धनुः प्रबन्धध्वनितं रुषेव
सकृद्विकृष्टा विततेव मौर्वी ।
संधानमुत्कर्षमिव व्युदस्य
मुष्टेरसम्भेद इवापवर्गे ॥

अन्वयः AI (अस्य) धनुः प्रबन्धध्वनितम् (अस्ति)। मौर्वी रुषा इव सकृद्विकृष्टा (सती) वितता इव (लक्ष्यते)। संधानम् उत्कर्षम् इव (अस्ति)। (शरं) व्युदस्य अपवर्गे मुष्टेः असम्भेदः इव (भवति)।
English Summary AI His bow sounds continuously. The bowstring, drawn once as if in anger, seems perpetually taut. The nocking of the arrow is as seamless as the drawing itself. After releasing the arrow, there is seemingly no change in his fist-grip.
सारांश AI इसके धनुष की डोरी से निरंतर ध्वनि निकल रही है। बाणों का संधान और प्रहार इतना तीव्र है कि मुट्ठी का खुलना और बंद होना बिजली की गति के समान अभिन्न प्रतीत हो रहा है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः) धनुरिति । धनू रुषेव प्रबन्धेनाविच्छेदेन ध्वनितम् । ध्वनतेः कर्तरि क्तः । मौर्वी च सकृद्विकृष्टा विततेवैकवाराकर्षणादेव विततेव स्थिता । संधानं बाणसंधानमुत्कर्षं तूणादुद्धरणं व्युदस्येव वर्जयित्वा । किमु कृतमिति शेषः । अपवर्गे बाणमोक्षेऽपि मुष्टेरसंभेदोऽसंघटनमिव । मुष्टिबन्धं विनैव बाणमोक्षः कृत इवेति हस्तलाघवोक्तिः॥
पदच्छेदः AI
धनुःधनुस् (१.१) The bow
प्रबन्धध्वनितम्प्रबन्धध्वनित (१.१) continuously sounding
रुषारुष् (३.१) with anger
इवइव as if
सकृद्विकृष्टासकृत्विकृष्ट (वि√कृष्+क्त, १.१) drawn once
विततावितत (वि√तन्+क्त, १.१) stretched
इवइव as if
मौर्वीमौर्वी (१.१) the bowstring
संधानम्संधान (१.१) The nocking
उत्कर्षम्उत्कर्ष (१.१) the drawing
इवइव is like
व्युदस्यव्युदस्य (वि+उत्√अस्+ल्यप्) having released
मुष्टेःमुष्टि (६.१) of the fist-grip
असम्भेदःअसम्भेद (१.१) no change
इवइव as if
अपवर्गेअपवर्ग (७.१) at the release
छन्दः उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
नुः प्र न्ध ध्व नि तं रु षे
कृ द्वि कृ ष्टा वि ते मौ र्वी
सं धा मु त्क र्ष मि व्यु स्य
मु ष्टे म्भे वा र्गे
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