सारांश
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निर्बल व्यक्तियों को व्यथित करने वाले किंतु अंत में सुखद परिणाम देने वाले इन वचनों में, अत्यंत प्रभावशाली औषधि की भांति, थोड़े में ही बहुत गुण समाहित हैं।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
परिणामेति ॥ परिणामः फलकालः परिपाकावस्था च । तत्र सुखे हिते। ‘शस्तं चाथ त्रिषु द्रव्ये पापं पुण्यं सुखादि च
इति सुखशब्दस्य विशेष्यलिङ्गत्वम्। गरीयसि भूयिष्ठे श्रेष्ठे च ।क्षतौजसामुभयत्रापि क्षीणशक्तीनां व्यथके युद्धोपोद्बलकत्वाद्भयंकरे । अन्यत्रादौ संशयादिदुःखजनके। अल्पीयस्यल्पाक्षरेऽल्पमात्रे च । उक्तं च-‘स्वल्पा च मात्रा बहुलो गुणश्चः इति । अस्मिन्वचसि द्रौपदीवाक्ये । अतिवीर्यवत्यस्यन्तसामर्थ्यवति भेषज औषध इव।भैषजौषधधैषज्यम् इत्यमरः । बहुरनेको गुणो मानत्राणराज्यलाभादिरारोग्यबलपोषादिश्च दृश्यते । अतो ग्राह्यमस्या वचनमिति भावः ॥ सत्यमेवं तथापि मह्यं न रोचते । किं करोमीत्याह
छन्दः
वियोगिनी []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प | रि | णा | म | सु | खे | ग | री | य | सि | |
| व्य | थ | के | ऽस्मि | न्व | च | सि | क्ष | तौ | ज | साम् |
| अ | ति | वी | र्य | व | ती | व | भे | ष | जे | |
| ब | हु | र | ल्पी | य | सि | दृ | श्य | ते | गु | णः |
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