सारांश
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द्रौपदी की युक्तिसंगत और गंभीर बातों का समर्थन करते हुए, भीम ने महाराज युधिष्ठिर से तर्कपूर्ण और ओजस्वी वचन कहे।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
विहितामिति ॥ अथ वृकोदरो भीमः प्रियया द्रौपद्या । प्रियाग्रहणमस्या हितोपदेशतात्पर्यसूचनार्थम् । विहिताम् । अभिहितामित्यर्थः । विपूर्वस्य दधातेः क्रियांसामान्यवाचिनो योग्यविशेषपर्यवसानात् । मनःप्रियामभिमतार्थयोगान्मनोहराम् । विशेषणद्वयेनापि गिरो ग्राह्यत्वमुक्तम् । गिरं गरीयसीं सारवत्तरां निश्चित्यं नृपं धर्मराजमुपपत्तिमद्युक्तियुक्तमूर्जिताश्रयमुदारार्थं वचनमूच उक्तवान् । कर्तरि लिट् । ब्रुवो वचिरादेशः ।
ब्रुविशासि- इत्यादिना द्विकर्मकत्वम् । अकथितं च (अष्टाध्यायी १.४.५१ ) इति नृपस्य कर्मत्वम् ॥ किं तद्वचनं तदाह
छन्दः
वियोगिनी []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | हि | तां | प्रि | य | या | म | नः | प्रि | या | |
| म | थ | नि | श्चि | त्य | गि | रं | ग | री | य | सीम् |
| उ | प | प | त्ति | म | दू | र्जि | ता | श्र | यं | |
| नृ | प | मू | चे | व | च | नं | वृ | को | द | रः |
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