क्षितिनभःसुरलोकनिवासिभिः
कृतनिकेतमदृष्टपरस्परैः ।
प्रथयितुं विभुतामभिनिर्मितं
प्रतिनिधिं जगतामिव शम्भुना ॥
क्षितिनभःसुरलोकनिवासिभिः
कृतनिकेतमदृष्टपरस्परैः ।
प्रथयितुं विभुतामभिनिर्मितं
प्रतिनिधिं जगतामिव शम्भुना ॥
कृतनिकेतमदृष्टपरस्परैः ।
प्रथयितुं विभुतामभिनिर्मितं
प्रतिनिधिं जगतामिव शम्भुना ॥
अन्वयः
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अदृष्टपरस्परैः क्षितिनभःसुरलोकनिवासिभिः कृतनिकेतम्, विभुताम् प्रथयितुम् शम्भुना जगताम् प्रतिनिधिम् इव अभिनिर्मितम् (हिमाचलम् अभिययौ)।
English Summary
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(He approached the Himalaya) where dwellers of the earth, sky, and heaven had made their homes without seeing one another. It seemed as if it were created by Shambhu (Shiva) as a representative of the worlds to display His omnipotence.
सारांश
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तीनों लोकों के निवासियों का आश्रय स्थल यह पर्वत मानो शिव द्वारा अपनी सर्वव्यापकता सिद्ध करने के लिए संपूर्ण जगत के एक प्रतिनिधि के रूप में रचा गया है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
क्षितीति ॥ परस्परेऽन्योन्ये ।
कर्मव्यतिहारे सर्वनाम्नो द्वे भवतः इति वक्तव्यात्परशब्दस्य द्विर्भावः। समासवच्च बहुलं यदा न समासवत्प्रथमैकवचनं तदा पूर्वपदस्य इति वक्तव्यात्प्रथमैकवचनम् । सुट् । कस्कादित्वाद्विसर्जनीयस्य सत्वं बहुवचनं चान्योन्यशब्दवत् । यथा माघे-अन्योन्येषां पुष्करैरामृशन्तः इति । अदृष्टाः परस्परे यैस्तेऽदृष्टपरस्परास्तैस्तथोक्तैः । क्षितौ नभसि सुरलोके च निवसन्तीति तैस्तथोक्तैः । भूर्भुवःस्वर्लोकवासिभिरित्यर्थः । कृतनिकेतं कृतास्पदम् । अतएव शंभुना विभुतां स्वसामर्थ्यं प्रथयितुमभिनिर्मितं जगतां प्रतिनिधिं प्रतिकृतिमिव स्थितमित्युत्प्रेक्षा। प्रतिकृतिचर्या पुंसि प्रतिनिधिरुपमोपमानं स्यात् इत्यमरः (अमरकोशः २.१०.३६ ) । त्रैलोक्यश्लाघ्योपममपरिच्छेद्यं चेति भावः ॥
पदच्छेदः
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| क्षितिनभःसुरलोकनिवासिभिः | क्षिति–नभस्–सुरलोक–निवासिन् (३.३) | by the dwellers of earth, sky, and heaven |
| कृतनिकेतम् | कृत–निकेत (२.१) | made a home |
| अदृष्टपरस्परैः | अदृष्ट–परस्पर (३.३) | by those who have not seen each other |
| प्रथयितुं | प्रथयितुम् (√प्रथ्+णिच्+तुमुन्) | to display |
| विभुताम् | विभुता (२.१) | omnipotence |
| अभिनिर्मितम् | अभिनिर्मित (अभि+निर्√मा+क्त, २.१) | created |
| प्रतिनिधिं | प्रतिनिधि (२.१) | a representative |
| जगताम् | जगत् (६.३) | of the worlds |
| इव | इव | as if |
| शम्भुना | शम्भु (३.१) | by Shambhu (Shiva) |
छन्दः
द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क्षि | ति | न | भः | सु | र | लो | क | नि | वा | सि | भिः |
| कृ | त | नि | के | त | म | दृ | ष्ट | प | र | स्प | रैः |
| प्र | थ | यि | तुं | वि | भु | ता | म | भि | नि | र्मि | तं |
| प्र | ति | नि | धिं | ज | ग | ता | मि | व | श | म्भु | ना |
| न | भ | भ | र | ||||||||
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