ईशार्थमम्भसि चिराय तपश्चरन्त्या
यादोविलङ्घनविलोलविलोचनायाः ।
आलम्बताग्रकरमत्र भवो भवान्याः
श्च्योतन्निदाघसलिलाङ्गुलिना करेण ॥
ईशार्थमम्भसि चिराय तपश्चरन्त्या
यादोविलङ्घनविलोलविलोचनायाः ।
आलम्बताग्रकरमत्र भवो भवान्याः
श्च्योतन्निदाघसलिलाङ्गुलिना करेण ॥
यादोविलङ्घनविलोलविलोचनायाः ।
आलम्बताग्रकरमत्र भवो भवान्याः
श्च्योतन्निदाघसलिलाङ्गुलिना करेण ॥
अन्वयः
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अत्र ईशार्थम् अम्भसि चिराय तपः चरन्त्याः यादोविलङ्घनविलोलविलोचनायाः भवान्याः अग्रकरम् भवः श्च्योतन्निदाघसलिलाङ्गुलिना करेण आलम्बत।
English Summary
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Here, Shiva (Bhava) took the hand of Parvati (Bhavani) with his own hand, from whose fingers perspiration dripped. She had been practicing severe penance in the water for a long time to win him, her eyes unsteady from the movements of aquatic creatures.
सारांश
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शिव को प्राप्त करने के लिए जल में दीर्घकाल तक तपस्या करती हुई पार्वती का हाथ, पसीने की बूंदों से युक्त उंगलियों वाले भगवान शिव ने सहारा देने के लिए पकड़ा था।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
ईशार्थमिति । ईशायेतीशार्थं यथा तथेति क्रियाविशेषणम् ।
अर्थेन सह नित्यसमासः सर्वलिङ्गता च वक्तव्या । चिराय चिरमम्भसि तपश्चरन्त्या अतएव यादोविलङ्घनविलोलविलोचनाया जलजन्तुविघट्टितचकितेक्षणायाः । तपसोऽप्यधिकं दृष्ट्यैव विलोभयन्त्येति भावः । यादांसि जलजन्तवः इत्यमरः (अमरकोशः १.१०.२० ) । भवान्या भवपत्न्या: । प्रयोगकालापेक्षोऽयं निर्देशः । इन्द्रवरुणभव- (अष्टाध्यायी ४.१.४९ ) इत्यादिना ङीप् । आनुगागमश्च । करैकदेशस्यापि करत्वादग्रश्चासौ करंश्चेति समानाधिकरणे समासः। अतएव वामनः-हस्ताग्राग्रहस्तयोर्गुणगुणिनोर्मेदाभेदौ इति । तमग्रकरं भवः शिवः श्च्योतन्निदाघसलिलाङ्गुलिना स्त्रवत्स्वेदाङ्गुलिनेति सात्त्विकोदयोक्तिः । करेणात्र गिरावालम्बत गृही तवान् । अत्राद्भुतातीतवृत्तान्तस्य प्रत्यक्षवदभिधानाद्भाविकालंकार:—अतीतानागते यत्र प्रत्यक्षवदलक्षिते । अत्यद्भुतार्थकार्यत्वाद्भाविकं तदुदाहृतम् ॥ इति लक्षणात् । वसन्ततिलका वृत्तम्-उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः इति तल्लक्षणात् ॥
पदच्छेदः
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| ईशार्थम् | ईश–अर्थम् | for the sake of the Lord (Shiva) |
| अम्भसि | अम्भस् (७.१) | in the water |
| चिराय | चिराय | for a long time |
| तपश्चरन्त्याः | तपस्–चरन्ती (√चर्+शतृ, ६.१) | of her who was practicing austerity |
| यादोविलङ्घनविलोलविलोचनायाः | यादस्–विलङ्घन–विलोल–विलोचन (६.१) | whose eyes were unsteady due to the movements of aquatic animals |
| आलम्बत | आलम्बत (आ√लम्ब् कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | he took hold of |
| अग्रकरम् | अग्रकर (२.१) | the hand |
| अत्र | अत्र | here |
| भवः | भव (१.१) | Bhava (Shiva) |
| भवान्याः | भवानी (६.१) | of Bhavani (Parvati) |
| श्च्योतन्निदाघसलिलाङ्गुलिना | श्च्योतत् (√श्च्युत्+शतृ)–निदाघ–सलिल–अङ्गुलि (३.१) | with a hand whose fingers were dripping with perspiration |
| करेण | कर (३.१) | with the hand |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ई | शा | र्थ | म | म्भ | सि | चि | रा | य | त | प | श्च | र | न्त्या |
| या | दो | वि | ल | ङ्घ | न | वि | लो | ल | वि | लो | च | ना | याः |
| आ | ल | म्ब | ता | ग्र | क | र | म | त्र | भ | वो | भ | वा | न्याः |
| श्च्यो | त | न्नि | दा | घ | स | लि | ला | ङ्गु | लि | ना | क | रे | ण |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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