दिङ्नागहस्ताकृतिमुद्वहद्भि-
र्भोगैः प्रशस्तासितरत्ननीलैः ।
रराज सर्पावलिरुल्लसन्ती
तरङ्गमालेव नभोर्णवस्य ॥
दिङ्नागहस्ताकृतिमुद्वहद्भि-
र्भोगैः प्रशस्तासितरत्ननीलैः ।
रराज सर्पावलिरुल्लसन्ती
तरङ्गमालेव नभोर्णवस्य ॥
र्भोगैः प्रशस्तासितरत्ननीलैः ।
रराज सर्पावलिरुल्लसन्ती
तरङ्गमालेव नभोर्णवस्य ॥
अन्वयः
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दिङ्नाग-हस्त-आकृतिम् उद्वहद्भिः प्रशस्त-असित-रत्न-नीलैः भोगैः उल्लसन्ती सर्प-आवलिः नभः-अर्णवस्य तरङ्गमाला इव रराज।
English Summary
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The glittering line of serpents, with their hoods—which resembled the trunks of the celestial elephants and were dark blue like excellent sapphires—shone like a series of waves in the ocean of the sky.
सारांश
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दिशागज के सूँड जैसी आकृति वाले और नीलम के समान काले वे सर्प आकाश रूपी समुद्र में उठती हुई लहरों की माला की तरह सुशोभित हुए।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
दिङ्नागेति ॥ दिङ्नागहस्ताकृतिमुद्वहद्भिर्दिक्करिकराकारैस्तथा प्रशस्तानि समीचीनान्यसितरत्नानीन्द्रनीलमणयस्तद्वन्नीलौंर्भागैः कार्यरुपलक्षिता सर्पावलिरुल्लसन्ती प्रक्षुभ्यन्ती नभ एवार्णवस्तस्य तरङ्गमालेव रराज । रूपकोत्थापितेयमुत्प्रेक्षा ॥
पदच्छेदः
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| दिङ्नागहस्ताकृतिम् | दिश्–नाग–हस्त–आकृति (२.१) | the form of the trunks of celestial elephants |
| उद्वहद्भिः | उद्वहत् (उद्√वह्+शतृ, ३.३) | by those bearing |
| भोगैः | भोग (३.३) | with their hoods |
| प्रशस्तासितरत्ननीलैः | प्रशस्त–असित–रत्न–नील (३.३) | by those which were dark blue like excellent sapphires |
| रराज | रराज (√राज् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | shone |
| सर्पावलिः | सर्प–आवलि (१.१) | the line of serpents |
| उल्लसन्ती | उल्लसन्ती (उद्√लस्+शतृ, १.१) | glittering |
| तरङ्गमाला | तरङ्ग–माला (१.१) | a series of waves |
| इव | इव | like |
| नभोर्णवस्य | नभस्–अर्णव (६.१) | of the ocean of the sky |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| दि | ङ्ना | ग | ह | स्ता | कृ | ति | मु | द्व | ह | द्भि |
| र्भो | गैः | प्र | श | स्ता | सि | त | र | त्न | नी | लैः |
| र | रा | ज | स | र्पा | व | लि | रु | ल्ल | स | न्ती |
| त | र | ङ्ग | मा | ले | व | न | भो | र्ण | व | स्य |
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