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॥ अथ द्वितीयः सर्गः ॥
२.१
विहितां प्रियया मनःप्रिया-
मथ निश्चित्य गिरं गरीयसीम् ।
उपपत्तिमदूर्जिताश्रयं
नृपमूचे वचनं वृकोदरः ॥
सारांश AI द्रौपदी की युक्तिसंगत और गंभीर बातों का समर्थन करते हुए, भीम ने महाराज युधिष्ठिर से तर्कपूर्ण और ओजस्वी वचन कहे।
२.२
यदवोचत वीक्ष्य मानिनी
परितः स्नेहमयेन चक्षुषा ।
अपि वागधिपस्य दुर्वचं
वचनं तद्विदधीत विस्मयम् ॥
सारांश AI स्वाभिमानी द्रौपदी ने स्नेहपूर्ण दृष्टि से देखते हुए जो बातें कहीं, वे इतनी प्रभावशाली थीं कि वाणी के देवता बृहस्पति को भी विस्मित कर सकती थीं।
२.३
विषमोऽपि विगाह्यते नयः
कृततीर्थः पयसामिवाशयः ।
स तु तत्र विशेषदुर्लभः
सदुपन्यस्यति कृत्यवर्त्म यः ॥
सारांश AI जैसे घाट के माध्यम से गहरे जलाशय में उतरा जा सकता है, वैसे ही नीति भी सुगम हो जाती है। परंतु ऐसा व्यक्ति दुर्लभ है जो कार्य करने का सही मार्ग विस्तार से प्रस्तुत करे।
२.४
परिणामसुखे गरीयसि
व्यथकेऽस्मिन्वचसि क्षतौजसाम् ।
अतिवीर्यवतीव भेषजे
बहुरल्पीयसि दृश्यते गुणः ॥
सारांश AI निर्बल व्यक्तियों को व्यथित करने वाले किंतु अंत में सुखद परिणाम देने वाले इन वचनों में, अत्यंत प्रभावशाली औषधि की भांति, थोड़े में ही बहुत गुण समाहित हैं।
२.५
इयमिष्टगुणाय रोचतां
रुचिरार्था भवतेऽपि भारती ।
ननु वक्तृविशेषनिःस्पृहा
गुणगृह्या वचने विपश्चितः ॥
सारांश AI सुंदर अर्थों वाली मेरी यह वाणी आपको प्रिय लगे। विद्वान लोग वक्ता के प्रति मोह न रखकर केवल वचनों के गुणों को ही ग्रहण करते हैं।
२.६
चतसृष्वपि ते विवेकिनी
नृप विद्यासु निरूढिमागता ।
कथमेत्य मतिर्विपर्ययं
करिणी पङ्कमिवावसीदति ॥
सारांश AI हे राजन! चारों विद्याओं में पारंगत आपकी विवेकी बुद्धि आज विपरीत दिशा में जाकर मोहग्रस्त कैसे हो रही है, जैसे कोई हथिनी कीचड़ में धंस जाती है?
२.७
विधुरं किमतः परं परै-
रवगीतां गमिते दशामिमाम् ।
अवसीदति यत्सुरैरपि
त्वयि सम्भावितवृत्ति पौरुषम् ॥
सारांश AI शत्रुओं द्वारा इस अपमानजनक स्थिति में पहुँचाए जाने से अधिक कष्टकारी और क्या होगा कि देवताओं द्वारा सम्मानित आपका पुरुषार्थ आज क्षीण हो रहा है।
२.८
द्विषतामुदयः सुमेधसा
गुरुरस्वन्ततरः सुमर्षणः ।
न महानपि भूतिमिच्छता
फलसम्पत्प्रवणः परिक्षयः ॥
सारांश AI बुद्धिमान व्यक्ति शत्रुओं की ऐसी उन्नति सहन कर लेते हैं जिसमें उनके विनाश के बीज हों, किंतु अपनी ऐसी अवनति कभी नहीं चाहते जो भविष्य के विनाश का कारण बने।
२.९
अचिरेण परस्य भूयसीं
विपरीतां विगणय्य चात्मनः ।
क्षययुक्तिमुपेक्षते कृती
कुरुते तत्प्रतिकारमन्यथा ॥
सारांश AI बुद्धिमान व्यक्ति यदि अपनी हानि और शत्रु की वृद्धि को निकट भविष्य में विपरीत होते देखता है, तभी वह वर्तमान क्षय की उपेक्षा करता है, अन्यथा वह तुरंत प्रतिकार करता है।
२.१०
अनुपालयतामुदेष्यतीं
प्रभुशक्तिं द्विषतामनीहया ।
अपयान्त्यचिरान्महीभुजां
जननिर्वादभयादिव श्रियः ॥
सारांश AI शत्रुओं की शक्ति को बढ़ते देख भी जो राजा निष्क्रिय होकर अपनी शक्ति के उदय की प्रतीक्षा करते हैं, लक्ष्मी उन्हें लोक-निंदा के भय से शीघ्र ही छोड़ देती है।
२.११
क्षययुक्तमपि स्वभावजं
दधतं धाम शिवं समृद्धये ।
प्रणमन्त्यनपायमुत्थितं
प्रतिपच्चन्द्रमिव प्रजा नृपम् ॥
सारांश AI जैसे लोग प्रतिपदा के बढ़ते हुए चंद्रमा को प्रणाम करते हैं, वैसे ही प्रजा उस राजा को नमन करती है जो संकट में भी अपने स्वाभाविक तेज को भविष्य की उन्नति के लिए धारण किए रहता है।
२.१२
प्रभवः खलु कोशदण्डयोः
कृतपञ्चाङ्गविनिर्णयो नयः ।
स विधेयपदेषु दक्षतां
नियतिं लोक इवानुरुध्यते ॥
सारांश AI कोष और सेना की उन्नति का आधार पाँच अंगों वाली नीति ही है। वह कार्यों की सफलता को उसी प्रकार नियंत्रित करती है जैसे भाग्य संसार को।
२.१३
अभिमानवतो मनस्विनः
प्रियमुच्चैः पदमारुरुक्षतः ।
विनिपातनिवर्तनक्षमं
मतमालम्बनमात्मपौरुषम् ॥
सारांश AI उच्च पद पर आसीन होने की इच्छा रखने वाले स्वाभिमानी और मनस्वी व्यक्ति के लिए अपना पुरुषार्थ ही एकमात्र सहारा है जो उसे पतन से बचा सकता है।
२.१४
विपदोऽभिभवन्त्यविक्रमं
रहयत्यापदुपेतमायतिः ।
नियता लघुता निरायते-
रगरीयान्न पदं नृपश्रियः ॥
सारांश AI पुरुषार्थहीन व्यक्ति को विपत्तियाँ दबा लेती हैं और संकटग्रस्त व्यक्ति का उज्ज्वल भविष्य साथ छोड़ देता है। भविष्यहीन व्यक्ति को लघुता प्राप्त होती है और तुच्छ व्यक्ति राजलक्ष्मी का पात्र नहीं होता।
२.१५
तदलं प्रतिपक्षमुन्नते-
रवलम्ब्य व्यवसायवन्ध्यताम् ।
निवसन्ति पराक्रमाश्रया
न विषादेन समं समृद्धयः ॥
सारांश AI अतः उन्नति में बाधक इस अकर्मण्यता को त्यागें। सुख-समृद्धि पराक्रम के आश्रित रहती है, वह विषाद या दुख के साथ निवास नहीं करती।
२.१६
अथ चेदवधिः प्रतीक्ष्यते
कथमाविष्कृतजिह्मवृत्तिना ।
धृतराष्ट्रसुतेन सुत्य-
ज्याश्चिरमास्वाद्य नरेन्द्रसम्पदः ॥
सारांश AI यदि आप समय सीमा समाप्त होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं, तो कपटी दुर्योधन लंबे समय तक राजसुख भोगने के बाद उसे आसानी से कैसे त्याग देगा?
२.१७
द्विषता विहितं त्वयाथवा
यदि लब्धा पुनरात्मनः पदम् ।
जननाथ तवानुजन्मनां
कृतमाविष्कृतपौरुषैर्भुजैः ॥
सारांश AI हे राजन! यदि शत्रुओं द्वारा छीना गया राज्य अंततः आपको स्वयं ही प्राप्त करना है, तो आपके इन पराक्रमी अनुजों की भुजाओं के पुरुषार्थ का क्या लाभ?
२.१८
मदसिक्तमुखैर्मृगाधिपः
करिभिर्वर्तयति स्वयं हतैः ।
लघयन्खलु तेजसा जग-
न्न महानिच्छति भूतिमन्यतः ॥
सारांश AI सिंह स्वयं द्वारा मारे गए मदमस्त हाथियों पर ही निर्वाह करता है। अपने तेज से जगत को प्रकाशित करने वाले महापुरुष दूसरों से सहायता या समृद्धि की भिक्षा नहीं चाहते।
२.१९
अभिमानधनस्य गत्वरै-
रसुभिः स्थास्नु यशश्चिचीषतः ।
अचिरांशुविलासचञ्चला
ननु लक्ष्मीः फलमानुषङ्गिकम् ॥
सारांश AI जो स्वाभिमानी पुरुष नश्वर प्राणों के बदले शाश्वत यश पाना चाहते हैं, उनके लिए बिजली की तरह चंचल लक्ष्मी तो केवल एक गौण या सहायक फल मात्र है।
२.२०
ज्वलितं न हिरण्यरेतसं
चयमास्कन्दति भस्मनां जनः ।
अभिभूतिभयादसूनतः
सुखमुज्झन्ति न धाम मानिनः ॥
सारांश AI लोग राख के ढेर को तो कुचल देते हैं, पर जलती हुई अग्नि को नहीं। इसी प्रकार स्वाभिमानी पुरुष अपमान के भय से अपने तेज को बचाने के लिए सुखपूर्वक प्राण त्याग देते हैं।
२.२१
किमवेक्ष्य फलं पयोधरा-
न्ध्वनतः प्रार्थयते मृगाधिपः ।
प्रकृतिः खलु सा महीयसः
सहते नान्यसमुन्नतिं यया ॥
सारांश AI सिंह गरजते हुए बादलों से किसी फल की अपेक्षा न करते हुए भी उनकी गर्जना को सहन नहीं करता है। वास्तव में तेजस्वी स्वभाव वाले महापुरुषों की यह प्रकृति होती है कि वे दूसरों की उन्नति को सहन नहीं कर पाते।
२.२२
कुरु तन्मतिमेव विक्रमे
नृप निर्धूय तमः प्रमादजम् ।
ध्रुवमेतदवेहि विद्विषां
त्वदनुत्साहहता विपत्तयः ॥
सारांश AI हे राजन्! प्रमाद से उत्पन्न मोह रूपी अंधकार को त्यागकर आप पराक्रम की ओर मन लगाएं। यह निश्चित समझें कि शत्रुओं की विपत्तियाँ केवल आपके उत्साह के अभाव के कारण ही रुकी हुई हैं।
२.२३
द्विरदानिव दिग्विभावितां-
श्चतुरस्तोयनिधीनिवायतः ।
प्रसहेत रणे तवानुजा-
न्द्विषतां कः शतमन्युतेजसः ॥
सारांश AI रणक्षेत्र में इंद्र के समान तेजस्वी आपके उन भाइयों को कौन सह सकता है, जो चारों दिशाओं के दिग्गजों के समान और चारों समुद्रों के समान अत्यंत शक्तिशाली एवं विशाल हृदय वाले हैं।
२.२४
ज्वलतस्तव जातवेदसः
सततं वैरिकृतस्य चेतसि ।
विदधातु शमं शिवेतरा
रिपुनारीनयनाम्बुसन्ततिः ॥
सारांश AI शत्रुओं द्वारा आपके हृदय में निरंतर प्रज्वलित की गई क्रोध रूपी अग्नि को, उन्हीं शत्रुओं की स्त्रियों के नेत्रों से बहने वाली आंसुओं की धाराएं शांत करें अर्थात् आप विजय प्राप्त करें।
२.२५
इति दर्शितविक्रियं सुतं
मरुतः कोपपरीतमानसम् ।
उपसान्त्वयितुं महीपति-
र्द्विरदं दुष्टमिवोपचक्रमे ॥
सारांश AI क्रोध से भरे हुए पवनपुत्र भीम के इस प्रकार के हाव-भाव देखकर, राजा युधिष्ठिर ने उन्हें शांत करने का प्रयास वैसे ही शुरू किया जैसे किसी मदमस्त हाथी को नियंत्रित किया जाता है।
२.२६
अपवर्जितविप्लवे शुच-
य्हृदयग्राहिणि मङ्गलास्पदे ।
विमला तव विस्तरे गिरां
मतिरादर्श इवाभिदृश्यते ॥
सारांश AI दोषरहित, हृदय को छूने वाली और कल्याणकारी तुम्हारी इस विस्तृत वाणी में तुम्हारी निर्मल बुद्धि उसी प्रकार स्पष्ट दिखाई दे रही है जैसे दर्पण में कोई वस्तु साफ दिखती है।
२.२७
स्फुटता न पदैरपाकृता
न च न स्वीकृतमर्थगौरवम् ।
रचिता पृथगर्थता गिरां
न च सामर्थ्यमपोहितं क्वचित् ॥
सारांश AI तुम्हारी वाणी में न तो शब्दों की स्पष्टता की कमी है और न ही अर्थ की गंभीरता की उपेक्षा की गई है। शब्दों के अर्थ अलग-अलग और स्पष्ट हैं और कहीं भी उनकी सामर्थ्य कम नहीं हुई है।
२.२८
उपपत्तिरुदाहृता बला-
दनुमानेन न चागमः क्षतः ।
इदमीदृगनीदृगाशयः
प्रसभं वक्तुमुपक्रमेत कः ॥
सारांश AI तुमने तर्क के साथ अपनी बात कही है और अनुमान से आगम (शास्त्र) मर्यादा का उल्लंघन भी नहीं किया है। तुम्हारे जैसी गहरी सोच वाला व्यक्ति ही इस प्रकार की स्पष्ट और ओजस्वी बात कह सकता है।
२.२९
अवितृप्ततया तथापि मे
हृदयं निर्णयमेव धावति ।
अवसाययितुं क्षमाः सुखं
न विधेयेषु विशेषसम्पदः ॥
सारांश AI यद्यपि मैं तुम्हारी बातों से संतुष्ट हूँ, फिर भी मेरा मन सही निर्णय की ओर दौड़ रहा है। श्रेष्ठ कार्यों की सफलता केवल उचित परामर्श मात्र से पूर्णतः सिद्ध नहीं हो जाती।
२.३०
सहसा विदधीत न क्रिया-
मविवेकः परमापदां पदम् ।
वृणते हि विमृश्यकारिणं
गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः ॥
सारांश AI किसी भी कार्य को बिना सोचे-समझे अचानक नहीं करना चाहिए, क्योंकि विवेकहीनता घोर विपत्तियों का घर है। गुणों की लोभी संपत्तियाँ स्वयं ही सोच-समझकर कार्य करने वाले व्यक्ति का चुनाव करती हैं।
२.३१
अभिवर्षति योऽनुपालय-
न्विधिबीजानि विवेकवारिणा ।
स सदा फलशालिनीं क्रियां
शरदं लोक इवाधितिष्ठति ॥
सारांश AI जो व्यक्ति विवेक रूपी जल से कर्म रूपी बीजों की रक्षा करता है, वह शरद ऋतु के समान सदा उत्तम फल देने वाली क्रियाओं का आनंद प्राप्त करता है।
२.३२
शुचि भूषयति श्रुतं वपुः
प्रशमस्तस्य भवत्यलंक्रिया ।
प्रशमाभरणं पराक्रमः
स नयापादितसिद्धिभूषणः ॥
सारांश AI पवित्र शास्त्र ज्ञान शरीर की शोभा बढ़ाता है, आत्मिक शांति उस ज्ञान का आभूषण है, पराक्रम शांति को सुशोभित करता है और नीति सम्मत सफलता उस पराक्रम का गहना है।
२.३३
मतिभेदतमस्तिरोहिते
गहने कृत्यविधौ विवेकिनाम् ।
सुकृतः परिशुद्ध आगमः
कुरुते दीप इवार्थदर्शनम् ॥
सारांश AI जब विभिन्न मतों के अंधकार से कर्तव्य का मार्ग धुंधला हो जाता है, तब महापुरुषों के लिए पवित्र शास्त्र ही दीपक के समान सही अर्थ और मार्ग दिखाने का कार्य करते हैं।
२.३४
स्पृहणीयगुणैर्महात्मभि-
श्चरिते वर्त्मनि यच्छतां मनः ।
विधिहेतुरहेतुरागसां
विनिपातोऽपि समः समुन्नतेः ॥
सारांश AI गुणवान महापुरुषों द्वारा अपनाए गए मार्ग पर चलने वालों के लिए, प्रारब्ध के कारण आया हुआ पतन भी उन्नति के समान ही सम्मानजनक होता है।
२.३५
शिवमौपयिकं गरीयसीं
फलनिष्पत्तिमदूषितायतिम् ।
विगणय्य नयन्ति पौरुषं
विजितक्रोधरया जिगीषवः ॥
सारांश AI विजय की इच्छा रखने वाले महापुरुष क्रोध के वेग को जीतकर, भविष्य में सुखद परिणाम और महान फल देने वाले पुरुषार्थ का ही सोच-समझकर आश्रय लेते हैं।
२.३६
अपनेयमुदेतुमिच्छता
तिमिरं रोषमयं धिया पुरः ।
अविभिद्य निशाकृतं तमः
प्रभया नांशुमताप्युदीयते ॥
सारांश AI उन्नति की इच्छा रखने वाले को सबसे पहले अपनी बुद्धि से क्रोध रूपी अंधकार को दूर करना चाहिए। सूर्य भी रात के अंधकार को नष्ट किए बिना अपनी किरणों से उदित नहीं होता।
२.३७
बलवानपि कोपजन्मन-
स्तमसो नाभिभवं रुणद्धि यः ।
क्षयपक्ष इवैन्दवीः कलाः
सकला हन्ति स शक्तिसम्पदः ॥
सारांश AI बलवान होने पर भी जो व्यक्ति क्रोध से उत्पन्न मोह को नहीं रोकता, उसकी समस्त शक्तियाँ और संपत्तियाँ कृष्ण पक्ष के चंद्रमा की कलाओं की भाँति धीरे-धीरे नष्ट हो जाती हैं।
२.३८
समवृत्तिरुपैति मार्दवं
समये यश्च तनोति तिग्मताम् ।
अधितिष्ठति लोकमोजसा
स विवस्वानिव मेदिनीपतिः ॥
सारांश AI जो राजा समय के अनुसार कोमलता और आवश्यकता पड़ने पर कठोरता का व्यवहार करता है, वही सूर्य के समान अपने तेज से संपूर्ण जगत पर शासन करने में समर्थ होता है।
२.३९
क्व चिराय परिग्रहः श्रियां
क्व च दुष्टेन्द्रियवाजिवश्यता ।
शरदभ्रचलाश्चलेन्द्रियै-
रसुरक्षा हि बहुच्छलाः श्रियः ॥
सारांश AI इंद्रियों के वश में रहने वाले व्यक्ति के पास लक्ष्मी का चिरकाल तक रहना असंभव है। शरद ऋतु के बादलों के समान चंचल लक्ष्मी की रक्षा चंचल इंद्रियों वाले व्यक्ति नहीं कर सकते।
२.४०
किमसामयिकं वितन्वता
मनसः क्षोभमुपात्तरंहसः ।
क्रियते पतिरुच्चकैरपां
भवता धीरतयाधरीकृतः ॥
सारांश AI धैर्य में समुद्र को भी पीछे छोड़ देने वाले आप, असमय में ही मन के इस तीव्र क्षोभ को बढ़ाकर अपनी गरिमा को क्यों कम कर रहे हैं?
२.४१
श्रुतमप्यधिगम्य ये रिपून्विनयन्ते स्म न शरीरजन्मनः । जनयन्त्यचिराय सम्पदामयशस्ते खलु चापलाश्रयम् ॥
सारांश AI शास्त्र ज्ञान पाकर भी जो काम-क्रोध आदि आंतरिक शत्रुओं को नहीं जीतते, वे चंचलता के वश में होकर शीघ्र ही अपने यश और संपत्तियों का विनाश कर बैठते हैं।
२.४२
अतिपातितकालसाधना
स्वशरीरेन्द्रियवर्गतापनी ।
जनवन्न भवन्तमक्षमा
नयसिद्धेरपनेतुमर्हति ॥
सारांश AI समय का दुरुपयोग करने वाली और शरीर एवं इन्द्रियों को कष्ट देने वाली अधीरता आपको नीति-सिद्धि के मार्ग से विचलित न करे, जैसा कि किसी साधारण मनुष्य के साथ होता है।
२.४३
उपकारकमायतेर्भृशं
प्रसवः कर्मफलस्य भूरिणः ।
अनपायि निबर्हणं द्विषां
न तितिक्षासममस्ति साधनम् ॥
सारांश AI भविष्य में महान उपकार करने वाली, प्रचुर फल देने वाली और शत्रुओं का जड़ से विनाश करने वाली 'क्षमा' के समान अन्य कोई साधन नहीं है।
२.४४
प्रणतिप्रवणान्विहाय नः
सहजस्नेहनिबद्धचेतसः ।
प्रणमन्ति सदा सुयोधनं
प्रथमे मानभृतां न वृष्णयः ॥
सारांश AI सहज प्रेम के कारण पहले हमें प्रणाम करने वाले स्वाभिमानी यादव अब हमें छोड़कर दुर्योधन की सेवा में लगे हैं और उसे प्रणाम करते हैं।
२.४५
सुहृदः सहजास्तथेतरे
मतमेषां न विलङ्घयन्ति ये ।
विनयादिव यापयन्ति ते
धृतराष्ट्रात्मजमात्मसिद्धये ॥
सारांश AI सहज मित्र और अन्य राजा, जो दुर्योधन की आज्ञा का उल्लंघन नहीं करते, वे अपनी सफलता के लिए किसी अनुशासन की भाँति उस धृतराष्ट्र पुत्र की सेवा कर रहे हैं।
२.४६
अभियोग इमान्महीभुजो
भवता तस्य ततः कृतावधेः ।
प्रविघाटयिता समुत्पत-
न्हरिदश्वः कमलाकरानिव ॥
सारांश AI आपके द्वारा किया गया आक्रमण, दुर्योधन के साथ संधिबद्ध उन राजाओं को वैसे ही तितर-बितर कर देगा जैसे उदय होता हुआ सूर्य कमलों के समूह को विकसित कर बिखेर देता है।
२.४७
उपजापसहान्विलङ्घय-
न्स विधाता नृपतीन्मदोद्धतः ।
सहते न जनोऽप्यधःक्रियां
किमु लोकाधिकधाम राजकम् ॥
सारांश AI मदोन्मत्त दुर्योधन उन राजाओं की उपेक्षा कर रहा है जिनमें फूट डाली जा सकती है; जब साधारण लोग भी अपमान सहन नहीं करते, तब तेजस्वी राजा भला इसे कैसे सहेंगे।
२.४८
असमापितकृत्यसम्पदां
हतवेगं विनयेन तावता ।
प्रभवन्त्यभिमानशालिनां
मदमुत्तम्भयितुं विभूतयः ॥
सारांश AI जिनके कार्यों की सफलता अभी अधूरी है, ऐसे अभिमानी व्यक्तियों की थोड़ी सी भी समृद्धि उनके अहंकार और मद को और अधिक बढ़ाने का कार्य करती है।
२.४९
मदमानसमुद्धतं नृपं
न वियुङ्क्ते नियमेन मूढता ।
अतिमूढ उदस्यते नया-
न्नयहीनादपरज्यते जनः ॥
सारांश AI अहंकार से भरे राजा को मूर्खता कभी नहीं छोड़ती; मूर्ख व्यक्ति नीति मार्ग से भटक जाता है और नीतिहीन राजा से उसकी प्रजा विमुख हो जाती है।
२.५०
अपरागसमीरणेरितः
क्रमशीर्णाकुलमूलसन्ततिः ।
सुकरस्तरुवत्सहिष्णुना
रिपुरुन्मूलयितुं महानपि ॥
सारांश AI असंतोष रूपी वायु से विचलित और धीरे-धीरे कमजोर हुई जड़ों वाले महान शत्रु को भी, एक धैर्यवान व्यक्ति उसी प्रकार उखाड़ फेंकता है जैसे हवा वृक्ष को जड़ से उखाड़ देती है।
॥ इति द्वितीयः सर्गः ॥
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