उत्फुल्लस्थलनलिनीवनादमुष्मा-
दुद्धूतः सरसिजसम्भवः परागः ।
वात्याभिर्वियति विवर्तितः समन्ता-
दाधत्ते कनकमयातपत्रलक्ष्मीम् ॥
उत्फुल्लस्थलनलिनीवनादमुष्मा-
दुद्धूतः सरसिजसम्भवः परागः ।
वात्याभिर्वियति विवर्तितः समन्ता-
दाधत्ते कनकमयातपत्रलक्ष्मीम् ॥
दुद्धूतः सरसिजसम्भवः परागः ।
वात्याभिर्वियति विवर्तितः समन्ता-
दाधत्ते कनकमयातपत्रलक्ष्मीम् ॥
अन्वयः
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अमुष्मात् उत्फुल्लस्थलनलिनीवनात् उद्धूतः सरसिजसम्भवः परागः वात्याभिः वियति समन्तात् विवर्तितः (सन्) कनकमयातपत्रलक्ष्मीम् आधत्ते।
English Summary
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From this mountain's grove of blooming land-lotuses, the lotus pollen is raised up and whirled around in the sky by the winds, assuming the splendid appearance of a golden royal parasol.
सारांश
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स्थल-कमलों के वनों से उठी हुई पराग जब वायु के बवंडर के साथ आकाश में चारों ओर घूमती है, तो वह एक स्वर्णमयी छत्र की शोभा धारण कर लेती है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
उत्फुल्लेति ॥ अस्मिन्नद्रौ वात्याभिर्वातसमूहैः ।
वातादिभ्यो यत् इति थप्रत्ययः । अमुष्माद्दृश्यमाणादुत्फुल्लस्थलनलिनीवनात् । जलपतितस्य परागस्योत्थानासंभवात्स्थलग्रहणम् । उत्फुल्लसंफुल्लयोरुपसंख्यानान्निष्ठालत्वम् । उद्धूत उत्थापितो वियति समन्ताद्विवर्तितः परिमण्डलितः । अन्तराले तु दण्डायमान एवेति भावः । सरसिजसंभवः पद्मोद्भवः परागः । रूढ्यभिप्रायेणात्र सरसिजशब्दप्रयोगो द्रष्टव्यः । कनकमयातपत्रलक्ष्मीमाधत्तेऽनुकरोति । अत्र परागस्यातपत्रलक्ष्मीसंबन्धासंभवात्तत्सदृशीं लक्ष्मीमिति प्रतिबिम्बेनाक्षेपादसंभविधर्मसंबन्धेयं निदर्शना। तदुक्तम्—असंभवद्धर्मयोगादुपमानोपमेययोः । प्रतिविम्बक्रियागम्या यत्र सा स्यान्निदर्शना ॥ इति ॥
पदच्छेदः
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| उत्फुल्लस्थलनलिनीवनात् | उत्फुल्ल–स्थलनलिनी–वन (५.१) | from the grove of blooming land-lotuses |
| अमुष्मात् | अदस् (५.१) | from this |
| उद्धूतः | उद्धूत (उद्√धू+क्त, १.१) | raised up |
| सरसिजसम्भवः | सरसिज–सम्भव (१.१) | born from lotuses |
| परागः | पराग (१.१) | the pollen |
| वात्याभिः | वात्या (३.३) | by the whirlwinds |
| वियति | वियत् (७.१) | in the sky |
| विवर्तितः | विवर्तित (वि√वृत्+णिच्+क्त, १.१) | whirled around |
| समन्तात् | समन्तात् | all around |
| आधत्ते | आधत्ते (आ√धा कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | assumes |
| कनकमयातपत्रलक्ष्मीम् | कनकमय–आतपत्र–लक्ष्मी (२.१) | the beauty of a golden parasol |
छन्दः
प्रहर्षिणी [१३: मनजरग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उ | त्फु | ल्ल | स्थ | ल | न | लि | नी | व | ना | द | मु | ष्मा |
| दु | द्धू | तः | स | र | सि | ज | स | म्भ | वः | प | रा | गः |
| वा | त्या | भि | र्वि | य | ति | वि | व | र्ति | तः | स | म | न्ता |
| दा | ध | त्ते | क | न | क | म | या | त | प | त्र | ल | क्ष्मीम् |
| म | न | ज | र | ग | ||||||||
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