क्रामद्भिर्घनपदवीमनेकसंख्यै-
स्तेजोभिः शुचिमणिजन्मभिर्विभिन्नः ।
उस्राणां व्यभिचरतीव सप्तसप्तेः
पर्यस्यन्निह निचयः सहस्रसंख्याम् ॥
क्रामद्भिर्घनपदवीमनेकसंख्यै-
स्तेजोभिः शुचिमणिजन्मभिर्विभिन्नः ।
उस्राणां व्यभिचरतीव सप्तसप्तेः
पर्यस्यन्निह निचयः सहस्रसंख्याम् ॥
स्तेजोभिः शुचिमणिजन्मभिर्विभिन्नः ।
उस्राणां व्यभिचरतीव सप्तसप्तेः
पर्यस्यन्निह निचयः सहस्रसंख्याम् ॥
अन्वयः
AI
इह अनेकसंख्यैः घनपदवीं क्रामद्भिः शुचिमणिजन्मभिः तेजोभिः विभिन्नः उस्राणां निचयः पर्यस्यन् सप्तसप्तेः सहस्रसंख्यां व्यभिचरति इव।
English Summary
AI
Here, the collection of the sun's rays, spreading around and mixed with the countless lustres born from pure gems that traverse the sky, seems to surpass its usual number of a thousand.
सारांश
AI
यहाँ की श्रेष्ठ मणियों से निकलने वाली अनगिनत किरणें जब आकाश की ओर बढ़ती हैं, तो ऐसा लगता है मानो वे सूर्य की हजार किरणों की संख्या को भी पीछे छोड़ रही हों।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
कामद्भिरिति ॥ धनपदवीमाकाशं क्रामद्भिर्व्यश्नुवानैरनेकसंख्यैः । परःसहस्रैरित्यर्थः । क्वचित्
अनेकवर्णैः इति पाठस्तु प्रामादिक एव । वैयर्थ्याद्व्याघाताच्चेति । शुचिमणिभ्यः स्फटिकेभ्यो जन्म येषां तैः । जन्माद्युत्तरपदो बहुव्रीहिर्व्यधिकरणोऽपीष्यते इति वामनः । तेजोभिर्विभिन्नो मिश्रोऽतएव पर्यस्यन्प्रसर्पन्निहाद्रौ सप्तसप्तेः सवितुरुस्राणां किरणानां निचयो निकरः। सहस्रमिति संख्या सहस्रसंख्याताम् । स्वनियतामिति शेषः । व्यभिचरत्यतिक्रामतीवेत्युत्प्रेक्षा ॥
पदच्छेदः
AI
| क्रामद्भिः | क्रामत् (√क्रम्+शतृ, ३.३) | traversing |
| घनपदवीम् | घनपदवी (२.१) | the path of clouds (the sky) |
| अनेकसंख्यैः | अनेकसंख्य (३.३) | by countless |
| तेजोभिः | तेजस् (३.३) | by lustres |
| शुचिमणिजन्मभिः | शुचि–मणि–जन्मन् (३.३) | born from pure gems |
| विभिन्नः | विभिन्न (√भिद्+क्त, १.१) | mixed |
| उस्राणाम् | उस्र (६.३) | of the rays |
| व्यभिचरति | व्यभिचरति (वि+अभि√चर् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | surpasses |
| इव | इव | as if |
| सप्तसप्तेः | सप्तसप्ति (६.१) | of the sun |
| पर्यस्यन् | पर्यस्यत् (परि√अस्+शतृ, १.१) | spreading around |
| इह | इह | here |
| निचयः | निचय (१.१) | the collection |
| सहस्रसंख्याम् | सहस्रसंख्या (२.१) | the number thousand |
छन्दः
प्रहर्षिणी [१३: मनजरग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क्रा | म | द्भि | र्घ | न | प | द | वी | म | ने | क | सं | ख्यै |
| स्ते | जो | भिः | शु | चि | म | णि | ज | न्म | भि | र्वि | भि | न्नः |
| उ | स्रा | णां | व्य | भि | च | र | ती | व | स | प्त | स | प्तेः |
| प | र्य | स्य | न्नि | ह | नि | च | यः | स | ह | स्र | सं | ख्याम् |
| म | न | ज | र | ग | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.