सादृश्यं गतमपनिद्रचूतगन्धै-
रामोदं मदजलसेकजं दधानः ।
एतस्मिन्मदयति कोकिलानकाले
लीनालिः सुरकरिणां कपोलकाषः ॥
सादृश्यं गतमपनिद्रचूतगन्धै-
रामोदं मदजलसेकजं दधानः ।
एतस्मिन्मदयति कोकिलानकाले
लीनालिः सुरकरिणां कपोलकाषः ॥
रामोदं मदजलसेकजं दधानः ।
एतस्मिन्मदयति कोकिलानकाले
लीनालिः सुरकरिणां कपोलकाषः ॥
अन्वयः
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एतस्मिन् अपनिद्रचूतगन्धैः सादृश्यं गतं मदजलसेकजम् आमोदं दधानः लीनालिः सुरकरिणां कपोलकाषः अकाले कोकिलान् मदयति।
English Summary
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On this mountain, the scent from the divine elephants rubbing their temples against the trees, which bears a fragrance born from their ichor similar to that of blooming mango blossoms and attracts swarms of bees, intoxicates the cuckoos even out of season.
सारांश
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मदजल की गंध से युक्त और खिलते हुए आम के बौर जैसी सुगंध वाला यह हिमालय, असमय में भी कोयल को मदमस्त कर देता है और दिग्गजों के कपोलों के रगड़ से यहाँ भौंरे छिपे रहते हैं।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
सादृश्यमिति ॥ एतस्मिन्पर्वतेऽपनिद्रचूतगन्धैः सादृश्यं गतं फुल्लाम्रपुष्पगन्धसदृशं मदजलसेकजमामोदं परिमलं दधानो बिभ्राणः । अतएव लीनालिः संसक्तभृङग: सुरकरिणाम् । कष्यतेऽनेनेति काष: । कपोलानां काषः कषणस्थानं द्रुमस्कन्धादि । अकाले वसन्तातिरिक्त कालेऽपि कोकिलान्मदयति ।
मितां ह्रस्वः (अष्टाध्यायी ६.४.९२ ) इति हस्वः । अत्र वसन्तरूपकारणाभावेऽपि मदाख्यकार्योत्पत्तिकथनाद्विभावनालंकारः । तदुक्तम्कारणेन विना कार्यस्योत्पत्तिः स्याद्विभावना इति । सा च चूतगन्धैः सादृश्यमित्युपमया वामोदं दधान इति पदार्थहेतुककाव्यलिङ्गेन चाङ्गाङ्गिभावेन संकीर्यते । किंच कोकिलानां मदगन्धे चूतगन्धभ्रान्त्या भ्रान्तिमदलंकारो व्यज्यते । प्रहर्षिणीवृत्तम्-म्नौ ज्रौ गस्त्रिदशयतिः प्रहर्षिणीयम् इति लक्षणात् ॥
पदच्छेदः
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| सादृश्यम् | सादृश्य (२.१) | similarity |
| गतम् | गत (√गम्+क्त, २.१) | which has attained |
| अपनिद्रचूतगन्धैः | अपनिद्र–चूत–गन्ध (३.३) | with the fragrance of blooming mango blossoms |
| आमोदम् | आमोद (२.१) | fragrance |
| मदजलसेकजम् | मद–जल–सेक–ज (२.१) | born from the sprinkling of ichor |
| दधानः | दधान (√धा+शानच्, १.१) | bearing |
| एतस्मिन् | एतद् (७.१) | on this (mountain) |
| मदयति | मदयति (√मद् +णिच् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | intoxicates |
| कोकिलान् | कोकिल (२.३) | the cuckoos |
| अकाले | अकाल (७.१) | out of season |
| लीनालिः | लीन (√ली+क्त)–आलि (१.१) | on which bees have settled |
| सुरकरिणाम् | सुर–करिन् (६.३) | of the divine elephants |
| कपोलकाषः | कपोल–काष (१.१) | the rubbing of the temples |
छन्दः
प्रहर्षिणी [१३: मनजरग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सा | दृ | श्यं | ग | त | म | प | नि | द्र | चू | त | ग | न्धै |
| रा | मो | दं | म | द | ज | ल | से | क | जं | द | धा | नः |
| ए | त | स्मि | न्म | द | य | ति | को | कि | ला | न | का | ले |
| ली | ना | लिः | सु | र | क | रि | णां | क | पो | ल | का | षः |
| म | न | ज | र | ग | ||||||||
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