सारांश
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स्वाभिमानी द्रौपदी ने स्नेहपूर्ण दृष्टि से देखते हुए जो बातें कहीं, वे इतनी प्रभावशाली थीं कि वाणी के देवता बृहस्पति को भी विस्मित कर सकती थीं।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
यदिति ॥ मानिनी क्षत्रियकुलाभिमानवती द्रौपदी स्नेहमयेन स्नेहप्रचुरेण । तत्प्रकृतवचने मयट्' । चक्षुषा ज्ञानचक्षुषा । एतेनाप्तत्वमुक्तम् । परितो वीक्ष्य समन्ततो विविच्य यद्वचनमवोचत । ब्रुवोर्वक्तेर्वा लुङ् । 'वच उम्' इत्युमागमः । वागाधिपस्य बृहस्पतेरपि दुर्वचं वक्तुमशक्यम् । शेषे षष्ठीयम्, न कुद्योगलक्षणा । अतो 'न लोक-' इत्यादिना षष्ठीप्रतिषेधो नास्ति । तद्वचतं विस्मयं विदधीत । सर्वस्यापति शेषः । अथवा वागधिपस्यापि विस्मयं विदधीतेति संबन्धः । दुर्वचम् । केनापति शेषः । यतः स्रैणमपि शास्त्रमनुरुणद्धि हितं चानुबध्नाति । अतो विस्मयकरं ग्राह्यं चैतद्वचनमिति तात्पर्यार्थः ॥ विस्मयकरत्वे हेतुमाह
छन्दः
वियोगिनी []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | द | वो | च | त | वी | क्ष्य | मा | नि | नी | |
| प | रि | तः | स्ने | ह | म | ये | न | च | क्षु | षा |
| अ | पि | वा | ग | धि | प | स्य | दु | र्व | चं | |
| व | च | नं | त | द्वि | द | धी | त | वि | स्म | यम् |
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