अन्वयः
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वीतजन्मजरसं परं शुचि ब्रह्मणः पदम् उपैतुम् इच्छताम्, तमोपहात् आगमात् इव, इतः भवच्छिदः मतयः सम्भवन्ति।
English Summary
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For those who wish to attain the supreme, pure state of Brahman, which is free from birth and old age, thoughts that sever the cycle of existence arise from this mountain, just as they do from the sacred scriptures that dispel darkness (ignorance).
सारांश
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जन्म और मृत्यु से रहित ब्रह्म के परम पद को प्राप्त करने के इच्छुक मुनियों को इस पर्वत से वैसे ही संसार-बंधन काटने वाली बुद्धि प्राप्त होती है, जैसे अज्ञान को मिटाने वाले वेदों से प्राप्त होती है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
वीतेति ॥ वीते निवृत्ते जन्मजरसौ यस्य तद्वीतजन्मजरसम् ।
जराया जरसन्यतरस्याम् (अष्टाध्यायी ७.२.१०१ ) इति जरसादेशः । अत्र तदन्तविधेरिष्टत्वात्परत्वेन स्यादेशबाधकत्वाच्च। तथाहिटाङसिङसामिनात्स्या इति स्यादेशबाधनात्। परत्वाज्जरसादेशं बभाषे भाष्यकृत्स्वयम्॥ सूत्रकारमते यत्तु ज्ञापकात्परबाधनम् । भवेत्तदपिटाङस्योर्न पुनर्ङसि संभवि॥ मतद्वयेऽपि तत्तुल्यं ङसि यत्पूर्वबाधनम्।परत्वाज्जरसादेशस्तत्स्यात्स्यादेशबाधनात् ॥ ज्ञापकं यच्च टाङस्योर्यावादेशाविनादिति । ईकारदीर्घयोस्तत्र वैयर्थ्यं तत्तु तौ विना ॥ एत्वे सवर्णे दीर्धे च रूपसिद्धिर्भवेद्यतः । व्यर्थसूत्राक्षरत्यागाद्भङ्क्त्वैतज्ज्ञापकं फणी ॥ स्वातत्र्याज्जरसादेशं जगौ पूर्वस्य बाधनात् । समर्थनप्रपञ्चस्तु भाष्यकैयटयोः स्फुटः ॥ एवं च यदत्र जरस इति केषांचित्पाठान्तरकल्पनं तदज्ञानविजृम्भितमेव । ब्रह्मणः परमात्मनः संबन्धि परमुत्कृष्टं शुचि निष्कलङ्कम् । पद्यत इति पदं स्थानं तादात्म्यलक्षणम्। मुक्तिमित्यर्थः। उपैतुं प्राप्तुमिच्छतां मुमुक्षूणामागमाच्छास्त्रादिव । तमोऽपहन्तीति तमोपहादविद्यानिवर्तकात् । अपे क्लेशतमसोः (अष्टाध्यायी ३.२.५० ) इति डप्रत्ययः। इतोऽस्माद्गिरेः । भवं छिन्दन्तीति भवच्छिदः संसारनिवर्तकाः। सत्सूद्विष- (अष्टाध्यायी ३.२.६१ ) इत्यादिना क्विप् । मतयस्तत्त्वज्ञानानि संभवन्त्युत्पद्यन्ते । क्षेत्रविशेषस्यापि ज्ञानोपायत्वादित्याशयः । न केवलमियं भोगभूमिः किंतु मुक्तिक्षेत्रमपीति तात्पर्यार्थः । रथोद्धतावृत्तम् । तल्लक्षणम्रान्नराविह रथोद्धता लगौ इति ॥
पदच्छेदः
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| वीतजन्मजरसं | वीत–जन्म–जरस् (२.१) | free from birth and old age |
| परं | पर (२.१) | supreme |
| शुचि | शुचि (२.१) | pure |
| ब्रह्मणः | ब्रह्मन् (६.१) | of Brahman |
| पदम् | पद (२.१) | the state |
| उपैतुम् | उपैतुम् (उप√इ+तुमुन्) | to attain |
| इच्छताम् | इच्छत् (√इष्+शतृ, ६.३) | of those who wish |
| आगमात् | आगम (५.१) | from the sacred scriptures |
| इव | इव | like |
| तमोपहात् | तमस्–अपह (५.१) | from that which dispels darkness |
| इतः | इतः | from this (mountain) |
| सम्भवन्ति | सम्भवन्ति (सम्√भू कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | arise |
| मतयः | मति (१.३) | thoughts |
| भवच्छिदः | भव–छिद् (१.३) | that sever the cycle of existence |
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वी | त | ज | न्म | ज | र | सं | प | रं | शु | चि |
| ब्र | ह्म | णः | प | द | मु | पै | तु | मि | च्छ | ताम् |
| आ | ग | मा | दि | व | त | मो | प | हा | दि | तः |
| स | म्भ | व | न्ति | म | त | यो | भ | व | च्छि | दः |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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