अन्वयः
AI
सहिष्णुना अपराग-समीरण-ईरितः, क्रम-शीर्ण-आकुल-मूल-सन्ततिः महान् अपि रिपुः तरु-वत् उन्मूलयितुम् सुकरः (भवति) ।
English Summary
AI
For a patient person, even a great enemy—who is shaken by the wind of public disaffection and whose network of roots has been gradually weakened and disturbed—is easy to uproot, just like a tree.
सारांश
AI
असंतोष रूपी वायु से विचलित और धीरे-धीरे कमजोर हुई जड़ों वाले महान शत्रु को भी, एक धैर्यवान व्यक्ति उसी प्रकार उखाड़ फेंकता है जैसे हवा वृक्ष को जड़ से उखाड़ देती है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
अपरागोऽप्रीतिः । द्वेष इति यावत् । समीरण इव । तेनेरितश्चोदितः। अतएव, क्रमेण शीर्णा शीर्णीभूताकुला चला च मूलसंततिः प्रकृत्यादिस्वजनवर्गः शिफासंघातश्च यस्य स तथोक्तः । ‘मुलं वशीकृते स्वीये शिफातारान्तिकादिषुः' इति वैजयन्ती। रिपुर्महानपि तरुवद्वृक्ष इव सहिष्णुना क्षमावतोन्मूलयितुमुद्धर्तुं सुकरः सुसाध्यः । सुकरोन्मूलन इत्यर्थः । अत्र मदादेः पूर्वपूर्वस्योत्तरोत्तरं प्रति कारणत्वात्करणमाला, तरुवदित्युपमा चेति द्वयोः संसृष्टिः ॥ नन्वन्तर्भेदमात्रेण कथं सुसाध्यस्तत्राह
पदच्छेदः
AI
| अपरागसमीरणेरितः | अपराग–समीरण–ईरित (√ईर्+क्त, १.१) | shaken by the wind of public disaffection |
| क्रमशीर्णाकुलमूलसन्ततिः | क्रम–शीर्ण (√शॄ+क्त)–आकुल–मूल–सन्तति (१.१) | whose network of roots is gradually weakened and disturbed |
| सुकरः | सुकर (१.१) | easy |
| तरुवत् | तरुवत् | like a tree |
| सहिष्णुना | सहिष्णु (३.१) | for a patient person |
| रिपुः | रिपु (१.१) | an enemy |
| उन्मूलयितुम् | उन्मूलयितुम् (उद्√मूल्+णिच्+तुमुन्) | to uproot |
| महान् | महत् (१.१) | great |
| अपि | अपि | even |
छन्दः
वियोगिनी []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | प | रा | ग | स | मी | र | णे | रि | तः | |
| क्र | म | शी | र्णा | कु | ल | मू | ल | स | न्त | तिः |
| सु | क | र | स्त | रु | व | त्स | हि | ष्णु | ना | |
| रि | पु | रु | न्मू | ल | यि | तुं | म | हा | न | पि |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.