मदस्रुतिश्यामितगण्डलेखाः
क्रामन्ति विक्रान्तनराधिरूढाः ।
सहिष्णवो नेह युधामभिज्ञा
नागा नगोच्छ्रायमिवाक्षिपन्तः ॥
मदस्रुतिश्यामितगण्डलेखाः
क्रामन्ति विक्रान्तनराधिरूढाः ।
सहिष्णवो नेह युधामभिज्ञा
नागा नगोच्छ्रायमिवाक्षिपन्तः ॥
क्रामन्ति विक्रान्तनराधिरूढाः ।
सहिष्णवो नेह युधामभिज्ञा
नागा नगोच्छ्रायमिवाक्षिपन्तः ॥
अन्वयः
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इह मदस्रुतिश्यामितगण्डलेखाः, विक्रान्तनराधिरूढाः, युधाम् अभिज्ञाः, नगोच्छ्रायम् आक्षिपन्तः इव, सहिष्णवः नागाः न क्रामन्ति ।
English Summary
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(Arjuna thinks:) Here, there are no striding elephants—enduring, skilled in battle, mounted by valiant men, with cheek-lines darkened by flowing ichor, and appearing to scorn the height of mountains. This is no ordinary army.
सारांश
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मद की धारा से काले कपोलों वाले हाथी, जिन पर पराक्रमी योद्धा सवार हैं, पर्वतों की ऊँचाई को चुनौती देते हुए आगे बढ़ रहे हैं। ये युद्ध के अभ्यस्त न होने पर भी अत्यंत सहनशील प्रतीत हो रहे हैं।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
मदेत्यादि ॥ इहास्मिन्युद्धे मदस्रुतिभिर्मदप्रवाहैः श्यामाः कृताः श्यामिता गण्डलेखाः कपोलभागा येषां ते विक्रान्ताः पराक्रमं कुर्वन्तः । कर्तरि क्तः ।
शूरो वीरश्च विक्रान्तः इत्यमरः (अमरकोशः २.८.७७ ) । तैर्नरैरधिरूढाः सहिष्णवो रणभरक्षमा युधां युद्धानामभिज्ञाः । शिक्षितां इत्यर्थः । कृद्योगात्कर्मणि षष्ठी। किं च। नगानामुच्छ्रायं पर्वतानामौन्नत्यम् । धञन्तेनोपसर्गस्य समासो नोपसृष्टाद्धञ्प्रत्ययः । त्रिणीभुवोऽनुपसर्गे इत्यत्रानुपसर्ग इति निषेधात् । आक्षिपन्तः प्रतिषेधयन्त इव स्थिताः। तथोन्नता इत्यर्थः । नागा गजा इह सङ्ग्रामे न क्रामन्ति न चरन्ति । यथा युद्धान्तरेष्विति शेषः । एवमुत्तरत्रापि सर्वत्र द्रष्टव्यम् । तथापि कथं मे शक्तिह्रासोऽयमिति सर्वत्र तात्पर्थार्थः ।
पदच्छेदः
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| मदस्रुतिश्यामितगण्डलेखाः | मद–स्रुति–श्यामित–गण्ड–लेखा (१.३) | whose cheek-lines are darkened by the flow of ichor |
| क्रामन्ति | क्रामन्ति (√क्रम् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | are striding |
| विक्रान्तनराधिरूढाः | विक्रान्त–नर–अधिरूढ (१.३) | mounted by valiant men |
| सहिष्णवः | सहिष्णु (१.३) | enduring |
| न | न | not |
| इह | इह | here |
| युधाम् | युध् (६.३) | of battles |
| अभिज्ञाः | अभिज्ञ (१.३) | skilled in |
| नागाः | नाग (१.३) | elephants |
| नगोच्छ्रायम् | नग–उच्छ्राय (२.१) | the height of a mountain |
| इव | इव | as if |
| आक्षिपन्तः | आक्षिपत् (आ√क्षिप्+शतृ, १.३) | scorning/surpassing |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म | द | स्रु | ति | श्या | मि | त | ग | ण्ड | ले | खाः |
| क्रा | म | न्ति | वि | क्रा | न्त | न | रा | धि | रू | ढाः |
| स | हि | ष्ण | वो | ने | ह | यु | धा | म | भि | ज्ञा |
| ना | गा | न | गो | च्छ्रा | य | मि | वा | क्षि | प | न्तः |
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