अन्वयः
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ये श्रुतम् अधिगम्य अपि शरीर-जन्मनः रिपून् न विनयन्ते स्म, ते खलु अचिराय सम्पदाम् चापल-आश्रयम् अयशः जनयन्ति ।
English Summary
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Those who, even after acquiring knowledge, fail to subdue the enemies born within their own bodies (i.e., passions), soon bring upon their fortunes the disgrace of being founded on fickleness.
सारांश
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शास्त्र ज्ञान पाकर भी जो काम-क्रोध आदि आंतरिक शत्रुओं को नहीं जीतते, वे चंचलता के वश में होकर शीघ्र ही अपने यश और संपत्तियों का विनाश कर बैठते हैं।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
श्रुतमिति ॥ किंच । ये श्रुतं शास्त्रमधिगम्यापि शरीरजन्मनः शरीरप्रभवान् रिपून्कामक्रोधादीन्न विनयन्ते न नियच्छन्ति ।
कर्तृस्थे चाशरीरे कर्मणि (अष्टाध्यायी १.३.३७ ) इत्यात्मनेपदम् । ते खल्चचिराय संपदां चापलाश्रयमस्थैर्यनिबन्धनमयशो दुष्कीर्तिं जनयन्ति । आश्रयदोषादस्थैर्थं सम्पदां न स्वदोषादित्यर्थः । अजितारिषङ्वर्गस्य कुतः संपद इति भावः ॥ तथा क्रोधात्कार्यहानिरित्याशयेनाह
पदच्छेदः
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| श्रुतम् | श्रुत (√श्रु+क्त, २.१) | knowledge |
| अपि | अपि | even |
| अधिगम्य | अधिगम्य (अधि√गम्+ल्यप्) | after acquiring |
| ये | यद् (१.३) | those who |
| रिपून् | रिपु (२.३) | the enemies |
| विनयन्ते | विनयन्ते (वि√नी +णिच् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | subdue |
| स्म | स्म | (indicates past tense) |
| न | न | do not |
| शरीरजन्मनः | शरीर–जन्मन् (२.३) | born within the body |
| जनयन्ति | जनयन्ति (√जन् +णिच् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | bring upon |
| अचिराय | अचिराय | soon |
| सम्पदाम् | सम्पद् (६.३) | their fortunes |
| अयशः | अयशस् (२.१) | the disgrace |
| ते | तद् (१.३) | they |
| खलु | खलु | indeed |
| चापलाश्रयम् | चापल–आश्रय (२.१) | of being founded on fickleness |
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