अन्वयः
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इति मरुतः सुतं दर्शितविक्रियं कोपपरीतमानसं (ज्ञात्वा) महीपतिः दुष्टं द्विरदम् इव उपसान्त्वयितुम् उपचक्रमे ।
English Summary
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Thus, the king (Yudhishthira), seeing the son of the Wind-god (Bhima) showing agitation with his mind filled with anger, began to pacify him, just as one would a rogue elephant.
सारांश
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क्रोध से भरे हुए पवनपुत्र भीम के इस प्रकार के हाव-भाव देखकर, राजा युधिष्ठिर ने उन्हें शांत करने का प्रयास वैसे ही शुरू किया जैसे किसी मदमस्त हाथी को नियंत्रित किया जाता है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
इतीति । इत्युक्तरीत्या दर्शिता विक्रिया विकारो वागारम्भात्मको येन तं कोपपरीतमानसं कोपाक्रान्तचित्तम् । इदं विशेषणद्वयं द्विरदेऽपि योज्यम् । मरुतः सुतं भीमं महीपतिर्युधिष्ठिरो दुष्टं द्विरदमिव । एतेन भीमस्य शौर्यमेव, न बुद्धिरस्तीति गम्यते। उपसान्त्वयितुमनुनेतुमुपचक्रमे प्रवृतः ।
प्रोपाभ्यां समर्थाभ्याम् (अष्टाध्यायी १.३.४२ ) इत्यात्मनेपदम् । राज्ञा तावदुपकारविशेषापेक्षया कथंचिदवशो जनः शनैः शनैर्द्विरदवद्वशीकरणीयः, न तु त्याज्य इति भावः ॥ प्रथमं तावत्स्तुत्यादिभिः प्रसादयति-अपवर्जितविप्लवे शुचौ हृदयग्राहिणि मङ्गलास्पदे । विमला तव विस्तरे गिरां मतिरादर्श इवाभिदृश्यते
पदच्छेदः
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| इति | इति | thus |
| दर्शितविक्रियम् | दर्शित–विक्रिय (२.१) | him who had shown agitation |
| सुतम् | सुत (२.१) | the son |
| मरुतः | मरुत् (६.१) | of the Wind-god (Bhima) |
| कोपपरीतमानसम् | कोप–परीत–मानस (२.१) | whose mind was filled with anger |
| उपसान्त्वयितुम् | उपसान्त्वयितुम् (उप√सान्त्व्+तुमुन्) | to pacify |
| महीपतिः | मही–पति (१.१) | the king (Yudhishthira) |
| द्विरदम् | द्विरद (२.१) | an elephant |
| दुष्टम् | दुष्ट (√दुष्+क्त, २.१) | rogue |
| इव | इव | like |
| उपचक्रमे | उपचक्रमे (उप√क्रम् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | began |
छन्दः
वियोगिनी []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | ति | द | र्शि | त | वि | क्रि | यं | सु | तं | |
| म | रु | तः | को | प | प | री | त | मा | न | सम् |
| उ | प | सा | न्त्व | यि | तुं | म | ही | प | ति | |
| र्द्वि | र | दं | दु | ष्ट | मि | वो | प | च | क्र | मे |
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