अन्वयः
AI
मान-भृताम् प्रथमे वृष्णयः प्रणति-प्रवणान्, सहज-स्नेह-निबद्ध-चेतसः नः विहाय सदा सुयोधनम् न प्रणमन्ति ।
English Summary
AI
The Vrishnis (Yadavas), foremost among the honorable, whose hearts are bound by natural affection for us and who are inclined to bow to us, would never bow to Suyodhana (Duryodhana), abandoning us.
सारांश
AI
सहज प्रेम के कारण पहले हमें प्रणाम करने वाले स्वाभिमानी यादव अब हमें छोड़कर दुर्योधन की सेवा में लगे हैं और उसे प्रणाम करते हैं।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
प्रणतीति। सहजस्नेहेनाकृत्रिमप्रेम्णा निबद्धचेतसोऽस्मासु गाढं लग्नचित्ताः। सुयोधने तु न तथेति भावः । किं च मानभृतामहंकारिणां प्रथमेऽग्रेसरा:। सुयोधनस्तु ततोऽपीति भावः । वृष्णयो यादवा: प्रणतिप्रवणान्प्रणामपरान् । सुयोधनस्तु न तथेति भावः । नोऽस्मान्विहाय सुयोधनं सदा न प्रणमन्ति न नमन्ति नानुसरन्ति। किंतु कार्यकाले त्यक्ष्यन्त्येवेत्यर्थः। सति यादवविग्रहे न किंचिदस्माकमसाध्यं भवेदिति भावः । अनेकपदार्थहेतुकं काव्यलिङ्गमलंकारः ॥
पदच्छेदः
AI
| प्रणतिप्रवणान् | प्रणति–प्रवण (२.३) | who are inclined to bow to us |
| विहाय | विहाय (वि√हा+ल्यप्) | abandoning |
| नः | अस्मद् (२.३) | us |
| सहजस्नेहनिबद्धचेतसः | सहज–स्नेह–निबद्ध (नि√बन्ध्+क्त)–चेतस् (२.३) | whose hearts are bound by natural affection |
| प्रणमन्ति | प्रणमन्ति (प्र√नम् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | bow |
| सदा | सदा | ever |
| सुयोधनम् | सुयोधन (२.१) | to Suyodhana |
| प्रथमे | प्रथम (१.३) | foremost |
| मानभृताम् | मानभृत् (६.३) | among the honorable |
| न | न | not |
| वृष्णयः | वृष्णि (१.३) | the Vrishnis |
छन्दः
वियोगिनी []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | ण | ति | प्र | व | णा | न्वि | हा | य | नः | |
| स | ह | ज | स्ने | ह | नि | ब | द्ध | चे | त | सः |
| प्र | ण | म | न्ति | स | दा | सु | यो | ध | नं | |
| प्र | थ | मे | मा | न | भृ | तां | न | वृ | ष्ण | यः |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.