अन्वयः
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गरुत्मता द्युलोक-भाजाम् अपि लोचनानि कृत-मीलितानि (कुर्वतीभिः) प्रतिघ्नतीभिः क्षण-प्रकाशाभिः इव संहतिभिः विहायः अवतेने।
English Summary
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By Garuda, the sky was filled with his flocks, which, with their momentary flashes of brilliance, dazzled and forced even the inhabitants of heaven to close their eyes.
सारांश
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क्षण भर के लिए चमकने वाली बिजली के समान गरुड़ों के समूह ने आकाश को इस प्रकार व्याप्त कर लिया कि उनकी चमक से देवताओं की आंखें भी झपकने लगीं।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
प्रतीति॥द्युलोकभाजामप्यनिमेषाणामपि कृतं मीलनं निमेषो येषां तानि लोचनानि दृष्टीः प्रतिघ्नतीभिः प्रतिबध्नतीभिः । हन्तेः शतरि ङीप् । गरुत्मतां तार्क्ष्याणां संहतिभिः समूहै: क्षणप्रकाशाभिर्विद्युद्भिरिव । तासां सौवर्णत्वादिति भावः । विहायोऽन्तरिक्षमवतेने व्यानशे ॥
पदच्छेदः
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| प्रतिघ्नतीभिः | प्रतिघ्नती (प्रति√हन्+शतृ, ३.३) | by the dazzling |
| कृतमीलितानि | कृत (√कृ+क्त)–मीलित (२.३) | made to close |
| द्युलोकभाजाम् | द्युलोक–भाज् (६.३) | of the inhabitants of heaven |
| अपि | अपि | even |
| लोचनानि | लोचन (२.३) | eyes |
| गरुत्मता | गरुत्मत् (३.१) | by Garuda |
| संहतिभिः | संहति (३.३) | with his flocks |
| विहायः | विहायस् (२.१) | the sky |
| क्षणप्रकाशाभिः | क्षण–प्रकाश (३.३) | with momentary flashes of brilliance |
| इव | इव | as it were |
| अवतेने | अवतेने (अव√तन् भावकर्मणोः लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was filled |
छन्दः
उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | ति | घ्न | ती | भिः | कृ | त | मी | लि | ता | नि |
| द्यु | लो | क | भा | जा | म | पि | लो | च | ना | नि |
| ग | रु | त्म | ता | सं | ह | ति | भि | र्वि | हा | यः |
| क्ष | ण | प्र | का | शा | भि | रि | वा | व | ते | ने |
| ज | त | ज | ग | ग | ||||||
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