आक्षिप्तसम्पातमपेतशोभ-
मुद्वह्नि धूमाक्कुलदिग्विभागम् ।
वृतं नभो भोगिकुलैरवस्थां
परोपरुद्धस्य पुरस्य भेजे ॥
आक्षिप्तसम्पातमपेतशोभ-
मुद्वह्नि धूमाक्कुलदिग्विभागम् ।
वृतं नभो भोगिकुलैरवस्थां
परोपरुद्धस्य पुरस्य भेजे ॥
मुद्वह्नि धूमाक्कुलदिग्विभागम् ।
वृतं नभो भोगिकुलैरवस्थां
परोपरुद्धस्य पुरस्य भेजे ॥
अन्वयः
AI
भोगि-कुलैः वृतम्, आक्षिप्त-सम्पातम्, अपेत-शोभम्, उत्-वह्नि, धूम-आकुल-दिक्-विभागम् नभः पर-अवरुद्धस्य पुरस्य अवस्थाम् भेजे।
English Summary
AI
The sky, filled with hosts of serpents, with birds' flight obstructed, devoid of beauty, filled with rising fire and its directions obscured by smoke, attained the state of a city besieged by an enemy.
सारांश
AI
आकाश, सर्पों से घिरकर, शत्रुओं द्वारा अवरुद्ध किसी नगर की भांति हो गया, जिसकी कांति लुप्त हो गई थी और जो अग्नि के साथ धुएं से दसों दिशाओं में व्याप्त था।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
आक्षिप्तेति ॥ आक्षिप्तः प्रतिषिद्धः संपातः संचारो यस्मिंस्तत् । सिद्धानां पक्षिणां चेति शेषः । अपेता गता शोभा यस्मात्तदपेतशोभं गतश्रीकम् । उद्गतः प्रदीप्तो वह्निर्यस्मिंस्तदुद्वह्नि सर्वत उद्भूतदहनम् । धूमैराकुला व्याप्ता दिग्विभागा यस्य तत् । भोगिकुलैः सर्पकुलैर्वृतमावृतं नभः परोपरुद्धस्य शत्रुवेष्टितस्य पुरस्यावस्थामिवावस्थां दशां भेजे । उक्तरीत्या तत्साधर्म्यं प्राप्तमित्यर्थः । निदर्शनालंकारः ॥
पदच्छेदः
AI
| आक्षिप्तसम्पातम् | आक्षिप्त (आ√क्षिप्+क्त)–सम्पात (२.१) | in which the flight (of birds) was obstructed |
| अपेतशोभम् | अपेत (अप√इ+क्त)–शोभ (२.१) | devoid of beauty |
| उद्वह्नि | उद्–वह्नि (२.१) | with fire rising up |
| धूमाकुलदिग्विभागम् | धूम–आकुल–दिश्–विभाग (२.१) | in which the directions were obscured by smoke |
| वृतम् | वृत (√वृ+क्त, २.१) | filled |
| नभः | नभस् (१.१) | the sky |
| भोगिकुलैः | भोगिन्–कुल (३.३) | by hosts of serpents |
| अवस्थाम् | अवस्था (२.१) | the state |
| परोपरुद्धस्य | पर–अवरुद्ध (अव√रुध्+क्त, ६.१) | of a besieged (city) |
| पुरस्य | पुर (६.१) | of a city |
| भेजे | भेजे (√भज् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | attained |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | क्षि | प्त | स | म्पा | त | म | पे | त | शो | भ |
| मु | द्व | ह्नि | धू | मा | क्कु | ल | दि | ग्वि | भा | गम् |
| वृ | तं | न | भो | भो | गि | कु | लै | र | व | स्थां |
| प | रो | प | रु | द्ध | स्य | पु | र | स्य | भे | जे |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.