॥ अथ षोडशः सर्गः ॥
१६.१
ततः किराताधिपतेरलघ्वी-
माजिक्रियां वीक्ष्य विवृद्धमन्युः ।
स तर्कयामास विविक्ततर्क-
श्चिरं विचिन्वन्निति कारणानि ॥
सारांश AI किरातों के राजा की विशाल सैन्य क्रियाओं को देखकर अर्जुन का क्रोध बढ़ गया। उन्होंने विवेकपूर्ण ढंग से विचार करते हुए इसके कारणों को खोजना शुरू किया।
१६.२
मदस्रुतिश्यामितगण्डलेखाः
क्रामन्ति विक्रान्तनराधिरूढाः ।
सहिष्णवो नेह युधामभिज्ञा
नागा नगोच्छ्रायमिवाक्षिपन्तः ॥
सारांश AI मद की धारा से काले कपोलों वाले हाथी, जिन पर पराक्रमी योद्धा सवार हैं, पर्वतों की ऊँचाई को चुनौती देते हुए आगे बढ़ रहे हैं। ये युद्ध के अभ्यस्त न होने पर भी अत्यंत सहनशील प्रतीत हो रहे हैं।
१६.३
विचित्रया चित्रयतेव भिन्नां
रुचं रवेः केतनरत्नभासा ।
महारथौघेन न संनिरुद्धाः
पयोदमन्द्रध्वनिना धरित्री ॥
सारांश AI रथों के विशाल समूह ने पृथ्वी को घेर लिया है। ध्वजाओं के रत्नों की चमक सूर्य की किरणों को विविध रंगों में बदल रही है और रथों की गड़गड़ाहट बादलों के गंभीर गर्जन जैसी सुनाई दे रही है।
१६.४
समुल्लसत्प्रासमहोर्मिमालं
परिस्फुरच्चामरफेनपङ्क्ति ।
विभिन्नमर्यादमिहातनोति
नाश्वीयमाशा जलधेरिवाम्भः ॥
सारांश AI घुड़सवार सेना समुद्र के जल की भाँति दिशाओं में फैल रही है। चमकते हुए भाले लहरों के समान हैं और हिलते हुए चँवर जल के फेन की पंक्तियों की तरह शोभा पा रहे हैं।
१६.५
हताहतेत्युद्धतभीष्मघोषैः
समुज्झिता योद्धृभिरभ्यमित्रम् ।
न हेतयः प्राप्ततडित्त्विषः खे
विवस्वदंशुज्वलिताः पतन्ति ॥
सारांश AI योद्धाओं द्वारा 'मारो-मारो' के भीषण घोष के साथ शत्रु पर फेंके गए शस्त्र, सूर्य की किरणों से चमकते हुए आकाश में बिजली की कड़क के समान गिर रहे हैं।
१६.६
अभ्यायतः संततधूमधूम्रं
व्यापि प्रभाजालमिवान्तकस्य ।
रजः प्रतूर्णाश्वरथाङ्गनुन्नं
तनोति न व्योमनि मातरिश्वा ॥
सारांश AI घोड़ों और रथों के पहियों से उड़ने वाली धूल आकाश में वायु द्वारा इस प्रकार फैलाई जा रही है जैसे यमराज का कोई विशाल जाल हो या निरंतर उठता हुआ गहरा धुआँ।
१६.७
भूरेणुना रासभधूसरेण
तिरोहिते वर्त्मनि लोचनानाम् ।
नास्त्यत्र तेजस्विभिरुत्सुकाना-
मह्नि प्रदोषः सुरसुन्दरीणाम् ॥
सारांश AI गधों के रंग जैसी धूसर धूल से दृष्टि बाधित हो गई है। युद्ध के प्रति उत्सुक वीरों के लिए दिन में ही संध्या जैसा अंधकार छा गया है, जो स्वर्ग की सुंदरियों के लिए मिलन का संकेत है।
१६.८
रथाङ्गसंक्रीडितमश्वहेषा
बृहन्ति मत्तद्विपबृंहितानि ।
संघर्षयोगादिव मूर्छितानि
ह्रादं निगृह्णन्ति न दुन्दुभीनाम् ॥
सारांश AI रथों की घरघराहट, घोड़ों की हिनहिनाहट और मतवाले हाथियों का चिंघाड़ना दुंदुभियों के गंभीर स्वर को भी दबा रहा है, मानो ये ध्वनियाँ आपस में प्रतिस्पर्धा कर रही हों।
१६.९
अस्मिन्यशःपौरुषलोलुपाना-
मरातिभिः प्रत्युरसं क्षतानाम् ।
मूर्छान्तरायं मुहुरुच्छिनत्ति
नासारशीतं करिशीकराम्भः ॥
सारांश AI यश और पौरुष के अभिलाषी जो योद्धा शत्रुओं द्वारा घायल हुए हैं, हाथियों की सूँड से निकले शीतल जल के कण उनकी मूर्च्छा को बार-बार दूर कर रहे हैं।
१६.१०
असृङ्नदीनामुपचीयमानै-
र्विदारयद्भिः पदवीं ध्वजिन्याः ।
उच्छ्रायमायान्ति न शोणितौघैः
पङ्कैरिवाश्यानघनैस्तटानि ॥
सारांश AI रक्त की नदियों के कारण जमा हुए घने कीचड़ से सेना का मार्ग कठिन हो गया है। खून के इस प्रवाह ने नदी के तटों की भाँति ऊँचे ढेर बना दिए हैं, जो आगे बढ़ने में बाधक हैं।
१६.११
परिक्षते वक्षसि दन्तिदन्तैः
प्रियाङ्कशीता नभसः पतन्ती ।
नेह प्रमोहं प्रियसाहसानां
मन्दारमाला विरलीकरोति ॥
सारांश AI हाथियों के दाँतों से घायल हुए पराक्रमी योद्धाओं के वक्षस्थल पर आकाश से मन्दार की मालाएँ गिर रही हैं, जो अपनी दिव्यता और शीतलता से उनकी पीड़ा और मोह को कम कर रही हैं।
१६.१२
निषादिसंनाहमणिप्रभौघे
परीयमाणे करिशीकरेण ।
अर्कत्विषोन्मीलितमभ्युदेति
न खण्डमाखण्डलकार्मुकस्य ॥
सारांश AI योद्धाओं के आभूषणों के रत्नों की चमक जब हाथियों द्वारा छोड़े गए जल-कणों से टकराती है, तब सूर्य के प्रकाश में इंद्रधनुष के टुकड़ों जैसा सुंदर दृश्य उत्पन्न होता है।
१६.१३
महीभृता पक्षवतेव भिन्ना
विगाह्य मध्यं परवारणेन ।
नावर्तमाना निनदन्ति भीम-
मपां निधेराप इव ध्वजिन्यः ॥
सारांश AI पंख वाले पर्वत के समान विशाल शत्रुपक्ष के हाथियों द्वारा बीच में घुस जाने से सेनाएँ समुद्र के जल की तरह व्याकुल होकर भीषण ध्वनि कर रही हैं।
१६.१४
महारथानां प्रतिदन्त्यनीक-
मधिस्यदस्यन्दनमुत्थितानाम् ।
आमूललूनैरतिमन्युनेव
मातङ्गहस्तैर्व्रियते न पन्थाः ॥
सारांश AI क्रोध में जड़ से काटी गई हाथियों की सूँडों ने महारथियों के रथों का मार्ग इस प्रकार अवरुद्ध कर दिया है, मानो वे मृत्यु के बाद भी शत्रुओं को रोकना चाहती हों।
१६.१५
धृतोत्पलापीड इव प्रियायाः
शिरोरुहाणां शिथिलः कलापः ।
न बर्हभारः पतितस्य शङ्को-
र्निषादिवक्षःस्थलमातनोति ॥
सारांश AI गिरे हुए ध्वज के मोरपंखों का गुच्छा हाथीसवार के वक्ष पर इस तरह फैला है जैसे किसी प्रियतमा के बिखरे हुए बाल हों जिनमें उत्पल के पुष्प सजे हों।
१६.१६
उज्झत्सु संहार इवास्तसंख्य-
मह्नाय तेजस्विषु जीवितानि ।
लोकत्रयास्वादनलोलजिह्वं
न व्याददात्याननमत्र मृत्युः ॥
सारांश AI असंख्य तेजस्वी योद्धाओं के प्राण त्यागने पर ऐसा लग रहा है मानो साक्षात् मृत्यु तीनों लोकों को निगलने के लिए अपनी लपलपाती जीभ के साथ मुँह खोले खड़ी है।
१६.१७
इयं च दुर्वारमहारथाना-
माक्षिप्य वीर्यं महतां बलानाम् ।
शक्तिर्ममावस्यति हीनयुद्धे
सौरीव ताराधिपधाम्नि दीप्तिः ॥
सारांश AI अर्जुन विचार करते हैं कि महारथियों के पराक्रम को कुचलने वाली मेरी यह शक्ति इस किरात के विरुद्ध उसी प्रकार निष्प्रभ हो रही है जैसे चंद्रमा के प्रकाश में सूर्य की दीप्ति फीकी पड़ जाती है।
१६.१८
माया स्विदेषा मतिविभ्रमो वा
ध्वस्तं नु मे वीर्यमुताहमन्यः ।
गाण्डीवमुक्ता हि यथा पुरा मे
पराक्रमन्ते न शराः किराते ॥
सारांश AI क्या यह कोई माया है, बुद्धि का भ्रम है या मेरा पुरुषार्थ नष्ट हो गया है? गांडीव से छूटे हुए मेरे बाण इस किरात पर उस प्रकार प्रभाव नहीं डाल रहे जैसे पहले डालते थे।
१६.१९
पुंसः पदं मध्यममुत्तमस्य
द्विधेव कुर्वन्धनुषः प्रणादैः ।
नूनं तथा नैषा यथास्य वेषः
प्रच्छन्नमप्यूहयते हि चेष्टा ॥
सारांश AI धनुष के भीषण टंकार से दसों दिशाओं को गुँजायमान करने वाले इस पुरुष की चेष्टाएँ इसके वेष के विपरीत हैं। इसका गुप्त किंतु वास्तविक प्रभाव इसके पराक्रम से स्पष्ट झलक रहा है।
१६.२०
धनुः प्रबन्धध्वनितं रुषेव
सकृद्विकृष्टा विततेव मौर्वी ।
संधानमुत्कर्षमिव व्युदस्य
मुष्टेरसम्भेद इवापवर्गे ॥
सारांश AI इसके धनुष की डोरी से निरंतर ध्वनि निकल रही है। बाणों का संधान और प्रहार इतना तीव्र है कि मुट्ठी का खुलना और बंद होना बिजली की गति के समान अभिन्न प्रतीत हो रहा है।
१६.२१
अंसाववष्टब्धनतौ समाधिः
शिरोधराया रहितप्रयासः ।
धृता विकारांस्त्यजता मुखेन
प्रसादलक्ष्मीः शशलाञ्छनस्य ॥
सारांश AI अर्जुन के कंधे झुके हुए और स्थिर हैं, ग्रीवा यत्नशून्य है और उनका मुख विकारों से रहित चंद्रमा की कांति के समान प्रसन्नता बिखेर रहा है।
१६.२२
प्रहीयते कार्यवशागतेषु
स्थानेषु विष्टब्धतया न देहः ।
स्थितप्रयातेषु ससौष्ठवश्च
लक्ष्येषु पातः सदृशः शराणाम् ॥
सारांश AI विषम स्थानों में भी अर्जुन का शरीर शिथिल नहीं होता; उनकी मुद्राओं में सौंदर्य है और उनके बाणों का प्रहार लक्ष्य पर सटीक बैठता है।
१६.२३
परस्य भूयान्विवरेऽभियोगः
प्रसह्य संरक्षणमात्मरन्ध्रे ।
भीष्मेऽप्यसम्भाव्यमिदं गुरौ वा
न सम्भवत्येव वनेचरेषु ॥
सारांश AI शत्रु के छिद्रों पर प्रहार और अपने दोषों की सुरक्षा में अर्जुन की जो कुशलता है, वह भीष्म, द्रोण या इन वनचरों में संभव नहीं है।
१६.२४
अप्राकृतस्याहवदुर्मदस्य
निवार्यमस्यास्त्रबलेन वीर्यम् ।
अल्पीयसोऽप्यामयतुल्यवृत्ते-
र्महापकाराय रिपोर्विवृद्धिः ॥
सारांश AI असाधारण और युद्ध-उन्मत्त शत्रु की शक्ति को अस्त्रबल से रोकना चाहिए, क्योंकि रोग के समान छोटे शत्रु की वृद्धि भी भारी अनर्थकारी होती है।
१६.२५
स सम्प्रधार्यैवमहार्यसारः
सारं विनेष्यन्सगणस्य शत्रोः ।
प्रस्वापनास्त्रं द्रुतमाजहार
ध्वान्तं घनानद्ध इवार्धरात्रः ॥
सारांश AI अपनी सेना सहित शत्रु के बल को नष्ट करने का विचार कर अर्जुन ने शीघ्र ही 'प्रस्वापन' अस्त्र का प्रयोग किया, जैसे आधी रात का घना अंधकार छा जाता है।
१६.२६
प्रसक्तदावानलधूमधूम्रा
निरुन्धती धाम सहस्ररश्मेः ।
महावनानीव महातमिस्रा
छाया ततानेशबलानि काली ॥
सारांश AI वनाग्नि के धुएँ के समान काली वह महातमिस्रा सूर्य के प्रकाश को रोकती हुई किरात सेना पर घने वन की छाया की तरह छा गई।
१६.२७
आसादिता तत्प्रथमं प्रसह्य
प्रगल्भतायाः पदवीं हरन्ती ।
सभेव भीमा विदधे गणानां
निद्रा निरासं प्रतिभागुणस्य ॥
सारांश AI उस अस्त्र ने सबसे पहले किरातों की प्रगल्भता को छीन लिया और सभा की तरह भीषण निद्रा ने उनके प्रत्युत्पन्नमतित्व को नष्ट कर दिया।
१६.२८
गुरुस्थिराण्युत्तमवंशजत्वा-
द्विज्ञातसाराण्यनुशीलनेन ।
केचित्समाश्रित्य गुणान्वितानि
सुहृत्कुलानीव धनूंषि तस्थुः ॥
सारांश AI कुछ किरात अपने उत्तम वंश के कारण सुदृढ़ और परीक्षित गुणों वाले धनुषों का सहारा लेकर वैसे ही खड़े रहे जैसे कोई सज्जन मित्रों का सहारा लेता है।
१६.२९
कृतान्तदुर्वृत्त इवापरेषां
पुरः प्रतिद्वन्द्विनि पाण्डवास्त्रे ।
अतर्कितं पाणितलान्निपेतुः
क्रियाफलानीव तदायुधानि ॥
सारांश AI पाण्डुपुत्र के अस्त्र के सामने अन्य किरातों के हाथों से अस्त्र अचानक वैसे ही गिर पड़े जैसे दुर्भाग्य आने पर कर्मों के फल नष्ट हो जाते हैं।
१६.३०
अंसस्थलैः केचिदभिन्नधैर्याः
स्कन्धेषु संश्लेषवतां तरूणाम् ।
मदेन मीलन्नयनाः सलीलं
नागा इव स्रस्तकरा निषेदुः ॥
सारांश AI कुछ अडिग धैर्य वाले किरात वृक्षों से कंधा सटाकर, मदमस्त हाथियों की तरह अपनी भुजाएँ लटकाकर नींद में आँखें मूँदकर बैठ गए।
१६.३१
तिरोहितेन्दोरथ शम्भुमूर्ध्नः
प्रणम्यमानं तपसां निवासैः ।
सुमेरुशृङ्गादिव बिम्बमार्कं
पिशङ्गमुच्चैरुदियाय तेजः ॥
सारांश AI फिर शिव के मस्तक से, जहाँ चंद्रमा छिप गया था, सुमेरु पर्वत से उगते सूर्य के समान एक लाल दीप्ति प्रकट हुई जो तप का निवास थी।
१६.३२
छायां विनिर्धूय तमोमयीं तां
तत्त्वस्य संवित्तिरिवापविद्याम् ।
ययौ विकासं द्युतिरिन्दुमौले-
रालोकमभ्यादिशती गणेभ्यः ॥
सारांश AI शिव की उस ज्योति ने अंधकारमयी छाया को वैसे ही दूर कर दिया जैसे आत्मज्ञान अविद्या को मिटा देता है, और गणों को मार्ग दिखाया।
१६.३३
त्विषां ततिः पाटलिताम्बुवाहा
सा सर्वतः पूर्वसरीव संध्या ।
निनाय तेषां द्रुतमुल्लसन्ती
विनिद्रतां लोचनपङ्कजानि ॥
सारांश AI बादलों को लाल करती हुई वह कांति प्रभात की संध्या के समान उदित हुई और उसने शीघ्र ही उन किरातों के नेत्र-कमलों को निद्रा से जगा दिया।
१६.३४
पृथग्विधान्यस्त्रविरामबुद्धाः
शस्त्राणि भूयः प्रतिपेदिरे ते ।
मुक्ता वितानेन बलाहकानां
ज्योतींषि रम्या इव दिग्विभागाः ॥
सारांश AI अस्त्र के प्रभाव से मुक्त होकर किरातों ने पुनः अपने शस्त्र उठा लिए, जैसे बादलों के हटने पर दिशाओं में पुनः नक्षत्र चमकने लगते हैं।
१६.३५
द्यौरुन्ननामेव दिशः प्रसेदुः
स्फुटं विसस्रे सवितुर्मयूखैः ।
क्षयं गतायामिव यामवत्यां
पुनः समीयाय दिनं दिनश्रीः ॥
सारांश AI आकाश ऊँचा उठ गया, दिशाएँ प्रसन्न हो गईं और सूर्य की किरणें फैल गईं; मानो रात्रि बीतने पर पुनः दिन की शोभा लौट आई हो।
१६.३६
महास्त्रदुर्गे शिथिलप्रयत्नं
दिग्वारणेनेव परेण रुग्णे ।
भुजङ्गपाशान्भुजवीर्यशाली
प्रबन्धनाय प्रजिघाय जिष्णुः ॥
सारांश AI अपने महास्त्र को शिथिल होते देख, पराक्रमी अर्जुन ने शत्रुओं को बाँधने के लिए 'भुजंगपाश' नामक सर्पास्त्र का संधान किया।
१६.३७
जिह्वाशतान्युल्लसयन्त्यजस्रं
लसत्तडिल्लोलविषानलानि ।
त्रासान्निरस्तां भुजगेन्द्रसेना
नभश्चरैस्तत्पदवीं विवव्रे ॥
सारांश AI सैकड़ों जिह्वाएँ लपलपाने लगीं और विषैली अग्नि चमकने लगी; आकाशचारी देवों ने डर के मारे उस सर्पसेना का मार्ग छोड़ दिया।
१६.३८
दिङ्नागहस्ताकृतिमुद्वहद्भि-
र्भोगैः प्रशस्तासितरत्ननीलैः ।
रराज सर्पावलिरुल्लसन्ती
तरङ्गमालेव नभोर्णवस्य ॥
सारांश AI दिशागज के सूँड जैसी आकृति वाले और नीलम के समान काले वे सर्प आकाश रूपी समुद्र में उठती हुई लहरों की माला की तरह सुशोभित हुए।
१६.३९
निःश्वासधूमैः स्थगितांशुजालं
फणावतामुत्फणमण्डलानाम् ।
गच्छन्निवास्तं वपुरभ्युवाह
विलोचनानां सुखमुष्णरश्मिः ॥
सारांश AI उन फनधारी सर्पों के निश्वास रूपी धुएँ से सूर्य की किरणें ढँक गईं और सूर्य अस्ताचल की ओर जाता हुआ सा प्रतीत हुआ, जिससे आँखों को सुख मिला।
१६.४०
प्रतप्तचामीकरभासुरेण
दिशः प्रकाशेन पिशङ्गयन्त्यः ।
निश्चक्रमुः प्राणहरेक्षणानां
ज्वाला महोल्का इव लोचनेभ्यः ॥
सारांश AI तपाये हुए सुवर्ण के समान चमकती हुई और प्राणों को हरने वाली अग्नि की ज्वालाएँ उन सर्पों के नेत्रों से महाउल्काओं की तरह निकलने लगीं।
१६.४१
आक्षिप्तसम्पातमपेतशोभ-
मुद्वह्नि धूमाक्कुलदिग्विभागम् ।
वृतं नभो भोगिकुलैरवस्थां
परोपरुद्धस्य पुरस्य भेजे ॥
सारांश AI आकाश, सर्पों से घिरकर, शत्रुओं द्वारा अवरुद्ध किसी नगर की भांति हो गया, जिसकी कांति लुप्त हो गई थी और जो अग्नि के साथ धुएं से दसों दिशाओं में व्याप्त था।
१६.४२
तमाशु चक्षुःश्रवसां समूहं
मन्त्रेण तार्क्ष्योदयकारणेन ।
नेता नयेनेव परोपजापं
निवारयामास पतिः पशूनाम् ॥
सारांश AI पशुपति शिव ने गरुड़ोत्पत्ति के मन्त्र द्वारा सर्पों के उस समूह को शीघ्र ही वैसे ही शांत कर दिया, जैसे कोई नीतिवान नेता अपनी कूटनीति से शत्रुओं के षड्यंत्र को विफल कर देता है।
१६.४३
प्रतिघ्नतीभिः कृतमीलितानि
द्युलोकभाजामपि लोचनानि ।
गरुत्मता संहतिभिर्विहायः
क्षणप्रकाशाभिरिवावतेने ॥
सारांश AI क्षण भर के लिए चमकने वाली बिजली के समान गरुड़ों के समूह ने आकाश को इस प्रकार व्याप्त कर लिया कि उनकी चमक से देवताओं की आंखें भी झपकने लगीं।
१६.४४
ततः सुपर्णव्रजपक्षजन्मा
नानागतिर्मण्डलयञ्जवेन ।
जरत्तृणानीव वियन्निनाय
वनस्पतीनां गहनानि वायुः ॥
सारांश AI गरुड़ों के पंखों से उत्पन्न और तीव्र वेग से मंडलाकार घूमने वाली वायु ने सघन वनों को पुराने सूखे तिनकों की भांति आकाश में उड़ा दिया।
१६.४५
मनःशिलाभङ्गनिभेन पश्चा-
न्निरुध्यमानं निकरेण भासाम् ।
व्यूढैरुरोभिश्च विनुद्यमानं
नभः ससर्पेव पुरः खगानाम् ॥
सारांश AI गरुड़ों के विशाल वक्षस्थलों से धकेला जाता हुआ और उनके पीछे फैलती मनःशिला (लाल खनिज) जैसी कांति वाला आकाश ऐसा लग रहा था मानो वह स्वयं उन पक्षियों के आगे सरक रहा हो।
१६.४६
दरीमुखैरासवरागताम्रं
विकासि रुक्मच्छदधाम पीत्वा ।
जवानिलाघूर्णितसानुजालो
हिमाचलः क्षीब इवाचकम्पे ॥
सारांश AI गरुड़ों के स्वर्णमयी पंखों की चमक को मदिरा की भांति पीकर और उनके पंखों की वायु से कांपते पर्वतों वाला हिमालय किसी मतवाले व्यक्ति की तरह डगमगाने लगा।
१६.४७
प्रवृत्तनक्तंदिवसंधिदीप्तै-
र्नभस्तलं गां च पिशङ्गयष्टिः ।
अन्तर्हितार्कैः परितः पतद्भि-
श्छायाः समाचिक्षिपिरे वनानाम् ॥
सारांश AI सूर्य को ढककर चारों ओर गिरते हुए गरुड़ों की पीली आभा ने आकाश और पृथ्वी को रंजित कर दिया, जिससे वनों की छाया भी लुप्त हो गई।
१६.४८
स भोगसंघः शममुग्रधाम्नां
सैन्येन निन्ये विनतासुतानाम् ।
महाध्वरे विध्यपचारदोषः
कर्मान्तरेणेव महोदयेन ॥
सारांश AI गरुड़ों की सेना ने उन भयंकर सर्पों को वैसे ही शांत कर दिया, जैसे किसी महान यज्ञ का निर्दोष अनुष्ठान पूर्व के यज्ञ में हुई त्रुटियों के दोष को समाप्त कर देता है।
१६.४९
साफल्यमस्त्रे रिपुपौरुषस्य
कृत्वा गते भाग्य इवापवर्गम् ।
अनिन्धनस्य प्रसभं समन्युः
समाददेऽस्त्रं ज्वलनस्य जिष्णुः ॥
सारांश AI शत्रु के प्रभाव से जब अपना अस्त्र निष्फल हो गया, तब भाग्य के साथ न देने पर जैसे पुरुष का उत्साह बढ़ता है, वैसे ही अर्जुन ने क्रोधपूर्वक प्रलयंकारी आग्नेयास्त्र धारण किया।
१६.५०
ऊर्ध्वं तिरश्चीनमधश्च कीर्णै-
र्ज्वालासटैर्लङ्घितमेघपङ्क्तिः ।
आयस्तसिंहाकृतिरुत्पपात
प्राण्यन्तमिच्छन्निव जातवेदाः ॥
सारांश AI सिंह की आकृति धारण किए हुए वह अग्नि अपनी लपटों रूपी अयालों को ऊपर, नीचे और तिरछा फैलाकर बादलों को लांघती हुई समस्त प्राणियों का अंत करने के लिए आकाश में झपटी।
॥ इति षोडशः सर्गः ॥
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