रम्या नवद्युतिरपैति न शाद्वलेभ्यः
श्यामीभवन्त्यनुदिनं नलिनीवनानि ।
अस्मिन्विचित्रकुसुमस्तबकाचितानां
शाखाभृतां परिणमन्ति न पल्लवानि ॥
रम्या नवद्युतिरपैति न शाद्वलेभ्यः
श्यामीभवन्त्यनुदिनं नलिनीवनानि ।
अस्मिन्विचित्रकुसुमस्तबकाचितानां
शाखाभृतां परिणमन्ति न पल्लवानि ॥
श्यामीभवन्त्यनुदिनं नलिनीवनानि ।
अस्मिन्विचित्रकुसुमस्तबकाचितानां
शाखाभृतां परिणमन्ति न पल्लवानि ॥
अन्वयः
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अस्मिन् शाद्वलेभ्यः रम्या नवद्युतिः न अपैति, नलिनीवनानि अनुदिनं न श्यामीभवन्ति, विचित्रकुसुमस्तबकाचितानां शाखाभृतां पल्लवानि न परिणमन्ति।
English Summary
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On this mountain, the charming fresh lustre never departs from the green meadows, the lotus groves do not wither day by day, and the leaves of the trees, which are laden with clusters of colorful flowers, do not change their color.
सारांश
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यहाँ घास के मैदानों की नवीन आभा कभी नष्ट नहीं होती, कमलिनी के वन काले नहीं पड़ते और फूलों के गुच्छों से लदी वृक्षों की शाखाओं के पत्ते कभी पुराने होकर नहीं गिरते।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
रम्येति ॥ अस्सिन्नद्रौ । शादाः शष्पाणि सन्त्येष्विति शाद्वलास्तेभ्यः । 'शाद्वलःशादहरिते' इत्यमरः । 'नडशादाद्वलच् । रम्या नवा द्युतिर्नापैति । किंतु नित्येत्यर्थः । नलिनीवनान्यनुदिनं सर्वदा श्यामीभवन्ति । न कदाचित्पाण्डुरीभवन्तीत्यर्थः । विचित्रकुसुमस्तबकैराचितानां व्याप्तानां शाखाभृतां तरूणां पल्लवानि न परिणमन्ति । न जीर्णानि भवन्तीत्यर्थः । सर्वदा नूतनमेव सर्वं वर्तत इत्यर्थः । अत्र प्रस्तुतस्यैव तत्तद्वस्तुगतकान्तिस्थैर्यरूपकार्यस्य वर्णनात्प्रस्तुतमिव कारणं कश्चिदसाधारणः कैलासस्य महिमावगम्यत इति पर्यायोक्तिरलंकारः । तदुक्तम् —'कारणं गम्यते यत्र प्रस्तुतं कार्यवर्णनात् । प्रस्तुतत्वेन संबन्धस्तत्पर्यायोक्तमुच्यते ॥' इति ॥
पदच्छेदः
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| रम्या | रम्य (१.१) | charming |
| नवद्युतिः | नव–द्युति (१.१) | fresh lustre |
| अपैति | अपैति (अप√इ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | departs |
| न | न | not |
| शाद्वलेभ्यः | शाद्वल (५.३) | from the green meadows |
| श्यामीभवन्ति | श्यामीभवन्ति (√श्यामीभू कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | become withered |
| अनुदिनम् | अनुदिनम् | day by day |
| नलिनीवनानि | नलिनी–वन (१.३) | the lotus groves |
| अस्मिन् | इदम् (७.१) | on this (mountain) |
| विचित्रकुसुमस्तबकाचितानाम् | विचित्र–कुसुम–स्तबक–आचित (आ√चि+क्त, ६.३) | of those covered with clusters of variegated flowers |
| शाखाभृताम् | शाखाभृत् (६.३) | of the trees |
| परिणमन्ति | परिणमन्ति (परि√नम् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | change color |
| न | न | not |
| पल्लवानि | पल्लव (१.३) | the leaves |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| र | म्या | न | व | द्यु | ति | र | पै | ति | न | शा | द्व | ले | भ्यः |
| श्या | मी | भ | व | न्त्य | नु | दि | नं | न | लि | नी | व | ना | नि |
| अ | स्मि | न्वि | चि | त्र | कु | सु | म | स्त | ब | का | चि | ता | नां |
| शा | खा | भृ | तां | प | रि | ण | म | न्ति | न | प | ल्ल | वा | नि |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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