ॥
पदच्छेदः
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| व्यथितसिन्धुम् | व्यथित–सिन्धु (२.१) | which agitates the rivers |
| अनीरशनैः | अ–नीरशन (३.३) | by the girdle-less |
| शनैः | शनैः | slowly |
| अमरलोकवधूजघनैः | अमर–लोक–वधू–जघन (३.३) | by the hips of celestial nymphs |
| घनैः | घन (३.३) | by the dense |
| फणभृताम् | फणभृत् (६.३) | of the serpents |
| अभितः | अभितः | on all sides |
| विततं | वितत (वि√तन्+क्त, २.१) | spread out |
| ततं | तत (२.१) | an expanse |
| दयितरम्यलताबकुलैः | दयित–रम्य–लता–बकुल (३.३) | with lovely creepers and Bakula trees dear (to them) |
| कुलैः | कुल (३.३) | with slopes |
छन्दः
द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| व्य | थि | त | सि | न्धु | म | नी | र | श | नैः | श | नै |
| र | म | र | लो | क | व | धू | ज | घ | नै | र्घ | नैः |
| फ | ण | भृ | ता | म | भि | तो | वि | त | तं | त | तं |
| द | यि | त | र | म्य | ल | ता | ब | कु | लैः | कु | लैः |
| न | भ | भ | र | ||||||||
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