येनापविद्धसलिलः स्फुटनागसद्मा
देवासुरैरमृतमम्बुनिधिर्ममन्थे ।
व्यावर्तनैरहिपतेरयमाहिताङ्कः
खं व्यालिखन्निव विभाति स मन्दराद्रिः ॥
येनापविद्धसलिलः स्फुटनागसद्मा
देवासुरैरमृतमम्बुनिधिर्ममन्थे ।
व्यावर्तनैरहिपतेरयमाहिताङ्कः
खं व्यालिखन्निव विभाति स मन्दराद्रिः ॥
देवासुरैरमृतमम्बुनिधिर्ममन्थे ।
व्यावर्तनैरहिपतेरयमाहिताङ्कः
खं व्यालिखन्निव विभाति स मन्दराद्रिः ॥
अन्वयः
AI
येन (मन्दराद्रिणा) देवासुरैः अपविद्धसलिलः स्फुटनागसद्मा अम्बुनिधिः अमृतं (प्राप्तुं) ममन्थे, सः अयं मन्दराद्रिः अहिपतेः व्यावर्तनैः आहिताङ्कः (सन्) खं व्यालिखन् इव विभाति।
English Summary
AI
This is that Mount Mandara, by which the gods and demons churned the ocean for nectar, throwing out its water and exposing the serpents' abode. Marked by the windings of Vasuki, the serpent king, it shines as if scratching the sky.
सारांश
AI
यह वही मन्दराचल पर्वत है जिससे देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन किया था; वासुकी नाग के रगड़ के निशानों से युक्त यह पर्वत ऐसा प्रतीत होता है मानो आकाश को खुरच रहा हो।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
येनेति ॥ देवाश्चासुराश्च तैर्देवासुरैः।
येषां च विरोधः शाश्चतिकः इति नैकवद्भावः। एषां यतः कार्यत एव विरोधो न गोव्याघ्रादिवच्छाश्वतिक इत्याहुः।येन मन्दराद्रिणा। मन्थदण्डीकृतेनेति भावः । अपविद्धसलिलः क्षिप्तजलोऽतएव स्फुटं नागसद्म पातालं यस्मिन्सोऽम्बुनिधिरमृतं ममन्थे मथितः । मथ्नातेर्द्विकर्मकत्वाद्दुहादित्वादप्रधाने कर्मणि लिट् । अहिपतेः । मन्थगुणीकृतस्य वासुकेरित्यर्थः । मन्थानं मन्दरं कृत्वा नेत्रं कृत्वा तु वासुकिम् इति भारतवचनात् । व्यावर्तनैर्वेष्टनैराहिताङ्कः कृतचिह्न: सोऽयं मन्दराद्रिः खमाकाशं व्यालिखन्व्यापाटयन्निव विभाति । अत्रौन्नत्यानुपादानेनैव खलेखनोत्प्रेक्षणादनुपात्तगुणनिमित्ता क्रियास्वरूपोत्प्रेक्षा ।
पदच्छेदः
AI
| येन | यद् (३.१) | by which |
| अपविद्धसलिलः | अपविद्ध (अप√व्यध्+क्त)–सलिल (१.१) | from which water was thrown out |
| स्फुटनागसद्मा | स्फुट–नाग–सद्मन् (१.१) | in which the abode of serpents was exposed |
| देवासुरैः | देव–असुर (३.३) | by gods and demons |
| अमृतम् | अमृत (२.१) | for nectar |
| अम्बुनिधिः | अम्बुनिधि (१.१) | the ocean |
| ममन्थे | ममन्थे (√मन्थ् भावकर्मणोः लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was churned |
| व्यावर्तनैः | व्यावर्तन (वि+आ√वृत्, ३.३) | by the windings |
| अहिपतेः | अहिपति (६.१) | of the lord of serpents (Vasuki) |
| अयम् | इदम् (१.१) | this |
| आहिताङ्कः | आहित (आ√धा+क्त)–अङ्क (१.१) | marked |
| खम् | ख (२.१) | the sky |
| व्यालिखन्निव | व्यालिखत् (वि+आ√लिख्+शतृ, १.१)–इव | as if scratching |
| विभाति | विभाति (वि√भा कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | shines |
| सः | तद् (१.१) | that |
| मन्दराद्रिः | मन्दर–अद्रि (१.१) | Mount Mandara |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ये | ना | प | वि | द्ध | स | लि | लः | स्फु | ट | ना | ग | स | द्मा |
| दे | वा | सु | रै | र | मृ | त | म | म्बु | नि | धि | र्म | म | न्थे |
| व्या | व | र्त | नै | र | हि | प | ते | र | य | मा | हि | ता | ङ्कः |
| खं | व्या | लि | ख | न्नि | व | वि | भा | ति | स | म | न्द | रा | द्रिः |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.