क्व चिराय परिग्रहः श्रियां
क्व च दुष्टेन्द्रियवाजिवश्यता ।
शरदभ्रचलाश्चलेन्द्रियै-
रसुरक्षा हि बहुच्छलाः श्रियः ॥
क्व चिराय परिग्रहः श्रियां
क्व च दुष्टेन्द्रियवाजिवश्यता ।
शरदभ्रचलाश्चलेन्द्रियै-
रसुरक्षा हि बहुच्छलाः श्रियः ॥
क्व च दुष्टेन्द्रियवाजिवश्यता ।
शरदभ्रचलाश्चलेन्द्रियै-
रसुरक्षा हि बहुच्छलाः श्रियः ॥
अन्वयः
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श्रियाम् चिराय परिग्रहः क्व, दुष्ट-इन्द्रिय-वाजि-वश्यता च क्व । हि चलेन्द्रियैः श्रियः शरद्-अभ्र-चलाः, बहु-च्छलाः, (अतः) असुरक्षाः (भवन्ति) ।
English Summary
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Where is the long-lasting possession of fortunes, and where is the subjugation to the horses of wicked senses? Indeed, for those with unsteady senses, fortunes are as fickle as autumn clouds, full of deceptions, and thus insecure.
सारांश
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इंद्रियों के वश में रहने वाले व्यक्ति के पास लक्ष्मी का चिरकाल तक रहना असंभव है। शरद ऋतु के बादलों के समान चंचल लक्ष्मी की रक्षा चंचल इंद्रियों वाले व्यक्ति नहीं कर सकते।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
क्वेति ॥ श्रियां सम्पदां चिराय बहुकालं परिग्रहः स्वायत्तीकरणं क्व । इन्द्रियाणि चाजिन इवेति समासः । दुष्टानाममार्गधाविनामिन्द्रियवाजिनां वश्यो वशंगतस्तस्य भावस्तत्ता क्व । नोभयमेकत्र तिष्ठतीत्यर्थः । कुतः । हि यस्माच्छरदभ्रवच्चलाश्चञ्चलाः । किंच बहुच्छला बहुव्याजाः । बहुरन्ध्रा इति यावत् ।
छलं तु स्खलिते व्याजे इति विश्वः । श्रियः संपदः । चलेन्द्रियैरजितेन्द्रियैरसुरक्षा रक्षितुमशक्या; । कथंचित्प्राप्ता अपि श्रियो नाविनीतेषु तिष्ठन्तीत्यर्थः । वाक्यार्थहेतुकं काव्यलिङ्गमलंकार: ॥ क्रोधस्य दुष्ठतामुक्त्वा तस्य त्यागमुपदिशति
पदच्छेदः
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| क्व | क्व | where is |
| चिराय | चिराय | long-lasting |
| परिग्रहः | परिग्रह (परि√ग्रह्+अप्, १.१) | possession |
| श्रियाम् | श्री (६.३) | of fortunes |
| क्व | क्व | and where is |
| च | च | and |
| दुष्टेन्द्रियवाजिवश्यता | दुष्ट–इन्द्रिय–वाजिन्–वश्यता (१.१) | subjugation to the horses of wicked senses |
| शरदभ्रचलाः | शरद्–अभ्र–चल (१.३) | as fickle as autumn clouds |
| चलेन्द्रियैः | चल–इन्द्रिय (३.३) | for those with unsteady senses |
| असुरक्षाः | असुरक्षा (१.३) | insecure |
| हि | हि | indeed |
| बहुच्छलाः | बहु–छल (१.३) | full of deceptions |
| श्रियः | श्री (१.३) | fortunes |
छन्दः
वियोगिनी []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क्व | चि | रा | य | प | रि | ग्र | हः | श्रि | यां | |
| क्व | च | दु | ष्टे | न्द्रि | य | वा | जि | व | श्य | ता |
| श | र | द | भ्र | च | ला | श्च | ले | न्द्रि | यै | |
| र | सु | र | क्षा | हि | ब | हु | च्छ | लाः | श्रि | यः |
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